श्लोक · Shlok 36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana. pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ.
Translation · अर्थ
English
By killing these sons of Dhritarashtra, what pleasure can be ours, O Janardana? Only sin will accrue to us from killing these felons.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
According to Vedic injunctions there are six kinds of aggressors: (1) a poison giver, (2) one who sets fire to the house, (3) one who attacks with deadly weapons, (4) one who plunders riches, (5) one who occupies another’s land, and (6) one who kidnaps a wife. Such aggressors are at once to be killed, and no sin is incurred by killing such aggressors. Such killing of aggressors is quite befitting any ordinary man, but Arjuna was not an ordinary person. He was saintly by character, and therefore he wanted to deal with them in saintliness. This kind of saintliness, however, is not for a kṣatriya. Although a responsible man in the administration of a state is required to be saintly, he should not be cowardly. For example, Lord Rāma was so saintly that people even now are anxious to live in the kingdom of Lord Rāma ( rāma-rājya ), but Lord Rāma never showed any cowardice. Rāvaṇa was an aggressor against Rāma because Rāvaṇa kidnapped Rāma’s wife, Sītā, but Lord Rāma gave him sufficient lessons, unparalleled in the history of the world. In Arjuna’s case, however, one should consider the special type of aggressors, namely his own grandfather, own teacher, friends, sons, grandsons, etc. Because of them, Arjuna thought that he should not take the severe steps necessary against ordinary aggressors. Besides that, saintly persons are advised to forgive. Such injunctions for saintly persons are more important than any political emergency. Arjuna considered that rather than kill his own kinsmen for political reasons, it would be better to forgive them on grounds of religion and saintly behavior. He did not, therefore, consider such killing profitable simply for the matter of temporary bodily happiness. After all, kingdoms and pleasures derived therefrom are not permanent, so why should he risk his life and eternal salvation by killing his own kinsmen? Arjuna’s addressing of Kṛṣṇa as “Mādhava,” or the husband of the goddess of fortune, is also significant in this connection. He wanted to point out to Kṛṣṇa that, as the husband of the goddess of fortune, He should not induce Arjuna to take up a matter which would ultimately bring about misfortune. Kṛṣṇa, however, never brings misfortune to anyone, to say nothing of His devotees.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
निहत्य having slain? धार्तराष्ट्रान् sons of Dhritarashtra? नः to us? का what? प्रीतिः pleasure? स्यात् may be? जनार्दन O Janardana? पापम् sin? एव only? आश्रयेत् would take hold? अस्मान् to us? हत्वा having killed? एतान् these? आततायिनः felons.Commentary Janardana means one who is worshipped by all for prosperity and salvation -- Krishna.He who sets fire to the house of another? who gives poision? who runs with sword to kill? who has plundered wealth and lands? and who has taken hold of the wife of somody else is an atatayi. Duryodhana had done all these evil actions.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
अर्जुन के इतना कुछ कहने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण मूर्तिवत् मौन ही रहते हैं। इसलिये वह पहले की भाषा छोड़कर मृदुभाव से किसी मन्द बुद्धि मित्र को कोई बात समझाने की शैली में भावुक तर्क देने लगता है। भगवान् के निरन्तर मौन धारण किये रहने से अर्जुन की यह परिवर्तित नीति अत्यन्त हास्यास्पद प्रतीत होती है।इस श्लोक में प्रथम वह कहता है कि दुर्योधनादि को मारने से किसी प्रकार का कल्याण होने वाला नहीं है। इस पर भी काष्ठवत् मौन खड़े श्रीकृष्ण को देखकर उसको इस मौन भाव का कारण समझ में नहीं आता। शीघ्र ही उसे स्मरण हो आता है कि कौरव परिवार आततायी है और धर्मशास्त्र के नियमानुसार आततायी को तत्काल मार डालना चाहिये चाहे वह शिक्षक वृद्ध पुरुष या वेदज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो। आततायी को मारने में किसी प्रकार का पाप नहीं है। अन्यायपूर्वक किसी पर आक्रमण करने वाला पुरुष आततायी कहलाता है।अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप के विपरीत हम जो गलत काम करते हैं वे पाप कहलाते हैं। शरीर मन और बुद्धि को ही अपना स्वरूप समझकर कोई कर्म करना श्रेष्ठ मनुष्य का लक्षण नहीं है। अहंकारपूर्वक स्वार्थ के लिये किये गये कर्म हमारे और शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा के बीच वासना की सुदृढ़ दीवार खड़ी कर देते हैं। इन्हें ही पाप कहा जाता है।शत्रुओं की हत्या करने में अर्जुन का अविवेकपूर्ण विरोध शास्त्र को न समझने का परिणाम है और फिर अपनी समझ के अनुसार कर्म करना अपनी संस्कृति को ही नष्ट करना है।इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों की न स्तुति करते हैं और न ही आलोचना। वे जानते हैं कि अर्जुन को अपने मन की बात कह लेने देनी चाहिए। किसी मानसिक रोगी के लिए यह उत्तम निदान है। इस प्रकार उसका चित्त शांत हो जाता है।
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--'निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः ৷৷. हत्वैतानाततायिनः'-- धृतराष्ट्रके पुत्र और उनके सहयोगी दूसरे जितने भी सैनिक हैं, उनको मारकर विजय प्राप्त करनेसे हमें क्या प्रसन्नता होगी? अगर हम क्रोध अथवा लोभके वेगमें आकर इनको मार भी दें, तो उनका वेग शान्त होनेपर हमें रोना ही पड़ेगा अर्थात् क्रोध और लोभमें आकर हम क्या अनर्थ कर बैठे--ऐसा पश्चत्ताप ही करना पड़ेगा। कुटुम्बियोंकी याद आनेपर उनका अभाव बार-बार खटकेगा। चित्तमें उनकी मृत्युका शोक सताता रहेगा। ऐसी स्थितिमें हमें कभी प्रसन्नता हो सकती है क्या?तात्पर्य है कि इनको मारनेसे हम इस लोकमें जबतक जीते रहेंगे, तबतक हमारे चित्तमें कभी प्रसन्नता नहीं होगी और इनको मारनेसे हमें जो पाप लगेगा, वह परलोकमें हमें भयंकर दुःख देनेवाला होगा।आततायी छः प्रकारके होते हैं--आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, धनको हरनेवाला, जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला (टिप्पणी प0 25)। दुर्योधन आदिमें ये छहों ही लक्षण घटते थे। उन्होंने पाण्डवोंको लाक्षागृहमें आग लगाकर मारना चाहा था। भीमसेनको जहर खिलाकर जलमें फेंक दिया था। हाथमें शस्त्र लेकर वे पाण्डवोंको मारनेके लिये तैयार थे ही। द्यूतक्रीड़ामें छल-कपट करके उन्होंने पाण्डवोंका धन और राज्य हर लिया था। द्रौपदीको भरी सभामें लाकर दुर्योधनने 'मैंने तेरेको जीत लिया है, तू मेरी दासी हो गयी है' आदि शब्दोंसे बड़ा अपमान किया था और दुर्योधनादिकी प्रेरणासे जयद्रथ द्रौपदीको हरकर ले गया था। शास्त्रोंके वचनोंके अनुसार आततायीको मारनेसे मारने-वालेको कुछ भी दोष (पाप) नहीं लगता--'नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन' (मनुस्मृति 8। 351)। परन्तु आततायीको मारना उचित होते हुए भी मारनेकी क्रिया अच्छी नहीं है। शास्त्र भी कहता है कि मनुष्यको कभी किसीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये--'न हिंस्यात्सर्वा भूतानि' हिंसा न करना परमधर्म है--'अहिंसा परमो धर्मः' (टिप्पणी प0 26)। अतः क्रोधलोभके वशीभूत होकर कुटुम्बियोंकी हिंसाका कार्य हम क्यों करें आततायी होनेसे ये दुर्योधन आदि मारनेके लायक हैं ही परन्तु अपने कुटुम्बी होनेसे इनको मारनेसे हमें पाप ही लगेगा क्योंकि शास्त्रोंमें कहा गया है कि जो अपने कुलका नाश करता है वह अत्यन्त पापी होता है--'स एव पापिष्ठतमो यः कुर्यात्कुलनाशनम्।' अतः जो आततायी अपने खास कुटुम्बी हैं, उन्हें कैसे मारा जाय? उनसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना, उनसे अलग हो जाना तो ठीक है, पर उन्हें मारना ठीक नहीं है। जैसे, अपना बेटा ही आततायी हो जाय तो उससे अपना सम्बन्ध हटाया जा सकता है, पर उसे मारा थोड़े ही जा सकता है सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें युद्धका दुष्परिणाम बताकर अब अर्जुन युद्ध करनेका सर्वथा अनौचित्य बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।1.35 1.44।।निहत्येत्यादि। आततायिनां हनने पापमेव कर्तृ। अतोऽयमर्थः पापेन तावदेतेऽस्मच्छत्रवो हताः परतन्त्रीकृताः। तांश्च निहत्यास्मानपि पापमाश्रयेत् (S omits पापम्)। पापमत्र लोभादिवशात् (S लोभवशात्) कुलक्षयादिदोषादर्शनम् (S दोषदर्शनम्)। अत एव कुलादिधर्माणामुपक्षेपं (K कुलक्षयादि N क्षेपकम्) करोति स्वजनं हि कथमित्यादिना।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
यदि पुनरमी दुर्योधनादयो न निगृह्येरन् भवन्तस्तर्हि तैर्निगृहीता दुःखिताः स्युरित्याशङ्क्याह पापमेवेति। यदीमे दुर्योधनादयो निर्दोषानेवास्मानकस्माद्युद्धभूमौ हन्युः तदैतान्अग्निदो गरदश्च इत्यादिलक्षणोपेतानाततायिनो निर्दोषस्वजनहिंसाप्रयुक्तं पापं पूर्वमेव पापिनः समाश्रयेदित्यर्थः। अथवा यद्यप्येते भवन्त्यातयायिनस्तथाप्येतानतिशोच्यान्दुर्योधनादीन्हिंसित्वा तत्कृतं पापमस्मानेवाश्रयेदतो नास्माभिरेते हन्तव्या इत्यर्थः। अथवा गुरुभ्रातृसुहृत्प्रभृतीनेतान्हत्वा वयमाततायिनः स्याम ततश्चैतान्हत्वा हिंसाकृतं पापमाततायिनोऽस्मानेव समाश्रयेदिति युद्धादुपरमणमस्माकं श्रेयस्करमित्यर्थः। फलाभावादनर्थसंभवाच्च परहिंसा न कर्तव्येत्युपसंहरति तस्मादिति। किञ्च राज्यसुखमुद्दिश्य युद्धमुपक्रम्य तेन च स्वजनपरिक्षये न सुखमुपपद्यते तेन न कर्तव्यं युद्धमित्याह स्वजनं हीति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
ननु बह्वपकर्तुर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रान्दुःखदातृ़न्निहत्य स्थितानां युष्माकां प्रीतिर्भविष्यतीति चेत्तत्राह निहत्येति। धार्तराष्ट्रान्निहत्य नोऽस्माकं का प्रीतिः स्यातः। न कापीत्यर्थः। अपकर्तर्यपि वृद्धेऽपकारो न कार्य इति धृतराष्ट्रसंबन्धप्रदर्शनाशयः। तव तु दुष्टजनघातेन स्वसंबन्धिप्रसन्नता संपद्यते अस्माकं तु सापि नास्ति अस्मत्संबन्धिनामवश्यंभाविनाशदर्शनादिति सूचयन्नाह जनार्दनेति। जनार्दनेति संबोधनेन यद्येते वध्यास्तर्हि त्वमेवैताञ्जहि प्रलये सर्वजनहिंसकत्वेऽपि सर्वेपापासंसर्गित्वादिति सूचयतीति केचित्। ननुअग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारहरश्चैव षडेते ह्याततायिनः।। इति वचनादाततायिन एतान्हत्वानाततायिवधे दोषः इति वचनाद्युष्मान्पापं नाश्रयिष्यति अपित्वाततायिन एतानेवेत्यत आह पापमिति। एतानाततायिनो हत्वाऽस्मानेव पापमाश्रयेत्।द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ। परिव्राड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः।। इत्यादिना हतस्य पापापगमाच्छ्रेयोविशेषाभिधानात् हननकर्तृभूतानस्मानेव हिंसानिबन्धनं पापमाश्रयेदितिआततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।। इति वचनं त्वर्थशास्त्रत्वेन दुर्बलत्वात्न हिंस्यात्सर्वा भूतानि इति प्रबलेन धर्मशास्त्रेण बाध्यते। तदुक्तं याज्ञवलक्येनस्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यहारतः। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः। इत्यभिप्रायः। युद्धायानुद्यतानस्मान्हत्वैतानाततायिनः। पापमेवाश्रयेदिति वा एतान्हत्वाततायिनोऽस्मानेवेति वेति पक्षत्रयेऽपि एतदादेर्हननक्रियांप्रति कर्तृत्वे क्त्वाप्रत्ययः स्थित्यादिक्रियामध्याहृत्योपपद्यते।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
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Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
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Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
फलाभावदनर्थसंभवाच्च परहिंसा न कर्तव्येतिनच श्रेयोऽनुपश्यामि इत्यारभ्योक्तं तदुपसंहरति। अदृष्टफलाभावोऽनर्थसंभवश्च तच्छब्देन परामृश्यते। दृष्टसुखाभावमाह स्वजनं हीति। माधवेति लक्ष्मीपतित्वान्नालक्ष्मीके कर्मणि प्रवर्तयितुमर्हसीति भावः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
आततायिनःअग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारहरश्चैव षडेते ह्याततायिनः। आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन। इति। यद्यप्येवं तथापि एतान्हत्वा अस्मान्पापमेव आश्रयेत्। आततायिवधो हि अर्थशास्त्रविहितः।न हिंस्यात्सर्वा भूतानि इति तु धर्मशास्त्रम्। तच्च पूर्वस्मात्प्रबलम्। यथोक्तं याज्ञवल्क्येनस्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यवहारतः। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः। इति। अस्मान्हत्वा एतान् आततायिनः पापमेवाश्रयेदित्यपरा योजना। तथा च एत एवास्मद्वधेन नश्यन्तु न तु वयमेतेषां वधेन नङ्क्ष्याम इति भावः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
हे जनार्दन सर्वाविद्यानाशक धार्तराष्ट्रान् ज्ञानदृष्टिरहितानेतान् निहत्य नः का प्रीतिः स्यात् न कापीत्यर्थः। जनार्दनेति सम्बोधनेन त्वेदीयानां अस्माकं तथाकरणमनुचितमिति भावो व्यञ्जितः। ते तु धृतराष्ट्रात्मजा इति त्वां न पश्यन्ति तेन तेषां तथाकरणमुचितमिति धार्तराष्ट्रेति पदेन व्यञ्जितम्। यद्वा अस्मदीयान् धार्त्तराष्ट्रान्निहत्य तव का प्रीतिः स्यात्। अत्रायं भावः लौकिकभावेन ते त्वस्मदीया एव तन्मारणे नास्माकं तु प्रीतिः स्यात्तदा त्वत्प्रीत्यर्थं हन्तव्याः अस्माकं यथाकथञ्चित् त्वं प्रीणनीय इति भावः। ननु ते आततायिन इतिअग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारापहर्त्ता च षडेते ह्याततायिनः।। मनुः.8।350क्षे.23आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन मनुः.8।350।51 इत्यादिवाक्यैः प्रीतिर्भवतु मा वा सर्वथैते ह्युक्तसर्वदोषसहिता इति हन्तव्या एव ते तु स्वपापेनैव हन्तव्याः त्वं निमित्तमात्रं भवेति चेत्तत्राह पापमेवाश्रयेदिति। आततायिन एतान् हत्वा पापमस्मानेवाश्रयेत्। किञ्च आततायिमारणे दोषाभावस्तु धर्मशास्त्रविचारेणार्थशास्त्रविचारेण वा निरूपितः न तु भक्तिविचारेण भक्तिमार्गात्तु तयोर्दुर्बलत्वात्तन्मारणेनास्माकं पापमेव भवेत् पापाच्च भगवत्सम्बन्धो न स्यात् अतएवनराणां क्षीणपापानाम् पां.गी.श्लो.40 इति निरूपितम्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अर्जुन उवाच संजय उवाच स तु पार्थो महामनाः परमकारुणिको दीर्घबन्धुः परमधार्मिकः सभ्रातृको भवद्भिः अतिघोरैः मारणैः जतुगृहादिभिः असकृद् वञ्चितः अपि परमपुरुषसहायः अपि हनिष्यमाणान् भवदीयान् विलोक्य बन्धुस्नेहेन परमया च कृपया धर्माधर्मभयेन च अतिमात्रस्विन्नसर्वगात्रः सर्वथा अहं न योत्स्यामि इति उक्त्वा बन्धुविश्लेषजनितशोकसंविग्नमानसः सशरं चापं विसृज्य रथोपस्थे उपाविशत्।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
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Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
ननु च अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिनः।। इति स्मरणात्। अग्निद इत्यादिभिः षड्भिरपि हेतुभिरेते तावदाततायिनः। आततायिनां च वधो युक्त एव।आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।। इति वचनात्तत्राह सार्धेन पापमिति। अततायिनमायान्तम् इत्यादिकमर्थशास्त्रं धर्मशास्त्राद्दुर्बलम्। यथोक्तं याज्ञवल्क्येन स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यवहारतः। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः।। तस्मादाततायिनामप्येतेषामार्यादीनां वधेऽस्माकं पापमेव भवेदन्याय्यत्वादधर्मत्वाच्चैतद्वधस्य न चेह सुखं स्यादित्याह स्वजनं हीति।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।1.34 1.37।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
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