श्लोक · Shlok 6
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् | सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān. saubhadro draupadeyāśca sarva eva mahārathāḥ.
Translation · अर्थ
English
"The strong Yodhamanyu and the brave Uttamaujas, the son of Subhadra (Abhimanyu, the son of Subhadra and Arjuna), and the sons of Draupadi, all of great chariots (great heroes).
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
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Swami SivanandaEnglish Commentary+
युधामन्युः Yudhamanyu? च and? विक्रान्तः the strong? उत्तमौजाः Uttamaujas? च and? वीर्यवान् the brave? सौभद्रः the son of Subhadra? द्रौपदेयाः the sons of Draupadi? च and? सर्वे all? एव even? महारथाः great carwarriors.No Commentary.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
इन तीन श्लोकों में पाण्डवसैन्य के प्रमुख एवं प्रसिद्ध योद्धाओं की नामावली है। पाण्डवों की सेना का निरीक्षण करते समय दुर्योधन उनमें अनेक महारथियों को पहचानता है। प्राचीन हिन्दू सेनाओं में 11000 धनुर्धारी सैनिकों के समूह के नायक को महारथी कहा जाता था।अर्जुन और भीम अपने समय के धनुर्विद्या और शक्ति के लिये प्रसिद्ध योद्धा थे। दुर्योधन कहता है कि सभी महारथी अर्जुन और भीम के समान हैं जिसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि पाण्डवों की सेना संख्या में कम थी परन्तु सार्मथ्य में वह कौरवों की सुसज्जित और विशाल सेना से अधिक थी।
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।।1.4 -- 1.6।। व्याख्या-- 'अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि'-- जिनसे बाण चलाये जाते हैं, फेंके जाते हैं, उनका नाम 'इष्वास' अर्थात् धनुष है। ऐसे बड़े-बड़े इष्वास (धनुष) जिनसे पास हैं, वे सभी 'महेष्वास' हैं। तात्पर्य है कि बड़े धनुषोंपर बाण चढ़ाने एवं प्रत्यञ्चा खींचनेमें बहुत बल लगता है। जोरसे खींचकर छोड़ा गया बाण विशेष मार करता है। ऐसे बड़े-बड़े धनुष पासमें होनेके कारण ये सभी बहुत बलवान् और शूरवीर हैं। ये मामूली योद्धा नहीं हैं। युद्धमें ये भीम और अर्जुनके समान हैं अर्थात् बलमें ये भीमके समान और अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये अर्जुनके समान हैं।'युयुधानः'-- युयुधान-(सात्यकि-) ने अर्जुनसे अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी थी। इसलिये भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा दुर्योधनको नारायणी सेना देनेपर भी वह कृतज्ञ होकर अर्जुनके पक्षमें ही रहा, दुर्योधनके पक्षमें नही गया। द्रोणाचार्यके मनमें अर्जुनके प्रति द्वेषभाव पैदा करनेके लिये दुर्योधन महारथियोंमें सबसे पहले अर्जुनके शिष्य युयुधानका नाम लेता हैं। तात्पर्य है कि इस अर्जुनको तो देखिये! इसने आपसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखा है और आपने अर्जुनको यह वरदान भी दिया है कि संसारमे तुम्हारे समान और कोई धनुर्धर न हो, ऐसा प्रयत्न करूँगा (टिप्पणी प0 6)। इस तरह आपने तो अपने शिष्य अर्जुनपर इतना स्नेह रखा है, पर वह कृतघ्न होकर आपके विपक्षमें लड़नेके लिये खड़ा है, जबकि अर्जुनका शिष्य उसीके पक्षमें खड़ा है।युयुधान महाभारतके युद्धमें न मरकर यादवोंके आपसी युद्धमें मारे गये।'विराटश्च'-- जिसके कारण हमारे पक्षका वीर सुशर्मा अपमानित किया गया आपको सम्मोहनअस्त्रसे मोहित होना पड़ा और हमलोगोंको भी जिसकी गायें छोड़कर [युद्धसे भागना पड़ा वह राजा विराट आपके प्रतिपक्षमें खड़ा है।]राजा विराटके साथ द्रोणाचार्यका ऐसा कोई वैरभाव या द्वेषभाव नहीं था; परन्तु दुर्योधन यह समझता है कि अगर युयुधानके बाद मैं द्रुपदका नाम लूँ तो द्रोणाचार्यके मनमें यह भाव आ सकता है कि दुर्योधन पाण्डवोंके विरोधमें मेरेको उकसाकर युद्धके लिए विशेषतासे प्रेरणा कर रहा है तथा मेरे मनमें पाण्डवोंके प्रति वैरभाव पैदा कर रहा है। इसलिये दुर्योधन द्रुपदके नामसे पहले विराटका नाम लेता है, जिससे द्रोणाचार्य मेरी चालाकी न समझ सकें और विशेषतासे युद्ध करें।राजा विराट उत्तर श्वेत और शंख नामक तीनों पुत्रोंसहित महाभारतयुद्धमें मारे गये। 'द्रुपदश्च महारथः'-- आपने तो द्रुपदको पहलेकी मित्रता याद दिलायी, पर उसने सभामें यह कहकर आपका अपमान किया कि मैं राजा हूँ और तुम भिक्षुक हो; अतः मेरीतुम्हारी मित्रता कैसी? तथा वैरभावके कारण आपको मारनेके लिये पुत्र भी पैदा किया, वही महारथी द्रुपद आपसे लड़नेके लिये विपक्षमें खड़ा है।[राजा द्रुपद युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।] 'धृष्टकेतुः'-- यह धृष्टकेतु कितना मूर्ख है कि जिसके पिता शिशुपालको कृष्णने भरी सभामें चक्रसे मार डाला था, उसी कृष्णके पक्षमें यह लड़नेके लिये खड़ा है![धृष्टकेतु द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।] 'चेकितानः'-- सब यादवसेना तो हमारी ओरसे लड़नेके लिये तैयार है और यह यादव चेकितान पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है![चेकितान दुर्योधनके हाथसे मारे गये।]'काशिराजश्च वीर्यवान्'-- यह काशिराज बड़ा ही शूरवीर और महारथी है। यह भी पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है। इसलिये आप सावधानीसे युद्ध करना; क्योंकि यह बड़ा पराक्रमी है।[काशिराज महाभारतयुद्धमें मारे गये।]'पुरुजित्कुन्तिभोजश्च'-- यद्यपि पुरुजित् और कुन्तिभोज--ये दोनों कुन्तीके भाई होनेसे हमारे और पाण्डवोंके मामा हैं, तथापि इनके मनमें पक्षपात होनेके कारण ये हमारे विपक्षमें युद्ध करनेके लिये खड़े हैं।[पुरुजित् और कुन्तिभोज दोनों--ही युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।] 'शैब्यश्च नरपुङ्गवः'-- यह शैब्य युधिष्ठिरका श्वशुर है। यह मनुष्योंमें श्रेष्ठ और बहुत बलवान् है। परिवारके नाते यह भी हमारा सम्बन्धी है। पतन्तु यह पाण्डवोंके ही पक्षमें खड़ा है। 'युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्'-- पाञ्चालदेशके बड़े बलवान् और वीर योद्धा युधामन्यु तथा उत्तमौजा मेरे वैरी अर्जुनके रथके पहियोंकी रक्षामें नियुक्त किये गये हैं। आप इनकी ओर भी नजर रखना।[रातमें सोते हुए इन दोनोंको अश्वत्थामाने मार डाला।] 'सौभद्रः'-- यह कृष्णकी बहन सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु है। यह बहुत शूरवीर है। इसने गर्भमें ही चक्रव्यूह-भेदनकी विद्या सीखी है। अतः चक्रव्यूह-रचनाके समय आप इसका खयाल रखें।[युद्धमें दुःशासनपुत्रके द्वारा अन्यायपूर्वक सिरपर गदाका प्रहार करनेसे अभिमन्यु मारे गये।]'द्रौपदेयाश्च'-- युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव--इन पाँचोंके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे क्रमशः प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन पैदा हुए हैं। इन पाँचोंको आप देख लीजिये। द्रौपदीने भरी सभामें मेरी हँसी उड़ाकर मेरे हृदयको जलाया है, उसीके इन पाँचों पुत्रोंको युद्धमें मारकर आप उसका बदला चुकायें[रातमें सोते हुए इन पाँचोंको अश्वत्थामाने मार डाला।]'सर्व एव महारथाः'-- ये सब-के-सब महारथी हैं। जो शास्त्र और शस्त्रविद्या--दोनोंमें प्रवीण हैं और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, उस वीर पुरुषको 'महारथी' कहते हैं (टिप्पणी प0 7) ऐसे बहुत-से महारथी पाण्डवसेनामें खड़े हैं।सम्बन्ध-- द्रोणाचार्य के मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करने और युद्धके लिये जोश दिलानेके लिये दुर्योधनने पाण्डव-सेनाकी विशेषता बतायी। दुर्योधनके मनमें विचार आया कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके पक्षपाती हैं ही; अतः वे पाण्डव-सेनाकी महत्ता सुनकर मेरेको यह कह सकते हैं कि जब पाण्डवोंकी सेनामें इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू सन्धि क्यों नहीं कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगेके तीन श्लोकोंमें अपनी सेनाकी विशेषता बताता है।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।1.2 1.9।।किं वा अनेन बहुपरिगणनेन (K omits बहु )। इदं तावद्वस्तुतत्त्वम् इत्याह।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
तेषां सर्वेषामपि महाबलपराक्रमभाक्त्वादनुपेक्ष्यत्वं पुनर्विवक्षति सर्व एवेति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
सौभद्राः सुभद्रापुत्रोऽभिमन्युः। द्रौपदेयाः द्रोपदीपुत्राः प्रतिविन्ध्यादयः पञ्च। द्रुपदश्च महारथ इत्युक्तमयुक्तं यतोऽन्येऽपि महारथा भीष्मप्रोक्ताः सन्तीत्याशङ्क्य तदङ्गीकरोति सर्व एवेति। निर्दिष्टाश्चकारपरिगृहीताश्च महारथाः। एतल्लक्षणं तुएको दशसहस्त्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनाम्। शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च स वै प्रोक्तो महारथः। अमितान्योधयेद्यस्तु संप्रोक्तोऽतिरथस्तु सः। रथस्त्वेकेन यो युध्येत्तन्न्यूनोऽर्धरथः स्मृतः।। इति। यद्यपि परपक्षेऽतिरथादयोऽपि सन्ति तथापि तत्तिरोधानं तवातिरथस्य महारथानां निवारणे सामर्थ्यम्। नत्वन्येषामतिरथादीनामित्याचार्यस्योत्साहजननार्थम्। सर्वेऽपि महारथा एव नत्वेकोऽपि रथोऽर्धरथो वा। महारथा इत्यतिरथस्याप्युपलक्षणमिति केचित्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
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Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
।। 1.6नन्वेकेन द्रुपदपुत्रेणाप्रसिद्धेनाधिष्ठितां चमूमेतामस्मदीयो यः कश्चिदपि जेष्यति किमिति त्वमुत्ताम्यसीत्यत आह अत्र शूरा इत्यादिभिस्त्रिभिः। न केवलमत्र धृष्टद्युम्न एव शूरो येनोपेक्षणीयता स्यात्। किंत्वस्यां चम्वामन्येऽपि बहवः शूरा सन्तीत्यवश्यमेव तज्जये यतनीयमित्यभिप्रायः। शूरानेव विशिनष्टि महेष्वासा इति। महान्तोऽन्यैरप्रधृष्या इष्वासा धनूंषि येषा ते तथा। दूरतएव परसैन्यविद्रावणकुशला इति भावः। महाधनुरादिमत्त्वेऽपि युद्धकौशलाभावमाशङ्क्याह युधि युद्धे भीमार्जुनाभ्यां सर्वसंप्रतिन्नपराक्रमाभ्यां समास्तुल्याः। तानेवाह युयुधान इत्यादिनामहारथा इत्यन्तेन। युयुधानः सात्यकिः। द्रुपदश्च महारथ इत्येकः। अथवा युयुधानविराटद्रुपदानां विशेषणं महारथ इति। धृष्टकेतुचेकितानकाशिराजानां विशेषणं वीर्यवानिति। पुरुजित्कुन्तिभोजशैब्यानां विशेषणं नरपुंगव इति। विक्रान्तो युधामन्युः वीर्यवांश्चोत्तमौजा इति द्वौ। अथवा सर्वाणि विशेषणानि समुच्चित्य सर्वत्र योजनीयानि। सौभद्रोऽभिमन्युः। द्रौपदेयाश्च द्रौपदीपुत्राः प्रतिविन्ध्यादयः पञ्च। चकारादन्येऽपि पाण्ड्यराजघटोत्कचप्रभृतयः। पञ्च पाण्डवास्त्वतिप्रसिद्धा एवेति न गणिताः। ये गणिताः सप्तदशान्येऽपि तदीयाः सर्वएव महारथाः सर्वेऽपि महारथाएव नैकोऽपि रथोऽर्धरथो वा। महारथा इत्यतिरथत्वस्याप्युपलक्षणम्। तल्लक्षणं चएको दशसहस्त्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनाम्। शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः।।अमितान्योधयेद्यस्तु संप्रोक्तोऽतिरथस्थु सः। रथस्त्वेकेन यो योद्धा तन्नयूनोऽर्धरथः स्मृतः।। इति
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
युधामन्यूत्तमौजसौ सौभद्रोऽभिमन्युः पञ्च द्रौपदेयाः प्रतिविन्ध्यादयश्चेत्यष्टौ। चकारात् पाण्डवा घटोत्कचादयश्चातिप्रसिद्धा ग्राह्याः। सर्वेऽपि महारथा एव। तल्लक्षणं तुएको दशसहस्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनाम्। शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च स वै प्रोक्तो महारथः। अमितान्योधयेद्यस्तु संप्रोक्तोऽतिरथस्तु सः। रथस्त्वेकेन योद्धा स्यात्तन्न्यूनोऽर्धरथः स्मृतः। इति।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
विक्रान्तः अतिपराक्रमी। वीर्यवानिति सौभद्रविशेषणम्। द्रौपदेयाः पञ्च प्रतिविन्ध्यादयः। सर्व एव महारथाः। महारथलक्षणं च एको दशसहस्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनाम्। शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः।।अमितान्योधयेद्यस्तु सम्प्रोक्तोऽतिरथस्तु सः। रथी चैकेन यो योद्धा तन्न्यूनोऽर्द्धरथः स्मृतः इत्यादि।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
धृतराष्ट्र उवाच सञ्जय उवाच दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
युधामन्युश्चेति। विक्रान्तो युधामन्युर्नामैकः। सौभद्रोऽभिमन्युः। द्रौपदेयाः द्रोपद्यां पञ्चभ्यो युधिष्ठिरादिभ्यो जाताः प्रतिविन्ध्यादयः पञ्च। महारथादीनां लक्षणम् एको दशसहस्त्राणि योधयेद्यस्तु धन्विनाम्। शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः।।अमितान्यो धयेद्यस्तु संप्रोक्तोऽतिरथस्तु सः। रथी त्वेकेन यो युद्ध्येत्तन्न्यूनोऽर्धरथी मतः।। इति।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।1.2 1.11।।दुर्योधनोऽपि वृकोदरादिभी रक्षितं पाण्डवानां बलं भीष्माभिरक्षितं स्वीयं च बलं विलोक्य आत्मजविजये तद्बलस्य पर्याप्ततां आत्मबलस्य तद्बिजयेऽपर्याप्ततां च आचार्ये निवेद्यान्तरेव विष्ण्णोऽभूत्।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
एवं सुयोधनविजयबुभुत्सया कृतस्य प्रश्नस्ययत्र योगेश्वरः 18।78 इति साक्षादुत्तरं वक्ष्यन् तत्प्रत्यायनार्थमखिलमवान्तरवृत्तमपि सञ्जय उवाच दृष्ट्वेति। पाण्डवानीकं व्यूढं दृष्ट्वा इति सुयोधनस्य धैर्यभ्रंशहेतुः। तदधीनो धैर्यभ्रंशरूपोऽवस्थाविशेषःतुशब्देन सूच्यते। दृष्ट्वेत्यादेरनुनादयन्नित्यन्तस्याव्यक्तांशं व्यञ्जयति दुर्योधन इत्यादिनाअकथयत् रा.भा.1।19 इत्यन्तेन। संज्ञार्थं सम्यग्ज्ञानार्थम् संज्ञया परिसंख्यानार्थं वा। तत्रअन्तर्विषण्णोऽभवत् इत्यन्तेनभीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि 1।11 इत्येतदन्तं व्याख्यातम्।अपर्याप्तं 1।10 इति श्लोकस्यायमर्थः तत् तस्मात् अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितमपर्याप्तं परबलविजयाय नालम् इदं त्वेतेषां पाण्डवानां बलं भीमाभिरक्षितं पर्याप्तमस्मद्बलविजयायालम् इति। नन्विदमनुपपन्नं तद्बलमिति सामानाधिकरण्यप्रतीतिभङ्गायोगात् पूर्वत्र च परबलस्वबलयोः सामर्थ्यासामर्थ्यहेतूपन्यासाभावात्। न च भीष्मद्रोणादिरक्षितं स्वबलमयमसमर्थं मन्यते। प्रबलानामेव हि भीष्मद्रोणादीनां वधः सोपाधिकः।न भेतव्यं महाराज म.भा.उ.प.55।1 इत्यादिषु च बहुशः स्वबलस्यैव सामर्थ्यं दुर्योधनेनोपन्यस्तम्। न चेदानीं तद्विपरीतप्रतीतौ कारणमस्ति। द्वितीयदिवसारम्भे च दुर्योधन एवं वक्ष्यति अपर्याप्तं तदस्माकं बलं पार्थाभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं पार्थिवसत्तमाः म.भा.उ.प. इति। तत्र चास्माकमपर्याप्तमित्येवान्वयः न पुनरस्माकं बलमिति। ततोऽत्रापि तथैव वचनव्यक्तिरुचिता। तस्मात् पाठभेदेन व्यवहितान्वयेन वाक्यभेदेन पदार्थभेदेन वा योजना स्यात्। तत्र भीमभीष्मशब्दयोर्विपर्यासात्पाठभेदः। तथा च भीमाभिरक्षितं तद्बलमस्माकं अपर्याप्तमित्यन्वये सामानाधिकरण्यम् तदिति विप्रकृष्टनिर्देशस्वारस्यम् दुर्योधनाभिप्रायाविरोधश्च सिद्ध्यति। व्यवहितान्वयेऽप्ययमेवार्थः। द्विधा च व्यवहितान्वयोऽत्र शक्यः। भीमाभिरक्षितभीष्माभिरक्षितयोर्विपर्यासादेकःअपर्याप्तं तत् ৷৷. पर्याप्तं त्विदम् इत्यनयोर्विपर्यासाद्द्वितीयः। अर्थौचित्याय तु व्यवधानमात्रं सह्यते।वाक्यभेदेऽप्येवं योजना अपर्याप्तं तदित्येका प्रतिज्ञा पर्याप्तं त्विदमिति द्वितीया। अत्र को हेतुरिति शङ्कायां हेतुपरं वाक्यद्वयम् अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् एतेषां बलं भीमाभिरक्षितमिति। अस्मद्बलस्य प्रबलाधिष्ठितत्वात् परबलस्य च दुर्बलाधिष्ठितत्वादित्यर्थः। पदार्थभेदे त्वेवं योजना पर्याप्तं पर्यापनं समापनम् पर्याप्तमिति कर्तरि क्तः नाशनसमर्थमित्यर्थः। अपर्याप्तं नाशनासमर्थमित्यर्थः। भीष्माभिरक्षितमस्माद्बलं तत् अपर्याप्तं नाशयितुं न शक्नोति।तत् इत्य पाण्डवबलं कर्तृतया निर्दिश्यतेइदम् इति च स्वबल परबलपर्यापनकर्तृतया। निष्ठायोगाच्च न कर्मणि षष्ठीप्राप्तिः यद्वा अपर्याप्तमपरिमितमित्यर्थः पर्याप्तं परिमितमित्यर्थः स्वबलस्यैकादशाक्षौहिणीयुक्तत्वात् परबलस्य सप्ताक्षौहिणी युक्तत्वाच्च। सर्वथा तावन्न स्वबलदौर्बल्यं परबलप्राबल्यं च युद्धारम्भे दुर्योधनः प्रसञ्जयेदिति सोऽयं घण्टापथात्पाटच्चर कुटीरप्रवेशः। तथाहि इह तावद्भीष्माभिरक्षितमित्येतत्प्रति शिरस्तया भीमाभिरक्षितमिति केनाभिप्रायेण निर्दिश्यते न तावद्भीष्मवद्भीमस्यापि सेनापतित्वेन धृष्टद्युम्नस्य तत्पतित्वेनोक्तत्वात्। नापि भीष्मसमपौरुषत्वेन अत्यन्तविषमतया प्रसिद्धेः। यथोक्तं भीष्मेणैव शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान्। यद्येषां न भवेद्गोप्ता विष्णुः कारणपूरुषः म.भा. इति। नापि प्रतिबलाधीश्वरत्वेन धर्मसूनोस्तथात्वात्। नापि परबलभटप्रधानत्वेन अर्जुनस्यैव तथा प्रसिद्धेः। अतो भीमस्य समस्तधार्तराष्ट्रवधदीक्षितत्वात्तदुचितसाहसबलसहायादियुक्तत्वाच्च तस्य विशेषतो निर्देशः। एवं सति तत्प्रतिशिरस्त्वेन भीष्मस्य निर्देशोऽपि समस्तपाण्डुतनयसंरक्षणप्रवणत्वेन प्रतिपन्नत्वात्। अतः शत्रुभयसहायातिशङ्के पदद्वयसूचिते इत्युक्तं भवति। यत्तूक्तं पूर्वत्र परबलस्वबलयोः सामर्थ्यासामर्थ्यहेतुः