श्लोक · Shlok 40
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप | एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥
nānto.asti mama divyānāṃ vibhūtīnāṃ parantapa. eṣa tūddeśataḥ prokto vibhūtervistaro mayā.
Translation · अर्थ
English
There is no end to My divine gloreis, O Arjuna, but this is a brief statement by Me of the particulars of My divine glories.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
As stated in the Vedic literature, although the opulences and energies of the Supreme are understood in various ways, there is no limit to such opulences; therefore not all the opulences and energies can be explained. Simply a few examples are being described to Arjuna to pacify his inquisitiveness.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
न not? अन्तः end? अस्ति is? मम My? दिव्यानाम् of divine? विभूतीनाम् glories? परंतप O scorcher of foes? एषः this? तु indeed? उद्देशतः briefly? प्रोक्तः has been stated? विभूतेः of glory? विस्तरः particulars? मया by Me.Commentary It is impossible for anyone to describe or know the exact extent of the divine gloreis of the Lord. There is no limit to His powers or glories. What could be expressed of Him is nothing when compared to His infinte glories.Parantapa Scorcher of foes -- he who burns the internal enemies? lust? anger? greed? deluion? etc.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है अपनी विभूतियों के वर्णन के प्रारम्भ में ही भगवान् श्रीकृष्ण ने इस विशाल कार्य को सम्पन्न करने में भाषा की असमर्थता प्रकट की था। किन्तु? फिर भी? शिष्य के लिए केवल स्नेहवश भगवान् श्रीकृष्ण ने इस असम्भव कार्य को यथासम्भव सम्पन्न करने के लिए अपने हाथों में लिया। कोई भी घटकार किसी भी जिज्ञासु व्यक्ति को समस्त घटों में व्याप्त उनके सारतत्त्व मिट्टी को नहीं दर्शा सकता और न अन्त में यह कहकर स्वयं का अभिनन्दन कर सकता है कि उसने समस्त भूत? वर्तमान और भविष्य के घटों को बता दिया है। ऐसा करना न सम्भव है और न आवश्यक ही। योग्य अधिकारी पुरुष को कुछ वस्तुएं दिखाकर उनके स्ाारतत्त्व का ज्ञान करा दिया जाये? तो वह पुरुष उसी तत्त्व की अन्य वस्तुओं को देखकर उस तत्त्व को पहचान सकता है।इस अध्याय में? भगवान् ने अर्जुन को तथा उसके निमित्त से समस्त भावी पीढ़ियों के जिज्ञासुओं के लिए? इन 54 विभूतियों के द्वारा? असंख्य उपाधियों के आवरण या परिधान में गुप्त वास कर रहे? अनन्त परमात्मा की क्रीड़ा को दर्शाया है। जो साधक इन विभूतियों का ध्यान करके अपने मन को पूर्णत प्रशिक्षित कर लेगा? वह इस बहुविध सृष्टि के पीछे स्थित एक अनन्त परमात्मा को सरलता से सर्वत्र पहचानेगा।दृश्य जगत् की अनन्त विभूतियों के विस्तार का वर्णन करने में अपनी असमर्थता को व्यक्त करते हुए भगवान् कहते हैं? सूर्यस्थानीय मुझ स्वयंप्रकाश? स्वस्वरूप की पूर्णता में स्थित परमात्मा की असंख्य रश्मिरूपी विभूतियों का कोई अन्त नहीं है।यदि भगवान् श्रीकृष्ण इस असमर्थता को पहले से जानते थे? तो क्यों उन्होंने एक गुरु होने के नाते? व्यर्थ ही अपने शिष्य को अपनी विभूतियों के द्वारा स्वयं का दर्शन कराने का आश्वासन दिया यह ऐसा छल भगवान् ने क्यों किया दीर्घ काल तक शिष्य को थकाकर अन्त में उसे निराश करना क्या उचित है क्या यह सभी धार्मिक गुरुओं? ऋषियों और मुनियों का सामान्य स्वभाव ही हैआध्यात्मिक साधनाओं पर लगाये जाने वाले इन सभी आरोपों का केवल एक ही उत्तर है कि इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। शल्य चिकित्सा के विद्यार्थियों को? सर्वप्रथम एक सप्ताह के मृत देह पर शल्यक्रिया करने को कहा जाता है यह कोई असत्य नहीं है यह सत्य है कि कितनी ही कुशलता से शल्यक्रिया करने पर भी वह मृत रोगी पुनर्जीवित होने वाला नहीं है? परन्तु इस प्रकार के अभ्यास का प्रयोजन विद्यार्थी को उस अनुभव को कराना है? जो अपना स्वतन्त्र व्यवसाय करने के लिए जीवन में आवश्यक होता है। इसी प्रकार? भगवान् यहाँ अर्जुन को दृश्य के द्वारा अदृश्य का दर्शन करने की कला को सिखाने के लिए अपनी कुछ विशेष विभूतियों का वर्णन करते हैं।उनका यह उद्देश्य उनकी इस स्वीकारोक्ति में स्पष्ट होता है? किन्तु मैंने अपनी विभूतियों का विस्तार संक्षेप से कहा है। भगवान् द्वारा किया गया वर्णन पूर्ण नहीं कहा जा सकता। साधकों को प्रशिक्षित करने के लिए उन्होंने कुछ विशेष उदाहरण ही चुन कर दिये हैं। जिन्होंने इन विभूतियों पर उत्साहपूर्वक ध्यान किया है? वे अनित्य रूपों में क्रीड़ा कर रहे स्वयं प्रकाश स्वरूप को सरलता से पहचान सकते हैं।संक्षेप में? भगवान् के कथन का सार यह है कि
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--'मम दिव्यानां (टिप्पणी प0 568.2) विभूतीनाम्'--'दिव्य' शब्द अलौकिकता, विलक्षणताका द्योतक है। साधकका मन जहाँ चला जाय, वहीं भगवान्का चिन्तन करनेसे यह दिव्यता वहीं प्रकट हो जायगी; क्योंकि भगवान्के समान दिव्य कोई है ही नहीं। देवता जो दिव्य कहे जाते हैं, वे भी नित्य ही भगवान्के दर्शनकी इच्छा रखते हैं, -- 'नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः'(गीता 11। 52)। इससे यही सिद्ध होता है कि दिव्यातिदिव्य तो एक भगवान् ही हैं। इसलिये भगवान्की जितनी भी विभूतियाँ हैं, तत्त्वसे वे सभी दिव्य हैं। परन्तु साधकके सामने उन विभूतियोंकी दिव्यता तभी प्रकट होती है, जब उसका उद्देश्य केवल एक भगवत्प्राप्तिका ही होता है और भगवत्तत्त्व जाननेके लिये राग-द्वेषसे रहित होकर उन विभूतियोंमें केवल भगवान्का ही चिन्तन करता है। 'नान्तोऽस्ति'-- भगवान्की दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। कारण कि भगवान् अनन्त हैं तो उनकी विभूतियाँ, गुण, लीलाएँ आदि भी अनन्त हैं -- 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' (मानस 1। 140। 5)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंके उपक्रममें और उपसंहारमें -- दोनों ही जगह कहा है कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंके विषयमें कहा है कि 'मेरे द्वारा परमाणुओंकी संख्या समयसे गिनी जा सकती है, पर करोड़ों ब्रह्माण्डोंको रचनेवाली मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं पाया जा सकता (टिप्पणी प0 569)। भगवान् अनन्त, असीम और अगाध हैं। संख्याकी दृष्टिसे भगवान् 'अनन्त' हैं अर्थात् उनकी गणना परार्द्धतक नहीं हो सकती। सीमाकी दृष्टिसे भगवान् 'असीम' हैं। सीमा दो तरहकी होती है -- कालकृत और देशकृत। अमुक समय पैदा हुआ और अमुक समयतक रहेगा -- यह कालकृत सीमा हुई; और यहाँसे लेकर वहाँतक -- यह देशकृत सीमा हुई। भगवान् ऐसे सीमामें बँधे हुए नहीं हैं। तलकी दृष्टिसे भगवान् 'अगाध' हैं। अगाध शब्दमें 'गाध' नाम 'तल' का है; जैसे, जलमें नीचेका तल होता है। अगाधका अर्थ हुआ -- जिसका तल है ही नहीं, ऐसा अथाह गहरा। 'एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया'--अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि आप अपनी दिव्य विभूतियोंको विस्तारसे कहिये, तो उत्तरमें भगवान्ने कहा कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। ऐसा कहकर भी भगवान्ने अर्जुनकी जिज्ञासाके कारण कृपापूर्वक अपनी विभूतियोंका विस्तारसे वर्णन किया। परन्तु यह विस्तार केवल लौकिक दृष्टिसे ही है। इसलिये भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि मैंने यहाँ जो विभूतियोंका विस्तार किया है? वह विस्तार केवल तेरी दृष्टिसे ही है। मेरी दृष्टिसे तो यह विस्तार भी वास्तवमें बहुत ही संक्षेपसे (नाममात्रका) है; क्योंकि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है।[इस अध्यायमें बतायी गयी सम्पूर्ण विभूतियाँ सबके काम नहीं आतीं, प्रत्युत ऐसी अनेक दूसरी विभूतियाँ भी काममें आती हैं, जिनका यहाँ वर्णन नहीं हुआ है। अतः साधकको चाहिये कि जहाँ-जहाँ किसी विशेषताको लेकर मन खिंचता हो, वहाँ-वहाँ उस विशेषताको भगवान्की ही माने और भगवान्का ही चिन्तन करे; चाहे वह विभूति यहाँ भगवान्द्वारा कही गयी हो अथवा न कही गयी हो।] सम्बन्ध--अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से विभूति और योग बतानेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने पहले अपनी विभूतियोंको बताया और अब आगेके श्लोकमें योग बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
दिव्यानां विभूतीनां परिमितत्वशङ्कां वारयति -- नेत्यादिना। तदेवोपपादयति -- नहीति। कथं तर्हि विभूतेर्विस्तरो दर्शितस्तत्राह -- एष त्विति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
मम दिव्यानामन्तो नास्ति परमेश्वरविभूतीनामियत्तारहितानामियत्ता केनचिद्वक्तुं ज्ञातुं वा न शक्या। एष तद्देशत एकदेशेन विभूतीनां विस्तरो मया प्रोक्तः। उक्तविभूतिपरिचिन्तनेन परान् रागद्वेषादीन् शत्रून्तापयेति संबोधनाशयः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
प्रकरणार्थमुपसंहरन् विभूतिं संक्षिपति -- हे परंतप परेषां शत्रूणां कामक्रोधलोभादीनां तापजनक? मम दिव्यानां विभूतीनामन्त इयत्ता नास्ति। अतः सर्वज्ञेनापि सा शक्यते ज्ञातुं वक्तुं वा। सन्मात्रविषयत्वात्सर्वज्ञतायाः। एष तु त्वां प्रत्युद्देशत एकदेशेन प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो विस्तारो मया।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
नान्तोऽस्तीति। उद्देशत एकदेशेन विभूतेर्विस्तरो विस्तारो मया प्रोक्तः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
एवं विभूतिमुक्त्वोपसंहरति -- नान्तोऽस्तीति। मम स्वच्छन्दचारिणो दिव्यानां क्रीडात्मिकानां विभूतीनामन्तो नास्ति। परन्तपेति सम्बोधनं विश्वासार्थम्। नन्वन्ताभावे कथमेता एवोक्ताः इत्याकाङ्क्षायामाह -- एष इति। एष तूद्देशतः सङ्क्षेपतो विभूतेर्विस्तरो मया प्रोक्तः। प्रोक्तत्वेनान्येषामेतावज्ज्ञानेऽप्यसामर्थ्यं,द्योतितम्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
मम दिव्यानां कल्याणीनां विभूतीनाम् अन्तो न अस्ति। एष तु विभूतेः विस्तरो मया कैश्चिद् उपाधिभिः संक्षेपतः प्रोक्तः।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,न अन्तः अस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां विस्तराणां परंतप। न हि ईश्वरस्य सर्वात्मनः दिव्यानां विभूतीनाम् इयत्ता शक्या वक्तुं ज्ञातुं वा केनचित्। एष तु उद्देशतः एकदेशेन प्रोक्तः विभूतेः विस्तरः मया।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
प्रकरणार्थमुपसंहरति -- नान्त इति। अनन्तत्वाद्विभूतीनां ताः साकल्येन वक्तुं न शक्यन्ते? एष तु विभूतेर्विस्तर उद्देशतः संक्षेपतः प्रोक्तः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
प्रकरणार्थमुपसंहरति -- नान्तोऽस्तीति। एता दिव्या मे विभूतयः प्राधान्यतः उक्तास्ता अप्यनन्ता इति। एष तूद्देशतः प्रोक्तः -- नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्त्तनमुद्देशः -- तस्मात्सङ्क्षेपत इत्यर्थः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
निश्शेषवचनाशक्यतां प्रागुक्तामेव स्मारयति -- नान्तोऽस्ति इति। दिव्यशब्देन देशविशेषवर्तित्वादिविवक्षायां पूर्वमनियतदेशवर्तिनामदिव्यानां प्रपञ्चनं विरुध्येतेत्यत उक्तंकल्याणीनामिति।विभूतीरात्मनः शुभाः [10।19] इति ह्युपक्रान्तम्। उद्देशतः एकदेशतः प्रयोजकाकारैः विभूत्युद्धारेणेत्यर्थः। तदभिप्रायेणाहकैश्चिदुपाधिभिः सङ्क्षेपत इति।