श्लोक · Shlok 6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः | अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ. ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate.
Translation · अर्थ
English
But to those who worship Me, renouncing all actions in Me, regarding Me as the supreme gaol, meditating on Me with single-minded Yoga.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
It is explicitly stated here that the devotees are very fortunate to be delivered very soon from material existence by the Lord. In pure devotional service one comes to the realization that God is great and that the individual soul is subordinate to Him. His duty is to render service to the Lord – and if he does not, then he will render service to māyā. As stated before, the Supreme Lord can be appreciated only by devotional service. Therefore, one should be fully devoted. One should fix his mind fully on Kṛṣṇa in order to achieve Him. One should work only for Kṛṣṇa. It does not matter in what kind of work one engages, but that work should be done only for Kṛṣṇa. That is the standard of devotional service. The devotee does not desire any achievement other than pleasing the Supreme Personality of Godhead. His life’s mission is to please Kṛṣṇa, and he can sacrifice everything for Kṛṣṇa’s satisfaction, just as Arjuna did in the Battle of Kurukṣetra. The process is very simple: one can devote himself in his occupation and engage at the same time in chanting Hare Kṛṣṇa, Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, Hare Hare/ Hare Rāma, Hare Rāma, Rāma Rāma, Hare Hare. Such transcendental chanting attracts the devotee to the Personality of Godhead. The Supreme Lord herein promises that without delay He will deliver a pure devotee thus engaged from the ocean of material existence. Those who are advanced in yoga practice can willfully transfer the soul to whatever planet they like by the yoga process, and others take the opportunity in various ways, but as far as the devotee is concerned, it is clearly stated here that the Lord Himself takes him. The devotee does not need to wait to become very experienced in order to transfer himself to the spiritual sky. In the Varāha Purāṇa this verse appears: nayāmi paramaṁ sthānam arcir-ādi-gatiṁ vinā garuḍa-skandham āropya yatheccham anivāritaḥ The purport of this verse is that a devotee does not need to practice aṣṭāṅga-yoga in order to transfer his soul to the spiritual planets. The responsibility is taken by the Supreme Lord Himself. He clearly states here that He Himself becomes the deliverer. A child is completely cared for by his parents, and thus his position is secure. Similarly, a devotee does not need to endeavor to transfer himself by yoga practice to other planets. Rather, the Supreme Lord, by His great mercy, comes at once, riding on His bird carrier Garuḍa, and at once delivers the devotee from material existence. Although a man who has fallen in the ocean may struggle very hard and may be very expert in swimming, he cannot save himself. But if someone comes and picks him up from the water, then he is easily rescued. Similarly, the Lord picks up the devotee from this material existence. One simply has to practice the easy process of Kṛṣṇa consciousness and fully engage himself in devotional service. Any intelligent man should always prefer the process of devotional service to all other paths. In the Nārāyaṇīya this is confirmed as follows: yā vai sādhana-sampattiḥ puruṣārtha-catuṣṭaye tayā vinā tad āpnoti naro nārāyaṇāśrayaḥ The purport of this verse is that one should not engage in the different processes of fruitive activity or cultivate knowledge by the mental speculative process. One who is devoted to the Supreme Personality can attain all the benefits derived from other yogic processes, speculation, rituals, sacrifices, charities, etc. That is the specific benediction of devotional service. Simply by chanting the holy name of Kṛṣṇa – Hare Kṛṣṇa, Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, Hare Hare/ Hare Rāma, Hare Rāma, Rāma Rāma, Hare Hare – a devotee of the Lord can approach the supreme destination easily and happily, but this destination cannot be approached by any other process of religion. The conclusion of Bhagavad-gītā is stated in the Eighteenth Chapter: sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ One should give up all other processes of self-realization and simply execute devotional service in Kṛṣṇa consciousness. That will enable one to reach the highest perfection of life. There is no need for one to consider the sinful actions of his past life, because the Supreme Lord fully takes charge of him. Therefore one should not futilely try to deliver himself in spiritual realization. Let everyone take shelter of the supreme omnipotent Godhead, Kṛṣṇa. That is the highest perfection of life.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
ये who? तु but? सर्वाणि all? कर्माणि actions? मयि in Me? संन्यस्य renouncing? मत्पराः regarding Me as the supreme goal? अनन्येन singleminded? एव even? योगेन with the Yoga? माम् Me? ध्यायन्तः meditating? उपासते worship.Commentary Ananya Yoga Unswerving Yoga exclusive? having no other objects of worship or support save the Lord Samadhi.Even in Bhakti Yoga one should not abandon actions. He must perform actions but he will have to dedicate the merits or the fruits to the Lord. (Cf.IX.27)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
See Commentary under 12.7
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--[ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने अनन्य भक्तके लक्षणोंमें तीन विध्यात्मक '(मत्कर्मकृत्, मत्परमः और मद्भक्तः)' और दो निषेधात्मक '(सङ्गवर्जितः' और 'निर्वैरः') पद दिये थे। उन्हीं पदोंका संकेत इस श्लोकमें इस प्रकार किया गया है -- (1) 'सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य' पदोंसे 'मत्कर्मकृत्' की ओर लक्ष्य है। (2) 'मत्पराः' पदसे 'मत्परमः' का संकेत है। (3) 'अनन्येनैव योगेन' पदोंमें 'मद्भक्तः' का लक्ष्य है। (4) भगवान्में ही अनन्यतापूर्वक लगे रहनेके कारण उनकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती अतः वे 'सङ्गवर्जितः' हैं। (5) कहीं भी आसक्ति न रहनेके कारण उनके मनमें किसीके प्रति भी वैर? द्वेष? क्रोध आदिका भाव नहीं रहता? इसलिये 'निर्वैरः' पदका भाव भी इसीके अन्तर्गत आ जाता है। परन्तु भगवान्ने इसे महत्त्व देनेके लिये आगे तेरहवें श्लोकमें सिद्ध भक्तोंके लक्षणोंमें सबसे पहले 'अद्वेष्टा' पदका प्रयोग किया है। अतः साधकको किसीमें किञ्चिन्मात्र भी द्वेष नहीं रखना चाहिये]। 'ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य'-- अब यहाँसे निर्गुणोपासनाकी अपेक्षा सगुणोपासनाकी सुगमता बतानेके लिये तु पदसे प्रकरणभेद करते हैं। यद्यपि 'कर्माणि' पद स्वयं ही बहुवचनान्त होनेसे सम्पूर्ण कर्मोंका बोध कराता है? तथापि इसके साथ सर्वाणि विशेषण देकर मन? वाणी? शरीरसे होनेवाले सभी लौकिक (शरीरनिर्वाह और आजीविकासम्बन्धी) एवं पारमार्थिक (जपध्यानसम्बन्धी) शास्त्रविहित कर्मोंका समावेश किया गया है (गीता 9। 27)। यहाँ 'मयि संन्यस्य' पदोंसे भगवान्का आशय क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करनेका नहीं है। कारण कि एक तो स्वरूपसे कर्मोंका त्याग सम्भव नहीं (गीता 3। 5 18। 11)। दूसरे? यदि सगुणोपासक मोहपूर्वक शास्त्रविहित क्रियाओंका स्वरूपसे त्याग करता है, तो उसका यह त्याग तामस होगा (गीता 18। 7) और यदि दुःखरूप समझकर शारीरिक क्लेशके भयसे वह उनका त्याग करता है, तो यह त्याग राजस होगा ( गीता 18। 8)। अतः इस रीतिसे त्याग करनेपर कर्मोंसे सम्बन्ध नहीं छूटेगा। कर्मबन्धनसे मुक्त होनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करे क्योंकि ममता, आसक्ति और फलेच्छासे किये गये कर्म ही बाँधनेवाले होते हैं। यदि साधकका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति होता है, तो वह पदार्थोंकी इच्छा नहीं करता और अपनेआपको भगवान्का समझनेके कारण उसकी ममता शरीरादिसे हटकर एक भगवान्में ही हो जाती है। स्वयं भगवान्के अर्पित होनेसे उसके सम्पूर्ण कर्म भी भगवदर्पित हो जाते हैं। भगवान्के लिये कर्म करनेके विषयमें कई प्रकार हैं, जिनको गीतामें मदर्पण कर्म, मदर्थ कर्म और,मत्कर्म नामसे कहा गया है। 1 -- मदर्पण कर्म उन कर्मोंको कहते हैं, जिनका उद्देश्य पहले कुछ और हो किन्तु कर्म करते समय अथवा कर्म करनेके बाद उनको भगवान्के अर्पण कर दिया जाय। 2 -- मदर्थ कर्म वे कर्म हैं, जो आरम्भसे ही भगवान्के लिये किये जायँ अथवा जो भगवत्सेवारूप हों। भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करना भगवान्की आज्ञा मानकर कर्म करना? और भगवान्की प्रसन्नताके लिये कर्म करना -- ये सभी भगवदर्थ कर्म हैं। 3 -- भगवान्का ही काम समझकर सम्पूर्ण लौकिक (व्यापार, नौकरी आदि) और भगवत्सम्बन्धी (जप, ध्यान आदि) कर्मोंको करना मत्कर्म है। वास्तवमें कर्म कैसे भी किये जायँ, उनका उद्देश्य एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही होना चाहिये।उपर्युक्त तीनों ही प्रकारों(मदर्पणकर्म, मदर्थकर्म, मत्कर्म)से सिद्धि प्राप्त करनेवाले साधकका कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता क्योंकि उसमें न तो फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान है और न पदार्थोंमें और शरीर, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंमें ममता ही है। जब कर्म करनेके साधन शरीर, मन, बुद्धि आदि ही अपने नहीं हैं, तो फिर कर्मोंमें ममता हो ही कैसे सकती है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही वास्तविक समर्पण है। सिद्ध पुरुषोंकी क्रियाओंका स्वतः ही समर्पण होता है और साधक पूर्ण समर्पणका उद्देश्य रखकर वैसे ही कर्म करनेकी चेष्टा करता है। जैसे भक्तियोगी अपनी क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, ऐसे ही ज्ञानयोगी क्रियाओंको प्रकृतिसे हुई समझकर अपनेको उनसे सर्वथा असङ्ग और निर्लिप्त अनुभव करके कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। 'मत्पराः'--परायण होनेका अर्थ है-- भगवान्को परमपूज्य और सर्वश्रेष्ठ समझकर भगवान्के प्रति समर्पण-भावसे रहना। सर्वथा भगवान्के परायण होनेसे सगुण-उपासक अपने-आपको भगवान्का यन्त्र समझता है। अतः शुभ क्रियाओंको वह भगवान्के द्वारा करवायी हुई मानता है, तथा संसारका उद्देश्य न रहनेके कारण उसमें भोगोंकी कामना नहीं रहती और कामना न रहनेके कारण उससे अशुभ क्रियाएँ होती ही नहीं। 'अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते'--इन पदोंमें इष्ट-सम्बन्धी और उपाय-सम्बन्धी--दोनों प्रकारकी अनन्यताका संकेत है; अर्थात् उन भक्तोंके इष्ट भगवान् ही हैं उनके सिवाय अन्य कोई साध्य उनकी दृष्टिमें है ही नहीं और उनकी प्राप्तिके लिये आश्रय भी उन्हींका है। वे भगवत्कृपासे ही साधनकी सिद्धि मानते हैं, अपने पुरुषार्थ या साधनके बलसे नहीं। वे उपाय भी भगवान्को मानते हैं और उपेय भी। वे एक भगवान्का ही लक्ष्य, ध्येय रखकर उपासना अर्थात् जप, ध्यान, कीर्तन आदि करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।12.6 -- 12.8।।येत्वित्यादि आस्थित इत्यन्तम्। प्रागुक्तोपदेशेन (S प्रागुपदेशेन) तु ये सर्वं मयि संन्यस्यन्ति? तेषामहं समुद्धर्त्ता सकलविघ्नादिक्लेशेभ्यः। चेतस आवेशनं व्याख्यातम्। तथा च एष एवोत्तमो योगः? अकृत्रिमत्त्वात्। तथा च मम स्तोत्रे -- विशिष्टकरणासनस्थितिसमाधिसंभावना विभाविततया यदा कमपि बोधमुल्लासयेत्।न सा तव सदोदिता स्वरसवाहिनी या चिति र्यतस्त्रितयसन्निधो स्फुटमिहापि संवेद्यते।।यदा तु विगतेन्धनः स्ववशवर्त्तितां संश्रय न्नकृत्रिमसमुल्लसत्पुलककम्पबाष्पानुगः।शरीरनिरपेक्षतां स्फुटमुपाददानश्चितः स्वयं झगिति बुध्यते युगपदेव बोधानलः।तदैव तव देवि तद्वपुरुपाश्रयैर्वर्जितं ( -- वपुरुपाशयैर्वर्जितं N -- वपुरुपाशयैर्वर्जितं (श्रितैर्वर्जितं) महेशमवबुध्यते विवशपाशसंक्षोभकम्।।इत्यादि।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
यद्यक्षरोपासका मामेवाप्नुवन्तीति विशिष्यन्ते तत्किं सगुणोपासकास्त्वां नाप्नुवन्ति न तेषामपि क्रमेण मत्प्राप्तेरित्याह -- ये त्विति। तुशब्दः शङ्कानिवृत्त्यर्थः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
।।12.6 -- 12.7।।अक्षरोपासका मामेव प्राप्नुवन्तीत्युक्त्या तेषां साक्षात्स्वप्राप्तियोग्यत्वमुक्तं ये तु पूर्वे ते तु बहुश्रवणादिनाधिकतरक्लेशमन्तरेणैव मद्दत्तज्ञानेन संसारान्मुच्यन्त इत्याशयेनाह -- ये त्विति द्वाभ्याम्। ये तु सगुणोपासकाः सर्वाणि कर्माणि मय परमेश्वरे संन्यस्य समर्प्य अहं परः परमपुरुषार्थत्वेनोपास्यो येषां ते मत्पराः न स्वर्गादिपरा एतादृशाः सन्तोऽनन्येनैव योगेन न विद्यते विश्वरुपं देवमात्मानमीश्वरमनन्तगुणनिधिं तत्तद्रूपेण भूतलेऽवतीर्णं मुक्त्वान्यदालम्बनं यस्य तेन योगेन समाधिना मां ध्यायन्तश्चिन्तयन्त उपासते मयि परमेश्वरे विश्वरुपे आवेशितं प्रवेशितं चित्तं येषां तेषां नचिरात् शीघ्रमेव मृत्युयुक्तात्संसारसमुद्रादहमुद्धर्ता भवामि। अनन्यभक्त्या संतुष्टः मन् बुद्धियोगं दत्त्वा,मूलाज्ञानसहिततत्कार्यरुपात्संसारादुद्धरामीत्यभिप्रायः। तदुक्तंमच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च। तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते। हे पार्थेति संबोधयन् यथा पृथासुतानां भवतां भक्त्या वशीकृतस्तत्तत्संकटादुद्धर्ता तथेति ध्वनयति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
।।12.6 -- 12.7।।नन्वव्यक्तोपासकानां क्लेशातिशयो गीतायां प्रतीयते? भगवदुपासकानां तु तदभावो न प्रतीयते? अतस्तदेतत्सर्वमिति कथमुक्तं इत्यत आह -- मदुपासकानामिति।भक्तानां इत्यनेन नान्यत्रात्यन्तमादर इति सूचयति। अत्रअनन्येनैव योगेन इत्यादिनाविनाऽव्यक्तोपासनम् इत्येतत्प्रतीयते। उपासन इत्येवोक्त्याऽतिशयोपासनाद्यभावः।न चिरात् इत्यनेन तत्रापीत्यादिकम्।तेषामहं समुद्धर्ता भवामि [12।1] इत्यनेन देवस्त्वित्यादिकं आगामिगीतावाक्यमपेक्ष्य प्राग्बुद्ध्यारोहाय तदुक्तमिति। अत्र श्रुत्यादिसम्मतिं चाह -- उक्तं चेति। तेषामार्तादीनां मध्ये गतिः साधनादिसम्पादकः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
।।12.6 -- 12.7।।मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित्क्लेश इति दर्शयति -- ये त्वित्यादिना। उक्तं च सौकरायणश्रुतौ -- उपासते ये पुरुषं वासुदेवमव्यक्तादेरीप्सितं किन्नु तेषाम् इति।तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठास्ते चैवानन्यदेवताः। अहमेव गतिस्तेषां निराशीः कर्मकारिणाम् इति च मोक्षधर्मे [म.भा.12]।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
।।12.6 -- 12.7।।ननु फलैक्ये क्लेशाल्पत्वाधिक्याभ्यामुत्कर्षनिष्कर्षौ स्यातां तदेव तु नास्ति। निर्गुणब्रह्मविदां हि फलमविद्यातत्कार्यनिवृत्त्या निर्विशेषपरमानन्दबोधब्रह्मरूपता सगुणब्रह्मविदां त्वधिष्ठानप्रमाया अभावेनाविद्यानिवृत्त्यभावादैश्वर्यविशेषः कार्यब्रह्मलोकगतानां फलम्। अतः फलाधिक्यार्थमायासाधिक्यं न न्यूनतामापादयतीति चेत् न। सगुणोपासनया निरस्तसर्वप्रतिबन्धानां विना गुरूपदेशं विना च श्रवणमनननिदिध्यासनाद्यावृत्तिक्लेशं स्वयमाविर्भूतेन वेदान्तवाक्येनेश्वरप्रसादसहकृतेन तत्त्वज्ञानोदयादविद्यातत्कार्यनिवृत्त्या ब्रह्मलोक ऐश्वर्यभोगान्ते निर्गुणविद्याफलपरमकैवल्योपपत्तेःस एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते इति श्रुतेः संप्राप्तहिरण्यगर्भैश्वर्यः भोगान्ते एतस्माज्जीवघनात्ससर्वजीवसमष्टिरूपात्पराच्छ्रेष्ठात् हिरण्यगर्भात्परं विलक्षणं श्रेष्ठं च पुरिशयं स्वहृदयगुहानिविष्टं पुरुषं पूर्णं प्रत्यगभिन्नमद्वितीयं परमात्मानमीक्षते स्वयमाविर्भूतेन वेदान्तप्रमाणेन साक्षात्करोति तावता च मुक्तो भवतीत्यर्थः। तथाच विनापि प्रागुक्तक्लेशेन सगुणब्रह्मविदामीश्वरप्रसादेन निर्गुणब्रह्मविद्याफलप्राप्तिरितीममर्थमाह द्वाभ्याम् -- ये त्वित्यादिना। तुशब्द उक्ताशङ्कानिवृत्त्यर्थः। ये सर्वाणि कर्माणि मयि सगुणे वासुदेवे संन्यस्य समर्प्य मत्परा अहं भगवान् वासुदेव एव परः प्रकृष्टप्रीतिविषयो येषां ते तथा सन्तोऽनन्येनैव योगेन न विद्यते मां भगवन्तं मुक्त्वाऽन्यदालम्बनं यस्य तादृशेनैव योगेन समाधिना एकान्तभक्तियोगापरनाम्ना मां भगवन्तं वासुदेवं सकलसौन्दर्यसारनिधानमानन्दघनविग्रहं द्विभुजं चतुर्भुजं वा समस्तजनमनोमोहिनीं मुरलीमतिमनोहरैः सप्तभिः स्वरैरापूरयन्तं वा,दरकमलकौमोदकीरथाङ्गसङ्गिपाणिपल्लवं वा नरसिंहत्वादिरूपं वा परमकारुणिकं सुन्दरसुन्दरं श्रीमद्रघुनन्दनरूपं वराहादिरूपं वा यथादर्शितविश्वरूपं वा ध्यायन्तश्चिन्तयन्त उपासते समानाकारमविच्छिन्नं चित्तवृत्तिप्रवाहं संतन्वते समीपवर्तितया आसते तिष्ठन्ति वा तेषां मय्याववेशितचेतसां मयि यथोक्ते आवेशितमेकाग्रतया प्रवेशितं चेतो यैस्तेषामहं सततोपासितो भगवान् मृत्युसंसारसागरात् मृत्युयुक्तो यः संसारः मिथ्याज्ञानतत्कार्यप्रपञ्चः स एव सागर इव दुरुत्तरस्तस्मात्समुद्धर्ता सम्यगनायासेन उदूर्ध्वे सर्वबाधावधिभूते शुद्धे ब्रह्मणि धर्ता धारयिता ज्ञानावष्टम्भदानेन भवामि नचिरात् क्षिप्रमेव तस्मिन्नेव जन्मनि। हे पार्थेति संबोधनमाश्वासार्थम्।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
ननु अव्यक्तासक्तचेतसां क्लेशाधिक्येऽपि क्लेशान्ते सद्यः कैवल्यसिद्धिरस्तीति किं विलम्बसाध्येन व्यक्तभावनेनेत्याशङ्क्याह -- ये त्विति द्वाभ्याम्। सर्वाणि नित्यनैमित्तिकस्वाभाविकादीनि संन्यस्य समर्प्य मत्परा अहमेव परः सर्वकर्मभिः प्राप्यो येषां ते मत्पराः मद्ध्यानपरा वा। अनन्येन भेदशून्येन अहमेव भगवान्वासुदेव इति परमेश्वरेऽहंग्रहलक्षणेन योगेन चेतःसमाधानेन मां ध्यायन्त उपासते तत्रैव ध्याने स्थैर्यं लभन्ते।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
अक्षरोपासकानां साक्षात्कारेऽपि क्लेशः? मद्भक्तानां तु मत्स्वरूपध्यानेन मत्प्रतिमादिसेवतामप्यहमुद्धारं करोमीत्याह -- ये त्विति द्वाभ्याम्। ये तु सर्वाणि लौकिकवैदिकादीनि मयि मन्निमित्तं सन्न्यस्य त्यागं कृत्वा? मत्पराः अहमेव पर उत्कृष्टः प्राप्यो येषां तादृशाः सन्तोऽनन्येनैव योगेन? नैव अन्यो भजनीयो यस्मिंस्तादृशेन भक्तियोगेन मां ध्यायन्तः मद्ध्यानं कुर्वन्त उपासते सेवन्ते मूर्त्यादिष्विति शेषः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
ये तु लौकिकानि देहयात्राशेषभूतानि देहधारणार्थानि च अशनादीनि कर्माणि? वैदिकानि च यागदानहोमतपःप्रभृतीनि सर्वाणि सकारणानि सोद्देश्यानि अध्यात्मचेतसा मयि संन्यस्य? मत्पराः मदेकप्राप्याः,अनन्येन एव योगेन मां ध्यायन्तः उपासते? ध्यानार्चनप्रणामस्तुतिकीर्तनादीनि स्वयम् एव अत्यर्थप्रियाणि प्राप्यसमानि कुर्वन्तो माम् उपासते इत्यर्थः। तेषां मत्प्राप्तिविरोधितया मृत्युभूतान् संसाराख्यात् सागराद् अहम् अचिरेण एव कालेन समुद्धर्ता भवामि।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि ईश्वरे संन्यस्य मत्पराः अहं परः येषां ते मत्पराः सन्तः अनन्येनैव अविद्यमानम् अन्यत् आलम्बनं विश्वरूपं देवम् आत्मानं मुक्त्वा यस्य सः अनन्यः तेन अनन्येनैव केन योगेन समाधिना मां ध्यायन्तः चिन्तयन्तः उपासते।।तेषां किम् --,
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
मद्भक्तानां मत्प्रसादादनायासत एव सिद्धिर्भवतीत्याह -- ये त्विति द्वाभ्याम्। मयि परमेश्वरे सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य समर्प्य मत्परा भूत्वा मां ध्यायन्त अनन्येन न विद्यतेऽन्यो भजनीयो यस्मिंस्तेनैव। एकान्तभक्तियोगेनोपासत इत्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
एवमक्षरोपासकानां गतिमुक्त्वा स्वभक्तानामाह द्वाभ्याम् -- ये त्विति। तुशब्दः पूर्वेभ्यो भेदनिर्देशार्थः।,मयि स्वामिनि सेव्ये स्वस्य सर्वकर्माणि सन्न्यस्य लौकिकानि वैदिकानि च समर्प्य अनन्येनोक्तलक्षणैकभक्तियोगेन मां ध्यायन्त उपासते ध्यानार्चनसेवनप्रणामश्रुतिकीर्तनादीनि स्वयमेवात्यन्तप्रियाणि प्राप्य सरूपाणि कुर्वन्तो,मामुपासत इत्यर्थः। तेषां मत्प्राप्तिविरोधिमृत्युसंसारसागरादहमचिरेणैव समुद्धर्त्ताऽस्मि। अथवा मयि परमात्मनि नित्यप्रिये सति मन्निमित्तं वा लौकिकवैदिकानि सर्वाणि कर्माणि सन्त्यज्य बहिरन्तश्च त्यक्त्वा सद्व्रजप्रिया यच्छब्दवाच्यास्तु मत्पराः अनन्येनैव सर्वनिरपेक्षेणैव योगेन अनुवृत्तिमात्रसम्बन्धेनैव मां परमात्मप्रियं चिन्तयन्तो मत्समीप आसते।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
ये तु सर्वाणि इति।देहयात्राशेषभूतानि कृष्यादीनिसकारणानि? सन्ध्यावन्दनसहितानिसोद्देश्यानि स्वर्गाद्युद्देशेन चोदितानि।अध्यात्मचेतसा आत्मनि परमात्मनि यच्चेतः? तदध्यात्मम् तेन चेतसा। मत्पराः अहं परः परमप्राप्यं येषां ते मत्परा इति हृदि निधायमदेप्राकप्या इत्युक्तम्।अनन्यप्रयोजनेनेति उपलक्षणं भगवद्ध्यानंसततं कीर्तयन्तः [9।14] इत्याद्युक्तानाम्। भगवत्प्राप्त्युपाये प्रयोजनत्वधीर्भवति तद्बुद्धेर्विधिरिति भावः।स्वयमेवेति -- न तु फलापेक्षयेत्यर्थः।मृत्युभूतात्संसाराख्यादिति -- निषादस्थपतिन्यायात्समानाधिकरणसमास उचितः। हेयत्वार्थं च विशेषणमत्रोपयुक्तमिति भावः।मत्प्राप्तिविरोधितयेति मृत्युत्वोपचारनिमित्तम्। सत्यां हि भगवत्प्राप्तौ अमृतत्वम्।न इत्यस्य व्यस्ततया क्रियान्वयभ्रमव्युदासायअचिरेणैव कालेन समुद्धर्तेत्यन्वय उक्तः।