श्लोक · Shlok 6
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च | इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥
mahābhūtānyahaṃkāro buddhiravyaktameva ca. indriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriyagocarāḥ.
Translation · अर्थ
English
The great elements, egoism, intellect, and also the Unmanifested Nature, the ten senses and one (mind), and the five objects of the senses.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
From all the authoritative statements of the great sages, the Vedic hymns and the aphorisms of the Vedānta-sūtra, the components of this world can be understood as follows. First there are earth, water, fire, air and ether. These are the five great elements ( mahā-bhūta ). Then there are false ego, intelligence and the unmanifested stage of the three modes of nature. Then there are five senses for acquiring knowledge: the eyes, ears, nose, tongue and skin. Then five working senses: voice, legs, hands, anus and genitals. Then, above the senses, there is the mind, which is within and which can be called the sense within. Therefore, including the mind, there are eleven senses altogether. Then there are the five objects of the senses: smell, taste, form, touch and sound. Now the aggregate of these twenty-four elements is called the field of activity. If one makes an analytical study of these twenty-four subjects, then he can very well understand the field of activity. Then there are desire, hatred, happiness and distress, which are interactions, representations of the five great elements in the gross body. The living symptoms, represented by consciousness, and convictions are the manifestation of the subtle body – mind, ego and intelligence. These subtle elements are included within the field of activities. The five great elements are a gross representation of the false ego, which in turn represents the primal stage of false ego technically called the materialistic conception, or tāmasa-buddhi, intelligence in ignorance. This, further, represents the unmanifested stage of the three modes of material nature. The unmanifested modes of material nature are called pradhāna. One who desires to know the twenty-four elements in detail along with their interactions should study the philosophy in more detail. In Bhagavad-gītā, a summary only is given. The body is the representation of all these factors, and there are changes of the body, which are six in number: the body is born, it grows, it stays, it produces by-products, then it begins to decay, and at the last stage it vanishes. Therefore the field is a nonpermanent material thing. However, the kṣetra-jña, the knower of the field, its proprietor, is different.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
महाभूतानि the great elements? अहङ्कारः egoism? बुद्धिः intellect? अव्यक्तम् the unmanifested (MulaPrakriti)? एव even? च and? इन्द्रियाणि the senses? दश ten? एकम् one? च and? पञ्च five? च and? इन्द्रियगोचराः objects of the senses.Commentary The field and its modifications are described in this verse. The twentyfour principles of the Sankhya school of philosophy are mentioned here.Great elements Earth? water? fire? air and ether are so called because they pervade all modifications of matter. The elements here referred to are the subtle? not the gross ones.Egoism is the cause of the great elements. It is the selfarrogating principle. Intellect is the cause of egoism. The function of the intellect is determination. Buddhi is the faculty of determination. The cause of the intellect is the Unmanifested (which is the undifferentiated energy of the Lord). (Cf.VII.14 Daivi hyesha gunamayi mama maya duratyaya -- This divine illusion of Mine? caused by the alities? is difficult to cross over.) The above Nature is divided eightfold (Cf.VII.4).The ten senses are the five organs of knowledge (ears? skin? eyes? tongue and nose)? so called because they enable the mind to get knowledge of the external world? and the five organs of action (hands? feet? mouth? anus and the generative organ)? so called because they perform actions.The one This is the mind. This is the eleventh sense whose function is thinking and doubting (Sankalpa and Vikalpa).The five objects of the senses are sound? touch? form (colour)? taste and smell. These are the fivefol pastures of the senses.All the great elements? egoism? intellect? the senses and mind are all absorbed in the Unmanifested at the time of the cosmic dissolution.Mind is Maya. Mind is Avidya (ignorance). Mind is at the root of all activities. It gives strength to desires? fosters fear and builds castles in the air. It confers force on egoism and stimultates,aspirations. Every tendency has its origin in the mind. It augments passions? gives strength to hope and awakens the sense of duality. It increases ignorance and plunges the senses in the ocean of senseobjects. It creates distinctions and differences. It separates? divides and limits. It is a strong wall or an iron barrier that stands between the individual soul and the Absolute. It is this mind that has brought Brahman to the condition of the individual soul. It is the storehouse of error? cravings? doubt? delusion and ignorance. It is an everrevolving wheel that generates thoughts. It is a miraculous thoughtproducing machine. It creates at one moment. It destroys at the next moment.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
See Commentary under 13.7
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या -- अव्यक्तमेव च -- अव्यक्त नाम मूल प्रकृतिका है। मूल प्रकृति समष्टि बुद्धिका कारण होनेसे और स्वयं किसीका भी कार्य न होनेसे केवल प्रकृति ही है।बुद्धिः -- यह पद समष्टि बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वका वाचक है। इस बुद्धिसे अहंकार पैदा होता है? इसलिये यह प्रकृति है और मूल प्रकृतिका कार्य होनेसे यह विकृति है। तात्पर्य है कि यह बुद्धि प्रकृतिविकृति है।अहंकारः -- यह पद समष्टि अहंकारका वाचक है। इसको अहंभाव भी कहते हैं। पञ्चमहाभूतका कारण होनेसे यह अहंकार प्रकृति है और बुद्धिका कार्य होनेसे यह विकृति है। तात्पर्य है कि यह अहंकार प्रकृतिविकृति है।महाभूतानि -- पृथ्वी? जल? तेज? वायु और आकाश -- ये पाँच महाभूत हैं। महाभूत दो प्रकारके होते हैं -- पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत। एकएक महाभूतके पाँच विभाग होकर जो मिश्रण होता है? उसको,पञ्चीकृत महाभूत कहते हैं (टिप्पणी प0 673)। इन पाँच महाभूतोंके विभाग न होनेपर इनको,अपञ्चीकृत महाभूत कहते हैं। यहाँ इन्हीं अपञ्चीकृत महाभूतोंका वाचक महाभूतानि पद है। इन महाभूतोंको पञ्चतन्मात्राएँ तथा सूक्ष्ममहाभूत भी कहते हैं।दस इन्द्रियाँ? एक मन और शब्दादि पाँच विषयोंके कारण होनेसे ये महाभूत प्रकृति हैं और अहंकारके कार्य होनेसे ये विकृति हैं। तात्पर्य है कि ये पञ्चमहाभूत प्रकृतिविकृति हैं।इन्द्रियाणि दश -- श्रोत्र? त्वचा? नेत्र? रसना और घ्राण -- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक्? पाणि? पाद? उपस्थ और पायु -- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। ये दसों इन्द्रियाँ अपञ्चीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे केवल विकृति ही हैं।एकं च -- अपञ्चीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीका भी कारण न होनेसे मन केवल,विकृति ही है।पञ्च चेन्द्रियगोचराः -- शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- ये (पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके) पाँच विषय हैं। अपञ्चीकृत महाभूतोंसे पैदा होनेसे और स्वयं किसीके भी कारण न होनेसे ये पाँचों विषय केवल विकृति ही हैं।इन सबका निष्कर्ष यह निकला कि पाँच महाभूत? एक अहंकार और एक बुद्धि -- ये सात प्रकृतिविकृति हैं? मूल प्रकृति केवल प्रकृति है और दस इन्द्रियाँ? एक मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय -- ये सोलह केवल विकृति हैं। इस तरह इन चौबीस तत्त्वोंके समुदायका नाम क्षेत्र है। इसीका एक तुच्छ अंश यह मनुष्यशरीर है? जिसको भगवान्ने पहले श्लोकमें इदं शरीरम् और तीसरे श्लोकमें तत्क्षेत्रम् पदसे कहा है।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।13.6 -- 13.7।।महाभूतानीति। इच्छेति। अव्यक्तम् प्रकृतिः। इन्द्रियाणि मनसा सह एकादश। इन्द्रियगोचराः रूपादयः पंच। चेतना दृक्छक्तिः पुरुषः। धृतिरिति -- अन्ते (?N अत्रान्ते किल) किल सर्वस्य आ ब्रह्मणः क्रिमिपर्यन्तस्य प्रारब्धे निष्पन्ने वा कार्ये कामक्रोधादिषु च इयतैव मम पर्याप्तं? किमन्येन ईदृशश्चाहं नित्यमेव भूयासम् इति प्राणसन्धारिणी (S?N -- संधारणी -- साधारणी) धृतिः आश्वासनात्मिका पररहस्यशासनेषु रागशब्दवाच्या जायते।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
अव्यक्ताहंकारादीनां त्रैगुण्याभिमानादिधर्मकत्वं प्रसिद्धमिति शब्दादीनामेव ग्रहणे कर्मेन्द्रियाणां विषयानुक्तेर्वैरूप्यप्रसङ्गात्क्षेत्रनिरूपणस्य च प्रकृतत्वात्स्वरूपनिर्देशेनैव तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्वेति व्याख्यातमिदानीमिच्छादीनामात्मविकारत्वनिवृत्तये क्षेत्रविकारत्वनिरूपणेन यद्विकारीत्येतन्निरूपयन्मतान्तरनिवृत्तिपरत्वेन श्लोकमवतारयति -- अथेति। सर्वज्ञोक्तिविरोधाद्धेयं वैशेषिकं मतमिति मत्वोक्तं -- भगवानिति। उपलब्धजातीयस्योपलभ्यमानस्यादानेच्छायां हेतुमाह -- सुखेति। इतिशब्दो हेत्वर्थः। सुखहेतुत्वात्तस्मिन्निच्छेत्यर्थः। इच्छां सुखतद्धेतुविषयत्वेन व्याख्यायात्मधर्मत्वं तस्या व्युदस्यति -- सेयमिति। तथापि कथं क्षेत्रान्तर्भूतत्वं तत्राह -- ज्ञेयत्वादिति। इच्छावद्द्वेषोऽपि धर्मो बुद्धेरित्याह -- तथेति। कोऽसौ द्वेषो यस्य बुद्धिधर्मत्वं तत्राह -- यज्जातीयमिति। तस्यापीच्छावत्क्षेत्रान्तर्भावमाह -- सोऽयमिति। इच्छाद्वेषवद्बुद्धिधर्मः सुखमपीत्याह -- तथेति। तस्यापि स्वरूपोक्त्या क्षेत्रान्तःपातित्वमाह -- अनुकूलमिति। दुःखस्यापि स्वरूपोक्त्या क्षेत्रमध्यवर्तित्वमाह -- दुःखमिति। देहेन्द्रियात्मवादौ व्युदसितुं क्षेत्रान्तर्भूतमेव संघातं विभजते -- देहेति। विज्ञानवादं प्रत्याह -- तस्यामिति। तप्ते लोहपिण्डे वह्नेरभिव्यक्तिवदुक्तसंहतौ बुद्धिवृत्तिरभिव्यज्यते। तत्र चाग्निरभिव्यक्तो लोहपिण्डमेवाग्निबुद्ध्या ग्राहयति। तथात्मचैतन्यं बुद्धिवृत्तावभिव्यक्तं तामेवात्मतया बोधयत्यतस्तदाभासानुविद्धा सैव चेतनेत्युच्यते। सा च मुख्यचेतनं प्रति ज्ञेयत्वादतद्रूपत्वात्क्षेत्रमेवेत्यर्थः। धृतिस्वरूपोक्त्या क्षेत्रत्वं तस्या दर्शयति -- धृतिरित्यादिना। नन्वन्येऽपि संकल्पादयो मनोधर्माः सन्ति ते किमित्यत्र क्षेत्रत्वेन नोच्यन्ते तत्राह -- सर्वेति। तस्योपलक्षणार्थत्वे हेतुमाह -- यत इति। इच्छादिवदस्मिन्नवसरे संकल्पादीनामपि दर्शितत्वं सिद्धवत्कृत्य प्रकरणविभागार्थं यतो भगवदुक्तं क्षेत्रमुपसंहरत्यतो युक्तमिच्छादिग्रहस्य सर्वानुक्तबुद्धिधर्मोपलक्षणार्थत्वमित्यर्थः। विरक्तस्य ज्ञानाधिकाराय वैराग्यार्थं क्षेत्रं व्याख्यातमित्यनुवदति -- यस्येति। क्षेत्रभेदजातस्य व्यष्टिदेहविभागस्य सर्वस्येत्यर्थः। संहतिः समष्टिशरीरम्।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवं क्षेत्रादियाथात्म्यस्तुत्याभिमुखीकृतायार्जनाय किं तदिति जिज्ञासवे यथोद्देशं क्षेत्रं निर्दिशति -- महाभूतानीति। सर्बविकारव्यापकत्वान्महान्ति च तानि भूतानि सूक्ष्माणि अहंप्रत्ययरुपोहंकारः महाभूतकारण बुद्धिरध्वसायलक्षणाहंकारकारणं न व्यकतव्यक्तं अव्याकृतमीश्वरशक्तिर्मायामायां तु प्रकृतिं विद्यात्?मम माया दुरत्यया इत्युक्ता। एवशब्दोऽवधारणार्थः। एतावत्येवाष्टधा भिन्ना प्रकृतिरित्यर्थः। चकारः मूलप्रकृत्या सह तन्मात्रादिभेदानां समुच्चयार्थः। इन्द्रियाणि दश श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाख्यानि ज्ञानोत्पादकत्वाज्ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च? वाक्पाणिपादपायुपस्थाख्यानि कर्मनिर्वर्तकत्वात्मकर्मेन्द्रियाणि पञ्च एकं एकादशं संकल्पविकल्पात्मकं मनः पञ्चेन्द्रियाणां गोचराः विषयाः शब्दस्पर्शरुपरसगन्धाख्यगुणविशिष्टानि स्थूलभूतानीत्यर्थः। तान्येतानिमूलप्रकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।,षोडशकस्तु विकारः इति वादिनः सांख्याश्चतुर्विशतितत्त्वानि व्याचक्षते।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
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Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
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Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
एवं प्ररोचितायार्जुनाय क्षेत्रस्वरूपं तावदाहद्वाभ्याम् -- महाभूतानीत्यादिना। महान्ति भूतानि भूम्यादीनि पञ्च? अहंकारस्तत्कारणभूतोऽभिमानलक्षणः? बुद्धिरहंकारकारणं महत्तत्त्वमध्यवसायलक्षणं? अव्यक्तं तत्कारणं सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकं प्रधानं सर्वकारणं न कस्यापि कार्यम्। एवकारः प्रकृत्यवधारणार्थः। एतावत्येवाष्टधा प्रकृतिः। चशब्दो भेदसमुच्चयार्थः। तदेवं सांख्यमतेन व्याख्यातम्। औपनिषदानां तु अव्यक्तमव्याकृतमनिर्वचनीयं मायाख्या पारमेश्वरी शक्तिर्मम माया दुरत्ययेत्युक्तम्। बुद्धिः सर्गादौ सद्विषयमीक्षणं? अहंकार ईक्षणानन्तरमहं बहु स्यामिति संकल्पः। तत आकाशादिक्रमेण पञ्चभूतोत्पत्तिरिति। न ह्यव्यक्तमहदहंकाराः सांख्यसिद्धा औपनिषदैरुपगम्यन्ते। अशब्दत्वादिहेतुभिरिति स्थितंमायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् इति श्रुतिप्रतिपादितमव्यक्तम्। तदैक्षतेतीक्षणरूपा बुद्धिः।बहुस्यां प्रजायेय इति बहुभवनसंकल्परूपोऽहंकारःतस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूत आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी इति पञ्चभूतानि श्रौतानि। अयमेव पक्षः साधीयान्। इन्द्रियाणि दशैकं च श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाख्यानि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि? वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणीति। तानि एकं च मनः संकल्पविकल्पाद्यात्मकं? पञ्च चेन्द्रियगोचराः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धास्ते बुद्धीन्द्रियाणां ज्ञाप्यत्वेन विषयः कर्मेन्द्रियाणां तु कार्यत्वेन। तान्येतानि सांख्याश्चतुर्विंशतितत्त्वान्याचक्षते।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
तच्च यच्च यादृक् च यद्विकारि चेत्येतद्व्याचष्टे -- महाभूतानीति। चकारो भिन्नक्रमो बुद्धिश्चेति बुद्धिपदादुपरि द्रष्टव्यः। यत्क्षेत्रं शरीराख्यमुक्तं तदव्यक्तमेव।शरीरं रथमेव तु इति श्रुतौ अव्यक्तपदेन पञ्चतन्मात्रा उच्यन्ते। अहंकारो तत्प्रकारमाह -- महाभूतान्यहंकारो बुद्धिश्चेति सप्तप्रकारैरङ्कुरितम्। महाभूतशब्देन पञ्चतन्मात्रा उच्यन्ते। अहंकारो बुद्धिरिति महत्तत्त्वमुच्यते। स्वप्ने हि एतान्येव करणानि भासन्ते तत्प्रकारक एव भूतगण इति तावत्प्रकारकमेव क्षेत्रमित्युक्तम्। यद्विकारीत्यस्योत्तरमाह -- इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणि दशैकं चेत्येकादश। पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुरसनघ्राणानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि मनश्चेत्येकादश। इन्द्रियाणां गोचरा विषयाः स्थूला वियदादयः पञ्च अयं षोडशको विकार एव। एतान्येव सांख्यैश्चतुर्विंशतितत्त्वानि गण्यन्ते। एतावांस्त्वस्माकं विशेषः। तैः स्वतन्त्रा सत्या च प्रकृतिरुच्यते अस्माभिर्मायारूपा मिथ्या ईश्वराधीना चोच्यत इति। तथा च श्रुतिःमायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इति। तस्मात्सांख्यप्रक्रियात्र भगवताश्रितेति न भ्रमितव्यम्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
तत्क्षेत्रस्वरूपमाह द्वयेन -- महाभूतानीति। महाभूतानि पृथिव्यादीनि। अहङ्कारस्तत्कारणात्मकः। बुद्धिर्विज्ञानात्मिका। अव्यक्तं मूलप्रकृतिः। इन्द्रियाणि दश। च पुनः एकं मनः। इन्द्रियगोचरास्तन्मात्रात्मकाः शब्दादयः पञ्च। एवं चतुर्विंशतितत्त्वानि प्रतिपादितानि।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखम् इति क्षेत्रकार्याणि क्षेत्रविकाराः उच्यन्ते यद्यपि इच्छाद्वेषसुखदुःखानि आत्मधर्मभूतानि? तथापि आत्मनः क्षेत्रसंबन्धप्रयुक्तानि इति क्षेत्रकार्यतया क्षेत्रविकारा उच्यन्ते। तेषां पुरुष धर्मत्वम्पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते (गीता 13।20) इति वक्ष्यते। संघातः चेतनाधृतिः? आधृतिः आधारः? सुखदुःखे भुञ्जानस्य भोगापवर्गौ साधयतः च चेतनस्य आधारतया उत्पन्नो भूतसंघातः? प्रकृत्यादिपृथिव्यन्तद्रव्यारब्धम् इन्द्रियाश्रयभूतम्? इच्छाद्वेषसुखदुःखविकारिभूतसंघातरूपं,चेतनसुखदुःखोपभोगाधारत्वप्रयोजनं क्षेत्रम् इति उक्तं भवति।एतत् क्षेत्रं समासेन संक्षेपेण सविकारं सकार्यम् उदाहृतम्।अथ क्षेत्रकार्येषु आत्मज्ञानसाधनतया उपादेया गुणाः प्रोच्यन्ते --
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
-- महाभूतानि महान्ति च तानि सर्वविकारव्यापकत्वात् भूतानि च सूक्ष्माणि। स्थूलानि तु इन्द्रियगोचरशब्देन अभिधायिष्यन्ते अहंकारः महाभूतकारणम् अहंप्रत्ययलक्षणः। अहंकारकारणं बुद्धिः अध्यवसायलक्षणा। तत्कारणम् अव्यक्तमेव च? न व्यक्तम् अव्यक्तम् अव्याकृतम् ईश्वरशक्तिः मम माया दुरत्यया (गीता 7।14) इत्युक्तम्। एवशब्दः प्रकृत्यवधारणार्थः एतावत्येव अष्टधा भिन्ना प्रकृतिः। चशब्दः भेदसमुच्चयार्थः। इन्द्रियाणि दश? श्रोत्रादीनि पञ्च बुद्ध्युत्पादकत्वात् बुद्धीन्द्रियाणि? वाक्पाण्यादीनि पञ्च कर्मनिर्वर्तकत्वात् कर्मेन्द्रियाणि तानि दश। एकं च किं तत् मनः एकादशं संकल्पाद्यात्मकम्। पञ्च च इन्द्रियगोचराः शब्दादयो विषयाः। तानि एतानि सांख्याः चतुर्विंशतितत्त्वानि आचक्षते।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
तत्र क्षेत्रस्वरूपमाह -- महाभूतानीति द्वाभ्याम्। महाभूतानि भूम्यादीनि पञ्च? अहंकारस्तत्कारणभूतः? बुद्धिर्विज्ञानात्मकं महत्तत्त्वं? अव्यक्तं मूलप्रकृतिः? इन्द्रियाणि बाह्यानि दशश्रोत्रत्वग्घ्राणदृग्जिह्वावाग्दोर्मेढ्राङ्घ्रिपायवः इति? एकं च मनः? इन्द्रियगोचराश्च पञ्चतन्मात्ररूपा एव शब्दादय आकाशादिविशेषगुणतया व्यक्ताः सन्त इन्द्रियविषयाः पञ्च? तदेवं चतुर्विंशतितत्त्वान्युक्तानि।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
महाभूतेति। तत् क्षेत्रं यद्द्रव्यं तन्महाभूतद्रव्यात्मकं स्थूलं यादृक्च अहङ्कारबुद्धिमहतामेकादशेन्द्रियविषयाणां लिङ्गशरीरसूक्ष्मभूतानां चाश्रयभूतम्।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च [13।4] इत्यादौयच्च इति प्रतिज्ञातस्यमहाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च इत्येतत्प्रतिपादकमित्यभिप्रायेणाहमहाभूतानीत्यारभ्य इतिक्षेत्रारम्भकद्रव्याणीति। भूतशब्दस्य सशरीरचेतनादावपि प्रयोगात्तद्भ्रमव्युदासाय प्रकृतोपयुक्तमर्थमाहपृथिव्यप्तेज इति। अहङ्कारशब्दस्य त्रिविधाहङ्कारवाचित्वेऽपि सात्त्विकाहङ्कारस्येन्द्रियारम्भकत्वात् राजसस्योभयानुग्राहकत्वात्तामसपरत्वमाह -- अहङ्कार इति। बुद्धिशब्दस्याध्यवसायपरत्वभ्रमव्युदासायाह -- बुद्धिर्महानिति। अव्यक्तशब्दस्य अव्यक्तमक्षरे (वि) लीयते [सुबालो.2] इत्युक्ताव्यक्तपरत्वे तत्कारणमपि वक्तव्यं स्यादित्यभिप्रयंस्तद्व्याचष्टे -- अव्यक्तं प्रकृतिरिति।इन्द्रियाणि दशैकं च इत्यादिकंयादृक्च इति प्रतिज्ञातस्य प्रतिपादकमित्यभिप्रायेणाह -- इन्द्रियाणि दशेत्यारभ्य इति क्षेत्राश्रितानि तत्त्वानीति। इन्द्रियाणामेकादशत्वव्यक्तीकरणाय तद्गोचरा इत्युक्तपञ्चसङ्ख्यास्पष्टीकरणाय चत्वक्चक्षुर्नासिका जिह्वा श्रोत्रमत्र च पञ्चमम्। शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि च द्विज। पायूपस्थौ करौ पादौ वाक्च मैत्रेय पञ्चमी। विसर्गशिल्पगत्युक्ति कर्म तेषां च कथ्यते। एकादशं मनश्चात्र [वि.पु.1।2।48?49] इति पराशरोक्त्यनुसारेण तानि इन्द्रियार्थांश्च विशेषतः कथयतिश्रोत्रत्वगित्यादिना।