श्लोक · Shlok 24
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ | ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
tasmācchāstraṃ pramāṇaṃ te kāryākāryavyavasthitau. jñātvā śāstravidhānoktaṃ karma kartumihārhasi.
Translation · अर्थ
English
Therefore, let the scripture be thy authority in determining what ought to be done and what ought not to be done. Having known what is said in the ordinance of the scriptures, thou shouldst act here in this world.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
As stated in the Fifteenth Chapter, all the rules and regulations of the Vedas are meant for knowing Kṛṣṇa. If one understands Kṛṣṇa from the Bhagavad-gītā and becomes situated in Kṛṣṇa consciousness, engaging himself in devotional service, he has reached the highest perfection of knowledge offered by the Vedic literature. Lord Caitanya Mahāprabhu made this process very easy: He asked people simply to chant Hare Kṛṣṇa, Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, Hare Hare/ Hare Rāma, Hare Rāma, Rāma Rāma, Hare Hare and to engage in the devotional service of the Lord and eat the remnants of foodstuff offered to the Deity. One who is directly engaged in all these devotional activities is to be understood as having studied all Vedic literature. He has come to the conclusion perfectly. Of course, for the ordinary persons who are not in Kṛṣṇa consciousness or who are not engaged in devotional service, what is to be done and what is not to be done must be decided by the injunctions of the Vedas. One should act accordingly, without argument. That is called following the principles of śāstra, or scripture. Śāstra is without the four principal defects that are visible in the conditioned soul: imperfect senses, the propensity for cheating, certainty of committing mistakes, and certainty of being illusioned. These four principal defects in conditioned life disqualify one from putting forth rules and regulations. Therefore, the rules and regulations as described in the śāstra – being above these defects – are accepted without alteration by all great saints, ācāryas and great souls. In India there are many parties of spiritual understanding, generally classified as two: the impersonalist and the personalist. Both of them, however, lead their lives according to the principles of the Vedas. Without following the principles of the scriptures, one cannot elevate himself to the perfectional stage. One who actually, therefore, understands the purport of the śāstras is considered fortunate. In human society, aversion to the principles of understanding the Supreme Personality of Godhead is the cause of all falldowns. That is the greatest offense of human life. Therefore, māyā, the material energy of the Supreme Personality of Godhead, is always giving us trouble in the shape of the threefold miseries. This material energy is constituted of the three modes of material nature. One has to raise himself at least to the mode of goodness before the path to understanding the Supreme Lord can be opened. Without raising oneself to the standard of the mode of goodness, one remains in ignorance and passion, which are the cause of demoniac life. Those in the modes of passion and ignorance deride the scriptures, deride the holy man, and deride the proper understanding of the Supreme Personality of Godhead. They disobey the instructions of the spiritual master, and they do not care for the regulations of the scriptures. In spite of hearing the glories of devotional service, they are not attracted. Thus they manufacture their own way of elevation. These are some of the defects of human society which lead to the demoniac status of life. If, however, one is able to be guided by a proper and bona fide spiritual master, who can lead one to the path of elevation, to the higher stage, then one’s life becomes successful. Thus end the Bhaktivedanta s to the Sixteenth Chapter of the Śrīmad Bhagavad-gītā in the matter of the Divine and Demoniac Natures.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
तस्मात् therefore? शास्त्रम् scripture? प्रमाणम् (be) authority? ते they? कार्याकार्यव्यवस्थितौ in determining what ought to be done and what ought not to be done? ज्ञात्वा having known? शास्त्रविधानोक्तम् what is said in the ordinance of the scriptures? कर्म action? कर्तुम् to do? इह here (in this world)? अर्हसि shouldst.Commentary He who desires the welfare of the Self should not disregard the?nds of the scriptures. A man who is anxious to obtain eternal bliss should respect the Vedas and the Smritis which lay down the code of right conduct. He should readily renounce whatever the scriptures teach him to abandon and accept whatever he is directed to accept.He who is thus entirely devoted to the Vedas cannot meet with misfortune? grief or delusion. No mother is more kind than the scriptures for they restrain us from doing evil and bestow on us the greatest good (liberation or Moksha). Therefore treat the scriptures with great respect. Renounce all that the scriptures prohibit. Whatever is worthy of being done? that thou shouldst do thoroughly with all thy heart and all thy strength.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the sixteenth discourse entitledThe Yoga of the Division BetweenThe Divine and the Demoniacal.,
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
पूर्व के तीन श्लोकों में दी गई युक्तियों का यह निष्कर्ष निकलता है कि साधक को शास्त्र प्रमाण के अनुसार अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय शास्त्राध्ययन के द्वारा ही हो सकता है। सत्य की प्राप्ति के मार्ग को निश्चित करने में प्रत्येक साधक अपनी ही कल्पनाओं का आश्रय नहीं ले सकता। शास्त्रों की घोषणा उन ऋषियों ने की है? जिन्होंने इस मार्ग के द्वारा पूर्णत्व का साक्षात्कार किया था। अत जब उन ऋषियों ने हमें उस मार्ग का मानचित्र दिया है? तो हमारे लिए यही उचित है कि विनयभाव से उसका अनुसरण कर स्वयं को कृतार्थ करें।ज्ञात्वा इसलिए आत्मदेव की तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व हमें इन शास्त्रों का बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। लक्ष्य? मार्ग? विघ्न और विघ्न के निराकरण के उपायों का जानना किसी भी यात्रा के लिए अत्यावश्यक और लाभदायक होता है।तुम्हें कर्म करना चाहिए अनेक लोग शास्त्र को जानते हैं?परन्तु ऐसे अत्यन्त विरले लोग ही होते हैं? जिनमें शास्त्रोपदिष्ट जीवन जीने का साहस? दृढ़ संकल्प और आत्मानुभूति के लक्ष्य की प्राप्ति होने तक धैर्य बना रहता है। इसलिए? भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश है कि काम? क्रोध और लोभ का त्याग कर मनुष्य को शास्त्रानुसार जीवन यापन करना चाहिए। यही कर्मयोग का जीवन है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्विभागयोगो नाम षोढशोऽध्याय।।
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या -- तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ -- जिन मनुष्योंको अपने प्राणोंसे मोह होता है? वे प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यको न जाननेसे विशेषरूपसे आसुरीसम्पत्तिमें प्रवृत्त होते हैं। इसलिये तू कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय करनेके लिये शास्त्रको सामने रख।जिनकी महिमा शास्त्रोंने गायी है और जिनका बर्ताव शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार होता है? ऐसे संतमहापुरुषोंके आचरणों और वचनोंके अनुसार चलना भी शास्त्रोंके अनुसार ही चलना है। कारण कि उन महापुरुषोंने शास्त्रोको आदर दिया है? और शास्त्रोंके अनुसार चलनेसे ही वे श्रेष्ठ पुरुष बने हैं। वास्तवमें देखा जाय तो जो महापुरुष परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुए हैं? उनके आचरणों? आदर्शों? भावों आदिसे ही शास्त्र बनते हैं।शास्त्रं प्रमाणम् का तात्पर्य यह है कि लोकपरलोकका आश्रय लेकर चलनेवाले मनुष्योंके लिये कर्तव्यअकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि (टिप्पणी प0 831) -- प्राणपोषणपरायण मनुष्य शास्त्रविधिको (कि किसमें प्रवृत्त होना है और किससे निवृत होना है) नहीं जानते (गीता 16। 7) इसलिये उनको सिद्धि आदीकि प्राप्ति नहीं होती। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू तो दैवीसम्पत्तिको प्राप्त है अतः तू शास्त्रविधिको जानकर कर्तव्यका पालन करनेयोग्य है।अर्जुन पहले अपनी धारणासे कहते थे कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा? जबकि भाग्यशाली श्रेष्ठ क्षत्रियोंके लिये अपनेआप प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गको देनेवाला है (गीता 2। 32)। भगवान् कहते हैं कि भैया तू पापपुण्यका निर्णय अपने मनमाने ढंगसे कर रहा है तुझे तो इस विषयमें शास्त्रको प्रमाण रखना चाहिये। शास्त्रकी आज्ञा समझकर ही तुझे कर्तव्यकर्म करना चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि युद्धरूप क्रिया बाँधनेवाली नहीं है? प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान रखकर की हुई शास्त्रीय क्रिया (यज्ञ? दान आदि) ही बाँधनेवाली होती है और मनमाने ढंगसे (शास्त्रविपरीत) की हुई क्रिया तो पतन करनेवाली होती है।स्वतः प्राप्त युद्धरूप क्रिया क्रूर और हिंसारूप दीखती हुई भी पापजनक नहीं होती (गीता 18। 47)। तात्पर्य है कि स्वभावनियत कर्म करता हुआ सर्वथा स्वार्थरहित मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र -- इनके स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो आज्ञा दी है? उसके अनुसार कर्म करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। पाप लगता है -- स्वार्थसे? अभिमानसे और दूसरोंका अनिष्ट सोचनेसे।मनुष्यजन्मकी सार्थकता यही है कि वह शरीरप्राणोंके मोहमें न फँसकर केवल परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे शास्त्रविहित कर्मोंको करे।इस प्रकार? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें दैवासुरसम्पद्विभागयोग नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।16.23 -- 16.24।।न चैतत् पुरुषवचनमित्यनादरणीयम्? अपि तु अनादिशास्त्रमत्र प्रमाणम् इत्युच्यते -- यः शास्त्रविधिमिति। तस्मादिति। शास्त्रविधिं त्यजत स्वमनीषयैव कार्याकार्यविचारं कुर्वतः प्रत्युत नरकपातः। तस्मात् आत्मबुद्ध्या (S??N add शास्त्रमननुसृत्य after आत्मबुद्ध्या) कार्याकार्यव्यवस्थां मा कार्षीः इति तात्पर्यम् [इति]।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
शास्त्रादृते कर्मणो निष्फलत्वे फलितमाह -- तस्मादिति। कर्तव्याकर्तव्यौ धर्माधर्मौ तस्य शास्त्रस्य प्रमाणत्वेऽपि मम किं कर्तव्यमित्याशङ्क्याह -- अत इति। स्वकर्म क्षत्रियस्य युद्धादि? इतिशब्दोऽध्यायसमाप्त्यर्थः। तदनेनाध्यायेन प्राग्भवीयकर्मवासनानुसारेणाभिव्यज्यमानसात्त्विकादिप्रकृतित्रयविभागेन दैव्यासुरीतिसंपद्द्वयमादानहानाभ्यामुपदिश्य कामक्रोधलोभानपहाय पुरुषार्थिना शास्त्रप्रवणेन तदुक्तकारिणा भवितव्यमिति निर्धारितम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृतौ षोडशोऽध्यायः ॥
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
यस्माच्छास्त्रविधिमुत्सृज्य कामकारतः प्रवृत्तानां पुरुषार्थहानिरनर्थावाप्तिश्च तस्मात्ते दैवीं संपदमभिजातस्य तव कार्याकार्यव्यवस्थितौ कर्तव्याकर्तव्यव्यवस्थायां शास्त्रं प्रमाणं ज्ञानसाधनमतः शास्त्रेण विधानं कुर्यादित्येवंलक्षणं शास्त्रविधानं तेनोक्तं स्वस्य क्षत्रियस्य यत्कर्म तदिह कर्माधिकारभूमौ कर्तुमर्हसि योग्योऽसि। इदं कर्तव्यमिदं नेति शासनं वेदाज्ञारुपं शास्त्रं तदतिक्रमे प्रायश्चित्तं विधानं शास्त्रं च विधानं च ताभ्यामुक्तमिति तूक्तविधानपदार्थस्य शास्तेनेनेति व्युत्पत्त्या शास्त्रपदार्थऽन्तर्भावमभिप्रेत्याचार्यैर्नोक्तं तदनेन षोडशाध्यायेन संपद्वयं निरुपयता सर्वस्या आसुर्याः संपदो मूलभूतान् सर्वानर्थप्रापकान् सर्वार्थप्रतिबन्धकान्महादोषान्कामादीन् त्रीन्परित्यज्य तत्परिवर्जनं श्रेयआचरणकारणं शास्त्रविध्युल्लङ्घनं च विहाय श्रेयोऽर्थिना श्रद्दधानतया शास्त्रोपदिष्टार्थानुष्ठानपरेण भवितव्यमिति दर्शयता आसुर्याः परिवर्जनेन दैव्या उपादानेन च लभ्यमखण्डं मोक्षाख्यं ब्रह्म प्रकाशितम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां गीताभाष्योत्कर्षदीपिकायं षोडशोऽध्यायः ॥
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
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Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
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Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
यस्मादेवं -- तस्मादिति। यस्माच्छास्त्रविमुखतया कामाधीनप्रवृत्तिरैहिकपारत्रिकसर्वपुरुषार्थायोग्या तस्मात्ते तव श्रेयोऽर्थिनः कार्याकार्यव्यवस्थितौ किं कार्यं किमकार्यमिति विषये शास्त्रं वेदतदुपजीविस्मृतिपुराणादिकमेव बोधकं प्रमाणं नान्यत् स्वोत्प्रेक्षाबुद्धवाक्यादीत्यभिप्रायः। एवंचेह कर्माधिकारभूमौ शास्त्रविधानेन कुर्यान्न कुर्यादित्येवंप्रवर्तनानिवर्तनारूपेण वैदिकलिङादिपदेनोक्तं कर्म विहितं प्रतिषिद्धं च ज्ञात्वा निषिद्धं वर्जयन् विहितं क्षत्रियस्य युद्धादिकर्म त्वं कर्तुमर्हसि सत्त्वशुद्धिपर्यन्तमित्यर्थः। तदेवमस्मिन्नध्याये सर्वस्या आसुर्याः संपदो मूलभूतान्त्सर्वश्रेयःप्रापकान्त्सर्वश्रेयःप्रतिबन्धकान्महादोषान्कामक्रोधलोभानपहाय श्रेयोर्थिना श्रद्दधानतया शास्त्रप्रवणेन तदुपदिष्टार्थानुष्ठानपरेण भवितव्यमिति संपद्वयविभागप्रदर्शनमुखेन निर्धारितम्।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
यस्माच्छास्त्रातिगः शुद्ध्यादिकं त्रयं नाप्नोति तस्मात्ते तव शुद्ध्यादिकामस्य शास्त्रमेव प्रमाणं किं कार्यं किं न कार्यमित्यस्यां व्यवस्थायाम्। एवं ज्ञात्वा शास्त्रं इदं कर्तव्यमिदं न कर्तव्यमिति शासनं वेदाज्ञारूपं? विधानं च तदुल्लङ्घने प्रतिसमाधानम्। अग्निहोत्राद्यकरणेऽयं दोषस्तत्परिहारार्थमिदं कृच्छ्रादिकं प्रायश्चित्तम्। ब्रह्महत्यादिकरणेऽयं दोषस्तत्परिहारार्थमिदमश्वमेधादि अन्यद्वा प्रायश्चित्तम्। शास्त्रं च विधानं च ताभ्यामुक्तं कर्म इह मनुष्यलोके कर्तुमर्हसि। लोकान्तरे कर्मस्वनधिकारं दर्शयितुमिहेत्युक्तम् तदेवं शास्त्रानुवर्तिन एव चित्तशुद्ध्यादिकं नान्यस्येति सिद्धम्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
तस्मादिति। तस्मात् कारणात्ते तव दैव्यां सम्पदि जातस्य कार्याकार्यव्यवस्थितौइदं कार्यम्? इदमकार्यम् एतयोर्व्यवस्थितौ व्यवस्थायां शास्त्रं प्रमाणं? अतः शास्त्रं विधानोक्तं ज्ञात्वैतत्सङ्गेन त्वं कर्म,कर्तुमिह प्रपञ्चे अर्हसि।दैवासुरीयसम्पत्तिविवेकेन तु षोडशे। सङ्गत्यागविभागेन बन्धमोक्षौ विवेचितौ ॥
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
तस्मात् कार्याकार्यव्यवस्थितौ उपादेयानुपादेयव्यवस्थायां शास्त्रम् एव तव प्रमाणम्। धर्मशास्त्रेतिहासपुराणाद्युपबृंहिता वेदा यद् एव पुरुषोत्तमाख्यं परं तत्त्वं तत्प्रीणनरूपं तत्प्राप्त्युपायभूतं च कर्म अवबोधयन्ति तत् शास्त्रविधानोक्तं तत्त्वं कर्म च ज्ञात्वा यथावद् अन्यूनातिरिक्तं विज्ञाय कर्तुं त्वं अर्हसि तद् एव उपादातुम् अर्हसि।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ज्ञानसाधनं ते तव कार्याकार्यव्यवस्थितौ कर्तव्याकर्तव्यव्यवस्थायाम्। अतः ज्ञात्वा बुद्ध्वा शास्त्रविधानोक्तं विधिः विधानं शास्त्रेण विधानं शास्त्रविधानम् कुर्यात्? न कुर्यात् इत्येवंलक्षणम्? तेन उक्तं स्वकर्म यत् तत् कर्तुम् इह अर्हसि? इह इति कर्माधिकारभूमिप्रदर्शनार्थम् इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येषोडशोऽध्यायः।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
फलितमाह -- तस्मादिति। इदं कार्यमिदमकार्यमित्यस्यां व्यवस्थायां ते तव शास्त्रं श्रुतिस्मृतिपुराणादिकमेव प्रमाणम्। अतः शास्त्रविधानोक्तं कर्म ज्ञात्वा इह कर्माधिकारे वर्तमानो यथाऽधिकारं कर्म कर्तुमर्हसि।,तन्मूलत्वात्सत्त्वशुद्धिसम्यग्ज्ञानमुक्तीनामित्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
फलितमाह -- तस्माच्छास्त्रमिति। तस्मान्मयि दत्तचित्तः कर्म युद्धाख्यं शास्त्रविधानोक्तं स्वधर्मं कर्त्तुमर्हसि।स्वकर्मवृत्तिर्दैवस्य निवृत्तिर्नासुरोदयात्। इति दैवासुरविभागोऽयं षोडश ईरितः॥
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
अध्यायोक्तं सर्वमेतदर्थमित्यभिप्रायेणानुशिष्यते -- तस्माच्छास्त्रमिति। अत्र कार्याकार्यशब्दयोरुत्पाद्यानुत्पाद्यादिविषयत्वस्यासङ्गतिमभिप्रेत्याऽऽहउपादेयानुपादेयव्यवस्थायामिति। अनुष्ठानविपर्ययस्य तत्त्वविपर्ययस्य च आसुरस्वभावे प्रदर्शितत्वादत्र च तद्विपर्ययस्य विवक्षितत्वात् कार्याकार्यशब्दौ तत्त्वातत्त्वयोः प्रदर्शनार्थावित्यभिप्रायेणोपादेयादिसाधारणशब्दः। उपादानमत्र यथाशास्त्रं मनसा स्वीकरणं शास्त्रमेवेत्युक्तं?श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः [या.स्मृ.1।7] इत्यादिविरोधादित्यत्राऽऽह -- धर्मशास्त्रेति। आदिशब्देनाचारग्रहणं?यजन्त्यविधिपूर्वकं [9।23]न तु मामभिजानन्ति [9।24] इत्यादिव्यवच्छेदाय ज्ञात्त्वेत्यादिकमुच्यत इत्याहयदेवेति। सर्वाणि हि शास्त्राणि साक्षाद्वा परम्परया वा परमपुरुषसमाराधनतयैव सर्वाणि विदधति तत्र तत्त्वहितयोःवेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः [15।15] इत्युक्तं परतत्त्वं प्रागुक्तसमाख्यया स्मारयतिपुरुषोत्तमाख्यमिति।तत्प्राप्त्युपायभूतं चेति सर्वेषां हि फलसङ्गादित्यागेनानुष्ठितानां परब्रह्मप्राप्त्युपायत्वमेव स्वभाव इति भावः। अत्रअवबोधयन्तीत्यनेनाज्ञातज्ञापनरूपविधानशब्दार्थो विवृतः। अयथाशास्त्रं कर्मणां करणं च न कर्तव्यमित्यभिप्रायेणकर्तुमर्हसि इत्युक्तम्। तस्मादप्यनुष्ठानतत्त्वाध्यवसायसाधारण्यमाहउपादातुमिति।अर्हसि इत्येतदनुसारिमध्यमत्वमिति निर्देशः तस्य दैवीसम्पदभिजातस्य योग्यत्वातिशयद्योतनाय।एतदुक्तं भवति -- सत्त्वोत्तरेण भवता कुहकपुरुषकौशलातिशयपरिग्राहितमोहनशास्त्राभासप्रक्रियानुधावनेन नित्यभगवदाज्ञारूपवेदाख्यशास्त्रसारभूताद्यथाधिकारं कर्मयोगभक्तियोगरूपभगवदनन्यभजनपरमधर्मान्न प्रच्युतेन भवितव्यम् अपितु स एव नित्यमुपादेयः -- इति। इहेति निर्देशः कर्माधिकारभूमिप्रदर्शनार्थः? कर्मवश्यावस्थत्वज्ञापको वा।इति कवितार्किकसिंहस्य सर्वतन्त्रस्वतन्त्रस्य श्रीमद्वेङ्कटनाथस्य वेदान्ताचार्यस्य कृतिषु भगवद्रामानुजविरचितश्रीमद्गीताभाष्यटीकायां तात्पर्यचन्द्रिकायां षोडशोऽध्यायः,,