श्लोक · Shlok 2
श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥
śrībhagavānuvāca. kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ. sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ.
Translation · अर्थ
English
The Blessed Lord said The sages understand Sannyasa to be the renunciation of action with desire; the wise declare the abandonment of the fruits of all actions as Tyaga.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
The performance of activities for results has to be given up. This is the instruction of Bhagavad-gītā. But activities leading to advanced spiritual knowledge are not to be given up. This will be made clear in the next verses. In the Vedic literature there are many prescriptions of methods for performing sacrifice for some particular purpose. There are certain sacrifices to perform to attain a good son or to attain elevation to the higher planets, but sacrifices prompted by desires should be stopped. However, sacrifice for the purification of one’s heart or for advancement in the spiritual science should not be given up.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
English Commentary By Swami Sivananda18.2 काम्यानाम् (of) desireful? कर्मणाम् of actions? न्यासम् the renunciation? संन्यासम् Sannyasa? कवयः the sages? विदुः understand? सर्वकर्मफलत्यागम् the abandonment of the fruits of all works? प्राहुः declare? त्यागम् abandonment? विचक्षणाः the wise.Commentary Kamya Karmani Activities such as the Asvamedha (a special sacrifice)? etc.? which are performed for the attainment of specific selfish ends. The wise men declare that Tyaga means abandonment of the fruits of all the Nitya and Naimittika works (ordinary and extraordinary or occasional duties).The rootmeaning of the words Sannyasa and Tyaga is to give up. In popular usage Sannyasa and Tyaga are more or less synonymous. Both mean renunciation. The two words do not mean two altogether distinct ideas as stone and fruit? or pot and cloth. They convey the same general idea with a slight distinction.An objector asks It is said that the Nitya and Naimittika actions cannot produce any fruits. Why then is the relinishment of their fruits mentioned here It is like asking for the relinishment of the barren womans sonWe say The objection is not correct. In the opinion of the Lord? ordinary and occasional duties cause their own fruits (vide XVIII.12). Sannyasins alone who have renounced the desire for the fruits of actions will not get the fruits? but other persons will have to reap the fruits of the ordinary and occasional actions.If one renounces all actions after the attainment of Selfrealisation and enters into the fourth order of life (Sannyasa) it is called VidvatSannyasa. If one renounces all actions and enters into the order of Sannyasa for the sake of doing VedantaVichara (or reflection on the truths of the Vedantaphilosophy and on the true significance of the great sentences of the Upanishads which reveal the identity of the individual soul with the Supreme Being) and for thus attaining Selfrealisation? it is called VividishaSannyasa.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda काम्य कर्मों का त्याग संन्यास कलाता है और समस्त कर्मों का फलत्याग त्याग कहा जाता हा। शास्त्रीय सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों को इन दोनों में कोई अन्तर नहीं ज्ञात होता? क्योंकि कामना सदैव फलप्राप्ति की ही होती है। अत? कामना प्रेरित कर्मों का त्याग और कर्मफल की आसक्ति का त्याग ये दोनों ही समान प्रतीत होते हैं। इसका कारण शास्त्रों से अनभिज्ञता अथवा उनका सतही अध्ययन ही हो सकता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि दोनों का अर्थ कामना का त्याग ही है? परन्तु त्याग और संन्यास में कुछ अन्तर है। फिर भी त्याग? संन्यास का अविभाज्य अंग है। मनुष्य वर्तमान में कर्म करता है और आशा करता है कि उसे इष्टफल भविष्य में प्राप्त होगा। वर्तमान के कर्म का परिणाम ही भावी फल है। इसलिए? निष्काम कर्म वर्तमान में ही हो सकते हैं? जब कि फलभोग की चिन्ता से उत्पन्न होने वाली मन की व्याकुलता का संबंध भविष्य काल से होता है। वर्तमान के कर्म की परिसमाप्ति भावी फल में होती है। कामना और विक्षेप मन में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। कामना जितनी अधिक तीव्र होगी? उतनी ही अधिक मात्रा में हमारी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास होगा और ऐसा शक्तिहीन पुरुष किसी भी कर्म को कुशलता एवं उत्साह के साथ सम्पादित नहीं कर सकता। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार या जीव ही इच्छा करता है। अत? अहंकार की निवृत्ति का अर्थ है? व्यष्टि जीव की विरति और उस साधक की अपने सर्वोच्च स्वरूप में दृढ़ स्थिति।कर्म वर्तमान में होते हैं और उनके फल भविष्य में प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। जो व्यक्ति फल की चिन्ता करता है वह वर्तमान में कार्य करने की अपनी क्षमता खो देता है। स्वाभाविक ही है कि उस व्यक्ति को इष्ट फल मिलने की सम्भावना कम हो जाती है? क्योंकि कर्म का फल कर्ता के प्रयत्न तथा प्रकृति के नियमादि अन्य कई कारणों पर निर्भर करता है। अत हमें फलासक्ति का त्याग करने का उपदेश दिया जाता है।संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि त्याग साधन है और संन्यास साध्य है। त्याग और संन्यास की साधना का संबंध हमारे कर्मों से है। भगवान् श्रीकृष्ण कर्म के महत्त्व पर बल देते हुए कभी नहीं थकते। इन दोनों शब्दों में से कोई भी यह नहीं दर्शाता है कि हमको कर्म की उपेक्षा करनी चाहिए। इसके विपरीत? दोनों का आग्रह कर्म के पालन पर ही है। हमको कर्म करने ही चाहिए। तथापि? ये कर्म अहंकार और स्वार्थ या फलासक्ति से रहित होने चाहिए। फलासक्ति ही हमारी कार्यकुशलता में बाधक बनती है। फलासक्ति के अभाव में हमारे कर्म हमें अपना पूर्ण पुरस्कार प्रदान कर सकते हैं। हम कह सकते हैं कि वेदों में प्रयुक्त इन दो शब्दों के अर्थों की अपेक्षा गीता में दी गई इनकी परिभाषाएं अधिक उदार एवं सहिष्णु हैं।अज्ञानी पुरुष को कर्म करने चाहिए या नहीं इस पर कहते हैं
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas व्याख्या -- दार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः -- कई विद्वान् कहते हैं कि काम्यकर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं? उनका त्याग करनेका नाम संन्यास है। 2 -- सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग करनेका नाम त्याग है अर्थात् फल न चाहकर कर्तव्यकर्मोंको करते रहनेका नाम त्याग है। 3 -- त्याज्यं दोष (टिप्पणी प0 870.1) वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः -- कई विद्वान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये। 4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे -- अन्य विद्वान् कहते हैं कि दूसरे सब कर्मोंका भले ही त्याग कर दें? पर यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।उपर्युक्त चारों मतोंमें दो विभाग दिखायी देते हैं -- पहला और तीसरा मत संन्यास(सांख्ययोग) का है तथा दूसरा और चौथा मत त्याग(कर्मयोग) का है। इन दो विभागोंमें भी थोड़ाथोड़ा अन्तर है। पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग है और तीसरे मतमें कर्ममात्रका त्याग है। ऐसे ही दूसरे मतमें कर्मोंके फलका त्याग है और चौथे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंके त्यागका निषेध है।दार्शनिकोंके उपर्युक्त चार मतोंमें क्याक्या कमियाँ हैं और उनकी अपेक्षा भगवान्के मतमें क्याक्या विलक्षणताएँ हैं? इसका विवेचन इस प्रकार है --,1 -- काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासम् -- संन्यासके इस पहले मतमें केवल काम्यकर्मोंका त्याग बताया गया है परन्तु इसके अलावा भी नित्य? नैमित्तिक आदि आवश्यक कर्तव्यकर्म बाकी रह जाते हैं (टिप्पणी प0 870.2)। अतः यह मत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें न तो कर्तृत्वका त्याग बताया है और न स्वरूपमें स्थिति ही बतायी है। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जैसे -- इसी अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मफलमें लिप्त नहीं होती -- ऐसा कहकर कर्तृत्वाभिमानका त्याग बताया है और अगर वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे? तो भी न मारता है? न बँधता है -- ऐसा कहकर स्वरूपमें स्थिति बतायी है। 2 -- त्याज्यं दोषवदित्येके -- संन्यासके इस दूसरे मतमें सब कर्मोंको दोषकी तरह छोड़नेकी बात है। परन्तु सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कोई कर ही नहीं सकता (गीता 3। 5) और कर्ममात्रका त्याग करनेसे जीवननिर्वाह भी नहीं हो सकता (गीता 3। 8)। इसलिये भगवान्ने नित्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेको राजसतामस त्याग बताया है (18। 78)। 3 -- सर्वकर्मफलत्यागम् -- त्यागके इस पहले मतमें केवल फलका त्याग बताया है। यहाँ फलत्यागके अन्तर्गत केवल कामनाके त्यागकी ही बात आयी है (टिप्पणी प0 871.1)। ममताआसक्तिके त्यागकी बात इसके अन्तर्गत नहीं ले सकते क्योंकि ऐसा लेनेपर दार्शनिकों और भगवान्के मतोंमें कोई अन्तर नहीं रहेगा। भगवान्के मतमें कर्मकी आसक्ति और फलकी आसक्ति -- दोनोंके ही त्यागकी बात आयी है -- सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च (गीता 18। 6)। 4 -- यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् -- त्याग अर्थात् कर्मयोगके इस दूसरे मतमें यज्ञ? दान और तपरूप कर्मोंका त्याग न करनेकी बात है। परन्तु इन तीनोंके अलावा वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिको लेकर जितने कर्म आते हैं? उनको करने अथवा न करनेके विषयमें कुछ नहीं कहा गया है -- यह इसमें अधूरापन है। भगवान्के मतमें इन कर्मोंका केवल त्याग ही नहीं करना चाहिये? प्रत्युत इनको न करते हों? तो जरूर करना चाहिये और इनके अतिरिक्त तीर्थ? व्रत आदि कर्मोंको भी फल एवं आसक्तिका त्याग करके करना चाहिये (18। 56)। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बतानेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें पहले त्यागके विषयमें अपना मत बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta अत्रोत्तरम् --,काम्यानामिति। काम्यानि -- अग्निष्टोमादीनि ( अग्निष्टोमसत्रादीनि )। सर्वकर्मेति -- सर्वेषां नित्यनैमित्तककर्मणां ( S -- नैमित्तिककाम्यकर्मणाम् ) क्रियमाणत्वेऽपि फलत्यागः त्यागः। अत्र चाध्याये यदवशिष्टं ( S??N यदवशिष्टमवलग्नं वक्तव्यम् ) वक्तव्यमस्ति? तत् प्राक्तनैरेव तत्रभवद्भट्टभास्करादिभिः वितत्य विमृष्टमिति किमस्माकं तद्गूढार्थप्रकाशनमात्र ( S -- प्रत्यभिज्ञानिर्वाहण -- ) प्रतिज्ञानिर्वाहणसाराणां पुनरुक्तप्रदर्शनप्रयासेन।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri ननु पूर्वेष्वध्यायेषु तत्र तत्र संन्यासत्यागयोरुक्तत्वात्किमिति पुनस्तौ पृच्छ्येते ज्ञाते तदयोगात्तत्राह -- तत्र तत्रेति। न निर्लुण्ठितार्थौ न निकृष्टार्थौ न विविक्तार्थावित्यर्थः। बुभुत्सया प्रश्नस्य प्रवृत्तत्वात्प्रष्टुरभिप्रायं प्रश्नेन प्रतिपद्य भगवानुत्तरमुक्तवानित्याह -- अत इति। पक्षद्वयोपन्यासेन संन्यासत्यागशब्दयोरर्थभेदं कथयति -- काम्यानामिति। तत्किमिदानीं संन्यासत्यागशब्दयोरात्यन्तिकं भिन्नार्थत्वं तथा प्रसिद्धिविरोधः स्यादित्याशङ्क्यावान्तरभेदेऽपि नात्यन्तिकभेदोऽस्तीत्याह -- यदीति। पुत्राभावाद्वन्ध्यायास्तत्त्यागायोगवन्नित्यनैमित्तिककर्मणामफलानां फलत्यागानुपपत्तेरुक्तस्त्यागशब्दार्थो न सिद्ध्यतीति शङ्कते -- नन्विति। नित्यनैमित्तिककर्मफलस्य वन्ध्यापुत्रसादृश्याभावात्तत्त्यागसंभवादुक्तस्त्यागशब्दार्थः संभवतीति समाधत्ते -- नैष दोष इति। भगवता तेषां फलवत्त्वमिष्टमित्यत्र वाक्यशेषमनुकूलयति -- वक्ष्यतीति। तर्हि संन्यासिनामसंन्यासिनां च नित्याद्यनुष्ठायिनामविशेषेण तत्फलं स्यादिति चेन्नैवेत्याह -- नत्विति। वक्ष्यतीत्यनुकर्षणं चकारार्थः। प्रसक्तस्य वचसोऽर्थं प्रकृतोपयोगित्वेन संगृह्य स्मारयति -- संन्यासिनामिति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati एवं पृष्टो ज्ञातार्जुनाभिप्रायः सर्वेष्वध्यायेषु तत्रतत्र निर्दिष्टौ संन्यासत्यागशब्दौ न विविक्तार्थावित्यतः प्रश्नौचित्यं मत्वा तन्निर्णयाय श्रीभगवानुवाच। काम्यानां स्वर्गादिकामनाप्रयुक्तानामश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं परित्यागं संन्यासं संन्यासशब्दार्थमनुष्ठेयत्वेन प्राप्तानामनुष्ठायं कवयः पण्डिताः केचिद्विदुर्विजानन्ति। नित्यनैमित्तिकानामनुष्ठीयमानानां सर्वकर्मणामात्मसंबन्धितया प्राप्तस्य फलस्य परित्यागः सर्वकर्मफलत्यागः तं त्यागं त्यागशब्दार्थं विचक्षणाः निपुणाः पण्डिताः कथयन्ति। ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलाभावद्वन्ध्यापुत्रस्य त्यागइव तेषां फलत्यागासंभवादुक्तस्त्यागशब्दार्थो न युक्त इतिचेदुच्यते। यद्यपि स्वर्गकामः पशुकाम इत्यादिवत्संध्यामुपासीतयावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति इत्यादिषु फलविशेषो न श्रुयते तथाप्यपुरुषार्थे व्यापारे प्रेक्षावन्तं प्रवर्तयितुमशक्नुवन्विधिर्विश्वजिन्न्यायेन किमपि फलमाक्षिपत्येव। श्रुयते च नित्यादिषु फलंसर्व एते पुण्यलोका भवन्ति कर्मणा पितृलोकः? धर्मेण पापमपनुदति इत्येवमादिषु। वक्ष्यति च भगवान्अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य नतु संन्यासिनां क्वचित्त इति। तस्माद्युक्तमुक्तं सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षण इति। नचैवमपि निष्फलेषु कर्मस्वप्रवृत्तिरेव प्राप्तेति वाच्यम्। सर्वेषामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्वेन तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्या विविदिषार्थतत्वा विनियोगात्। तदुक्तं सरेश्वराचार्यैःवेदानुवचनादीनामैख्यात्म्यज्ञानजन्मने। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः।। इति। तथाच चतुर्थाध्यायस्थं सूत्रंएकस्य तूभयत्वं संयोगपृथक्त्वम् इतिखादिरो यूपो भवतिखादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत इत्यत्रैकस्य खादिरत्वस्योभयत्वे क्रत्वर्थत्वपुरुषार्थत्वरुपोभयात्मकत्वे वचनद्वयेन क्रतुशेषत्वफलशेषत्वसंयोगभेदावगमान्न नित्यानित्यसंयोगविरोधः तथा सर्वेषआं कर्मणां स्वोत्पत्तिविधिसिद्धानां प्रत्येकं वाक्येन तत्तत्फलसंयोगः तमेतमितिवाक्येन विविदिषासंयोगश्च सिद्य्धत इति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha काम्यानां कर्मणां इत्येतं श्लोकं केचिद्व्याचक्षते -- काम्यानां कर्मणामश्वमेधादीनां स्वरूपेण त्यागः सन्न्यासः? नित्यनैमित्तिकादिसर्वकर्मफलत्यागस्त्यागः इति? तदसदिति भावेनाऽऽह -- फलेति। वैकल्पिककाम्यानां स्वर्गादिफलानिच्छया विशेषणत्यागेन त्यागो नियतकाम्यानां स्वरूपाकरणेन त्यागः सन्न्यासः? काम्यकर्मणामेव फलत्यागस्तु त्यागः करणाकरणे तु न विवक्षित इत्यर्थः। कुत एतत् इत्यत आह -- तथा हीति। अकर्मणा अकरणेन जनकाश्वपत्यादिभिर्मुमुक्षुभिरश्वमेधादीनामनुद्दिष्टफलानामनुष्ठानान्न काम्यानां स्वरूपपरित्याग एव नित्यनैमित्तिकफलस्यान्तःकरणशुद्धेः सर्वापेक्षितत्वेन तत्त्यागो न युक्तः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya फलानिच्छयाऽकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः। त्यागस्तु फलत्याग एव। तथा हि प्राचीनशालश्रुतिः -- अनिच्छयाऽकर्मणा वाऽपि काम्यकर्मन्यासो न्यासः? फलत्यागस्तु त्यागः इति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati तत्रान्तिमस्य सूचीकटाहन्यायेन निराकरणायोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानामिति। काम्यानां फलकामनया चोदितानामन्तःकरणशुद्धावनुपयुक्तानां कर्मणामिष्टिपशुसोमादीनां न्यासं त्यागं संन्यासं विदुर्जानन्ति कवयः सूक्ष्मदर्शिनः। केचित्तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति वाक्येन वेदानुवचनशब्दोपलक्षितस्य ब्रह्मचारिधर्मस्य यज्ञदानशब्दाभ्यामुपलक्षितस्य गृहस्थधर्मस्य तपोऽनाशकशब्दाभ्यामुपलक्षितस्य वानप्रस्थधर्मस्य नित्यस्य नित्येन नित्यविहितेन पापक्षयेण द्वारेणात्मज्ञानार्थत्वं बोध्यते। नच विनियोगवैयर्थ्यंज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः इत्यनेनैव लब्धत्वादिति वाच्यम्। विनियोगाभावे हि सत्यपि नित्यकर्मानुष्ठाने ज्ञानं स्याद्वा न वा स्यात्। सति तु विनियोगे ज्ञानमवश्यं भवेदेवेति नियमार्थत्वात् तस्मान्नित्यकर्मणामेव वेदने विविदिषायां वा विनियोगात् सत्त्वशुद्धिविविदिषोत्पत्तिपूर्वकवेदनार्थिना नित्यान्येव कर्माणि भगवदर्पणबुद्ध्याऽनुष्ठेयानि काम्यानि तु सर्वाणि सफलानि परित्याज्यानीत्येकं मतम्। अपरं मतं सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाःसर्वेषां काम्यानां नित्यानां च प्रतिपदोक्तफलत्यागं सत्त्वशुद्ध्यर्थितया विविदिषासंयोगेनानुष्ठानं विचक्षणा विचारकुशलास्त्यागं प्राहुः।खादिरो यूपो भवति? खादिरं वीर्यकामस्य यूपं करोति इत्यत्र यथैकस्य खादिरत्वस्य क्रतुप्रकरणपाठात्फलसंयोगाच्च क्रत्वर्थत्वं पुरुषार्थत्वं च प्रमाणभेदात्? यथाऽग्निहोत्रेष्टिपशुसोमानां सर्वेषामपि शतपथपठितानां चोत्पत्तिविधिसिद्धानां तत्तत्फलसंयोगः प्रत्येकवाक्येन विविदिषासंयोगश्च यज्ञादिवाक्येन क्रियत इत्युपपन्नं?एकस्य तूभयत्वे संयोगपृथक्त्वं इति न्यायात्। तदुक्तं संक्षेपशारीरकेयज्ञेनेत्यादिवाक्यं शतपथविहितं कर्मवृन्दं गृहीत्वा स्वोत्पत्त्याम्नातसिद्धं पुरुषविविदिषामात्रसाध्ये युनक्ति इति। तस्मात्काम्यान्यपि फलाभिसंधिमकृत्वाऽन्तःकरणशुद्धये कर्तव्यानि। नह्यग्निहोत्रादिकर्मणां स्वतः काम्यत्वनित्यत्वरूपो विशेषोऽस्ति पुरुषाभिप्रायभेदकृतस्तु विशेषः फलाभिसंधित्यागे कुतस्त्यो नित्यकर्मणां च प्रातिस्विकफलसद्भावअनिष्टमिष्टमिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलं इत्यत्र वक्ष्यति। नित्यानामेव विविदिषासंयोगेन काम्यानां कर्मणां फलेन सह स्वरूपतोऽपि परित्यागः पूर्वार्धस्यार्थः। काम्यानां नित्यानां च संयोगपृथक्त्वेन विविदिषासंयोगात्तदर्थं स्वरूपतोऽनुष्ठानेऽपि प्रातिस्विकफलाभिसन्धिमात्रपरित्याग इत्युत्तरार्धस्यार्थः। तदेतदाहुर्वार्तिककृतःवेदानुवचनादीनामैकात्म्यज्ञानजन्मने। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः।। इति। तदेवं सफलकाम्यकर्मत्यागः संन्यासशब्दार्थः सर्वेषामपि कर्मणां फलाभिसन्धित्यागशब्दार्थं इति न घटपटशब्दयोरिव संन्यासत्यागशब्दयोर्भिन्नजातीयार्थत्वं किंत्वन्तःकरणशुद्ध्यर्थकर्मानुष्ठाने फलाभिसन्धित्याग इत्येक एवार्थ उभयोरिति निर्णीत एकः प्रश्नोऽर्जुनस्य।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानामिति। काम्यानां रागतः प्राप्तानां पुत्रकामेष्ट्यादीनां न तु फलस्य कामनाविषयत्वात् सर्वस्य कर्मणः फलवत्त्वनियमात् सर्वं कर्म काम्यमेवेति नित्यादीनामपि मुमुक्षोस्त्यागः स्यादिति सिद्धं नः समीहितमित्याशङ्क्याह -- सर्वेति। सर्वेषां नित्यनैमित्तिककाम्यानां कर्मणां फलत्यागमेव त्यागं विचक्षणाः प्राहुर्न स्वरूपतस्त्यागं प्राहुः। अतो न त्वदिष्टः संन्यासः सिद्ध्यतीत्यर्थः। अयमाशयः -- यद्यपि संन्यासत्यागशब्दौ निवृत्तिमेव ब्रूतः तथापि सा वैराग्याद्वा कायक्लेशभयाद्वा मौढ्याद्वा भवतीति तत्कारणानां सात्त्विकादिभेदेन भिन्नत्वात्तस्या अपि सात्त्विकराजसतामसभेदेन त्रैविध्यं त्रिविधश्रद्धाप्रधानत्वं च दुर्वारम्। न चाविरक्तोऽश्रद्दधानश्च त्यक्तकर्मापि दृष्टविक्षेपहीनो दृश्यते। यथोक्तं वार्तिकाचार्यैःप्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते दैवसंदूषिताशयाः। इति। तस्मादविरक्तकृतसंन्यासापेक्षया निष्कामकर्माचरणमेव श्रेय इत्याशयेन भगवता काम्यकर्मत्यागः संन्यासत्वेन नित्यादिकर्मणां फलानभिसंधानं च त्यागत्वेन स्तूयत इति। तस्मादश्रद्धया कृतः संन्यासोऽप्यसन्नेवेति संन्यासाद्ब्रह्मणः स्थानमिति स्मृतं स्वफलं दातुं न समर्थ इति युक्तमुक्तं भगवता अश्रद्धया कृतं सर्वं व्यर्थमिति। यत्तु नित्यानामेव विविदिषायोगात्काम्यानां स्वरूपतोऽपि त्यागः पूर्वार्धस्यार्थः। सर्वेषां कर्मणां फलतस्त्याग इत्युत्तरार्धार्थ इति व्याख्यानं पक्षद्वयप्रदर्शनपरं तदग्रिमेण श्लोकेन पौनरुक्त्यमावहतीत्युपेक्षितम्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji अस्योत्तरमाह श्रीभगवान् -- काम्यानामिति। काम्यानां ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत। सर्वपाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां तरति योऽश्वमेधेन यजते [आप.श्रौ.10।1।2।1] इत्यादिकर्मणां न्यासं परित्यागं कवयो निर्दुष्टशब्दरसिकाः सन्न्यासं विदुः जानन्तीत्यर्थः।अत्रायं भावः -- सन्न्यासशब्देन सम्यक्प्रकारेण न्यासं स्थापनं तच्च काम्यानां कामितफलपरित्यागेन भवदर्थफलार्थस्थापनरूपं शब्दार्थज्ञानेन ते जानन्ति। एतेन तेषामपि शब्दार्थज्ञानवत्त्वमेवोक्तं? न तु तत्त्वज्ञानवत्त्वमिति भावः। किञ्च? ये विचक्षणा विशेषेण व्याख्यानसमर्थाः चातुर्यादियुक्ताः सर्वकर्मणां नित्यनैमित्तिकानामपि फलत्यागं त्यागं प्राहुः। यद्यपि नित्यकर्मसु फलं न श्रूयते अहरहः सन्ध्यामुपासीत। यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात् [ ] इत्यादिषु? तथापि प्रत्यवायपरिहार एव फलमिति कल्पयन्ति। एतदेव विचक्षणत्वेनोक्तम्। तेऽपि तत्त्वं न जानन्तीत्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja श्रीभगवानुवाच -- केचन विद्वांसः काम्यानां कर्मणां न्यासं स्वरूपत्यागं संन्यासं विदुः केचित् च विचक्षणाः नित्यानां नैमित्तिकानां काम्यानां च सर्वेषां कर्मणां फलत्याग एव मोक्षशास्त्रेषु त्यागशब्दार्थः इति प्राहुः।तत्र शास्त्रीयः त्यागः काम्यकर्मस्वरूपविषयः? सर्वकर्मफलविषयः? इति विवादं प्रदर्शयन् एकत्र संन्यासशब्दम् इतरत्र त्यागशब्दं प्रयुक्तवान् अतः त्यागसंन्यासशब्दयोः एकार्थत्वम् अङ्गीकृतम् इति ज्ञायते। तथानिश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। (गीता 18।4) इति त्यागशब्देन एव निर्णयवचनात्।नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।। (गीता 18।7)अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्।। (गीता 18।12) इति परस्परपर्यायतादर्शनात् च तयोः एकार्थत्वं प्रतीयते? इति निश्चीयते।।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya --,काम्यानाम् अश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं संन्यासशब्दार्थम्? अनुष्ठेयत्वेन प्राप्तस्य अनुष्ठानम्? कवयः पण्डिताः केचित् विदुः विजानन्ति। नित्यनैमित्तिकानाम् अनुष्ठीयमानानां सर्वकर्मणाम् आत्मसंबन्धितया प्राप्तस्य फलस्य परित्यागः सर्वकर्मफलत्यागः तं प्राहुः कथयन्ति त्यागं त्यागशब्दार्थं विचक्षणाः पण्डिताः। यदि काम्यकर्मपरित्यागः फलपरित्यागो वा अर्थः वक्तव्यः? सर्वथा परित्यागमात्रं संन्यासत्यागशब्दयोः एकः अर्थः स्यात्? न घटपटशब्दाविव जात्यन्तरभूतार्थौ।। ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलमेव नास्ति इति आहुः। कथम् उच्यते तेषां फलत्यागः? यथा वन्ध्यायाः पुत्रत्यागः नैष दोषः? नित्यानामपि कर्मणां भगवता फलवत्त्वस्य इष्टत्वात्। वक्ष्यति हि भगवान् अनिष्टमिष्टं मिश्रं च (गीता 18।12) इति न तु संन्यासिनाम् (गीता 18।12) इति च। संन्यासिनामेव हि केवलं कर्मफलासंबन्धं दर्शयन् असंन्यासिनां नित्यकर्मफलप्राप्तिम् भवत्यत्यागिनां प्रेत्य (गीता 18।12) इति दर्शयति।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami तत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानामिति।पुत्रकामो यजेतस्वर्गकामो यजेत इत्येवमादिकामोपबन्धेन विहितानां काम्यानां कर्मणां न्यासं परित्यागं संन्यासं कवयो विदुः सम्यक्फलैः सह सर्वकर्मणामपि न्यासं संन्यासं पण्डिता विदुः जानन्तीत्यर्थः। सर्वेषां काम्यानां नित्यनैमित्तिकानां च कर्मणां फलमात्रत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा निपुणाः नतु स्वरूपतः कर्मत्यागम्। ननु नित्यनैमित्तिकानां फलाश्रवणादविद्यमानस्य फलस्य कथं त्यागः स्यात्? नहि वन्ध्यायाः पुत्रत्यागः संभवति। उच्यते। यद्यपि स्वर्गकामः पशुकाम इत्यादिवत्अहरहःसंध्यामुपासीतयावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति इत्यादिषु फलविशेषो न श्रूयते तथाप्यपुरुषार्थे व्यापारे प्रेक्षावन्तं प्रवर्तयितुमशक्नुवन्विधिःविश्वजिता यजेत इत्यादिष्विव सामान्यतः किमषि फलमाक्षिपत्येव। नचातीव गुरुमतः श्रद्धया स्वसिद्धिरेव विधेः प्रयोजनमिति मन्तव्यम्? पुरुषप्रवृत्त्यनुपपत्तेर्दुष्परिहरत्वात्। श्रूयते च नित्यादिष्वपि फलम्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति?कर्मणा पितृलोकः इति?धर्मेण पापमपनुदति इत्येवमादिषु। तस्माद्युक्तमुक्तंसर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः इति। ननु फलत्यागेन पुनरपि निष्फलेषु कर्मस्वप्रवृत्तिरेव स्यात्तन्न? सर्वेषामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्वेन विविदिषार्थतया विनियोगात्। तथाच श्रुतिःतमेतमात्मानं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन इति। अतः प्रतिपदोक्तं सर्वं फलं बन्धकत्वेन त्यक्त्वा विविदिषार्थं सर्वकर्मानुष्ठानं घटत एव। विविदिषा च नित्यानित्यवस्तुविवेकेन निवृत्तदेहाभिमानतया बुद्धेः प्रत्यक्प्रवणता। तावत्पर्यन्तं च सत्त्वशुद्ध्यर्थं ज्ञानाविरुद्धं यथोचितमावश्यकं कर्म कुर्वतस्तत्फलत्याग एव कर्वत्यागो नाम न स्वरूपेण। तथाच श्रुतिःकुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा इति। ततः परं तु सर्वकर्मनिवृत्तिः स्वत एव भवति। तदुक्तं नैष्कर्म्यसिद्धौप्रत्यक्प्रवणता बुद्धेः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः। कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव इति। उक्तंच भगवतायस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते इति। वसिष्ठेन चोक्तमन कर्माणि त्यजेद्योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ। कर्मणो मूलभूतस्य संकल्पस्यैव नाशतः इति। ज्ञाननिष्ठाविक्षेपकत्वमालक्ष्य त्यजेद्वा। तदुक्तं श्रीभगवता भागवतेतावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते।।ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः। सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः इत्यादि।।अलमतिप्रसङ्गेन। प्रकृतमनुसरामः।
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Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya तत्र त्यागसन्न्यासयोरैकार्थेऽपि विषयभेदेन विनिर्णयं मतान्तरोपन्यासेन दर्शयन्नुत्तरभाष्यं स्वयं श्रीभगवानुवाच -- काम्यानां कर्मणामिति। ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत स पाप्मानं तरति स ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते पुत्रकामो यजेत इत्यादिकामोपनिबन्धेन वेदेन विहितानां सर्वेषां न्यासं स्वरूपतस्त्यागं सन्न्यासं कवयो योगिनो विदुः। ततोऽपि विचक्षणाः स्वरूपतः त्यागमसहमाना निपुणा भक्ताः सर्वकर्मफलत्यागं सर्वेषां नित्यनैमित्तिककाम्यानां तथाश्रुतानामपि कर्मणां श्रुतफलस्य त्याग एव मोक्षशास्त्रे त्यागशब्दार्थ इति प्राहुः। तत्रैतेषां मते सन्न्यासार्थः सम्यक् फलत एव? न स्वरूपत इत्यायाति।
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Sanskrit Commentary By Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha पृथक्त्वैकत्वतत्स्वरूपजिज्ञासया प्रश्नश्चेत् तत्र कस्मिन्नंशेकाम्यानाम् इत्यादिमतभेदोपन्यासस्य सङ्गतिः इत्यत्राऽऽह -- अथेति।अयमभिप्रायः -- न्यायतो ह्यत्र निर्णयः प्रतिपाद्यते सन्दिग्धे च न्यायावतारः सन्देहश्चात्र वादिविप्रतिपत्तिनिबन्धन इति न्यायविषयविशोधनाय विप्रतिपत्त्युपन्यासः -- इति। एतेन कथितार्थयोरपि सन्न्यासत्यागशब्दयोर्विप्रतिपत्तिप्रशमनाय अस्मिन्नध्याये पुनः प्रश्न इत्यपि सूचितम्। एकत्वस्वीकारेण प्रतिवचनात् पृथकत्वप्रतिक्षेपोऽर्थसिद्ध इत्यभिप्रायेणाऽऽह -- एकमेव स्वरूपमिति। स्वमतस्यनिश्चयं श्रृणु [17।4] इति वक्ष्यमाणत्वात्।कवयःविचक्षणाः इति पदद्वयं नार्थप्राशस्त्यार्थवक्तृगौरवपरम् अपितु विप्रतिपत्त्युपयुक्तवेदनमात्रपरमित्यभिप्रायेणाऽऽह -- केचन विद्वांस इति। अनन्तरश्लोकेन भेदस्यएके? अपरे इति व्यक्तमुक्तत्वादिहापि तद्विवक्षेत्यभिप्रायेण -- केचनेत्युक्तम्।काम्यानां कर्मणां न्यासम् इति विशेषणादितरेषामपरित्यागः प्रतीयते उत्तरत्र चसर्वकर्मफलत्यागम् इति विशेषणादत्र काम्यस्वरूपत्यागश्चेत्यभिप्रायेणाऽऽह -- स्वरूपत्यागमिति। काम्यस्वरूपत्यागंवदतामयमभिप्रायः -- न तावन्नित्यनैमित्तिकवत् अकरणे प्रत्यवायात्कर्मान्तरानर्हतापत्तिभयाद्वा काम्यमनुष्ठीयते। न च त्रिवर्गसाधनाय? तस्यापवर्गप्रत्यनीकत्वात्। न च तदेव कर्मापवर्गस्यापि स्वयं साधनम्? उपासनादिनैरर्थक्यप्रसङ्गात्। नच विनियोगपृथक्त्वेन विद्याङ्गतया तत्परिग्रहः? यज्ञादिश्रुतेर्नित्यनैमित्तिकमात्रविषयत्वेऽपि विरोधाभावात्। अत एव हिसर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् [ब्र.सू.3।4।26] इत्यधिकरणमाश्रमधर्मसापेक्षतापरं भाष्यते। तस्मात्स्वर्गादिसंज्ञनरकहेतवः काम्याः क्रिया मुमुक्षुभिर्नानुष्ठेयाः -- इति। सर्वकर्मफलत्यागमिति वदतांत्वयमाशयः -- फलविरोधाद्धि काम्यानां त्यागः शङ्क्यते अतः फलमेव त्यज्यताम्? न च निष्फलानुष्ठानप्रसङ्गः? नित्यनैमित्तिकवदेव भगवत्प्रीतिमात्रार्थतया तदनुष्ठानोपपत्तेः। न चैवं न विधिःयो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद्भवति [बृ.उ.3।8।10] इत्यादिनाऽक्षरशब्दनिर्दिष्टपरमपुरुषवेदनावेदनाभ्यामेव तस्यैव कर्मणो नित्यानित्यफलसाधनत्वश्रुतेः। अतो नित्यनैमित्तिकानामिव काम्यानामपि न स्वरूपत्यागः -- इति। विवादस्य भिन्नविषयत्वायोगादत्र त्यागसन्न्यासशब्दयोरेकार्थत्वावश्यम्भावात्पृथगर्थत्वशङ्कापरिहारोऽर्थलब्ध इत्याह -- तत्रेति। एतेन सन्न्यासत्यागशब्दयोः पृथगर्थत्वमङ्गीकृत्य कस्यचित्काम्यस्वरूपप्रहाणविषयतया कस्यचित्तु नित्यनैमित्तिकफलोपेक्षार्थतां च वदन्तः प्रत्युक्ताः। नह्यत्र काम्येतरकर्मफलत्यागमित्युच्यते। ततश्च सङ्कोचकाभावात् त्रिविधमपि कर्म संगृह्णाति। तदिदमुक्तं -- नित्यानां नैमित्तिकानां काम्यानां च सर्वेषां कर्मणामिति। नित्यानामपिप्राजापत्यं गृहस्थानाम् [वि.पु.1।6।37] इत्यादिना फलसंयोगोऽवगतः। अत्र श्लोके त्यागसन्न्यासशब्दयोरर्थभेदव्युत्पादनपरतां निरसितुमैकार्थे प्रस्पष्टं हेतुद्वयमाह -- तथेति। नह्यर्थद्वयविषयेऽत्र विमर्शे अन्यतरस्यैव निश्चय उपपन्न इत्यभिप्रायेणोक्तंत्यागशब्देनैवेति।परस्परपर्यायतादर्शनाच्चेति -- अयमभिप्रायः -- नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते [18।7] इति निषिद्ध एव हि सन्न्यासः।मोहात्तस्य परित्यागः [18।7] इति त्यागशब्देनानूद्य तामसत्वेन निन्द्यते? अन्यथा जरद्गवादिवाक्यवत्परस्परानन्वयप्रसङ्गात्। एवंभवत्यत्यागिनां प्रेत्य [18।12] इत्युक्त एवार्थःन तु सन्न्यासिनां क्वचित् [18।12] इति व्यतिरेकेण दृढीक्रियते। न च तदन्यविधिरन्याभावस्य व्यतिरेकः। अत इमौ शब्दावत्राप्येकार्थावित्यङ्गीकृतम् -- इति प्रतिवक्त्रा भगवतेति शेषः।