श्लोक · Shlok 65
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥
prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānirasyopajāyate. prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate.
Translation · अर्थ
English
In that peace all pains are destroyed; for the intellect of the tranil-minded soon becomes steady.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
Explore different interpretations
A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
There is no purport for this verse
Swami SivanandaEnglish Commentary+
प्रसादे in peace? सर्वदुःखानाम् (of) all pains? हानिः destruction? अस्य of him? उपजायते arises (or happens)? प्रसन्नचेतसः of the tranilminded? हि because? आशु soon? बुद्धिः intellect (or reason)? पर्यवतिष्ठते becomes steady.Commentary When the mental peace is attained? there is no hankering after senseobjects. The Yogi has perfect mastery over his reason. The intellect abides in the Self. It is ite steady. The miseries of the body and the mind come to an end.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
शान्ति के मिलने पर क्या होगा ऐसा प्रश्न मानव बुद्धि में उठना स्वाभाविक है। शान्ति प्राप्त होने पर सब दुखों का अन्त हो जाता है। इस वाक्य में सुख की परिभाषा मिलती है। विक्षेपों का होना दुख कहलाता है। अत विक्षेपों के अभाव रूप मन की शान्ति का अर्थ सुख ही होना चाहिये। शान्ति ही सुख है और सुख ही शान्ति है।यहाँ दुखों की हानि से तात्पर्य वासना निवृत्ति से समझना चाहिये। गीता की प्रस्तावना में हमने देखा है कि बुद्धि पर पड़े वासनाओं के आवरण के कारण मनुष्य शोकमोह को प्राप्त होता है जबकि ज्ञानी पुरुष पूर्ववर्णित बुद्धियोग के अभ्यास से वासनाओं का क्षय करके उनके परे आत्मतत्त्व को पहचान लेता है। सामान्यत वासनाओं से मुक्ति पाना मनुष्य के लिये कठिन प्रतीत होता है परन्तु आत्मसंयम एवं समत्त्वयोग के द्वारा यह कार्य सम्पादन किया जा सकता है।अगले श्लोक में भगवान् कहते हैं
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या-- 'तु'-- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयससे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ तु पद आया है। 'विधेयात्मा' साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है। 'आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः'-- जैसे 'विधेयात्मा' पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है, ऐसे ही 'आत्मवश्यैः' पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका राग-द्वेष रहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है, जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि 'प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो; क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं।' पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि 'जो साधक राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।''विषयान् चरन्'-- जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई है, ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है, पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषय-सेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ 'विधेयात्मा आत्मवश्यैः' आदि पद आये हैं।'प्रसादमधिगच्छति'-- राग-द्वेषरहित होकर विषयों-का सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता-(स्वच्छता-) को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता 17। 16) जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये, क्योंकि राग और द्वेष--इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है।राग-द्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है, उसका अगर सङ्ग न किया जाय, भोग न किया जाय, तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। 'प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते'-- चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं। जितने भी दुःख हैं, वे सब-के-सब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीरसंसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है, तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है--'सर्वदुःखानां हानिः'। तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं--संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें निश्चला और अचला पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है। यहाँ 'सर्वदुःखानां हानिः' का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना, परिस्थिति आ सकती है; परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख, सन्ताप, हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती। 'प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते'-- प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मानें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है, उसकी बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। मार्मिक बात भगवद्विषयक प्रसन्नता हो अथवा व्याकुलता हो--इन दोनोंमेंसे कोई एक भी अगर अधिक बढ़ जाती है, तो वह शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। जैसे, भगवान्के पास जाती हुई गोपियोंको माता-पिता, भाई, पति आदिने रोक दिया, मकानमें बंद कर दिया तो उन गोपियोंमें भगवान्से मिलनेकी जो व्याकुलता हुई, उससे उनके पाप नष्ट हो गये और भगवान्का चिन्तन करनेसे जो प्रसन्नता हुई उससे उनके पुण्य नष्ट हो गये। इस प्रकार पाप-पुण्यसे रहित होकर वे शरीरको वहीं छोड़कर सबसे पहले भगवान्से जा मिलीं (टिप्पणी प0 102)। परन्तु सांसारिक विषयोंको लेकर जो प्रसन्नता और खिन्नता होती है, उन दोनोंमें ही भोगोंके संस्कार दृढ़ होते हैं अर्थात् संसारका बन्धन दृढ़ होता है। इसके उदाहरण संसारमात्रके सामान्य प्राणी हैं, जो प्रसन्नता और खिन्नताको लेकर संसारमें फँसे हुए हैं।प्रसन्नता और व्याकुलता-(खिन्नता-) में अन्तःकरण द्रवित हो जाता है। जैसे द्रवित मोममें रंग डालनेसे मोममें वह रंग स्थायी हो जाता है, ऐसे ही अन्तःकरण द्रवित होनेपर उसमें भगवत्सम्बन्धी अथवा सांसारिक--जो भी भाव आते हैं, वे स्थायी हो जाते हैं। स्थायी होनेपर वे भाव उत्थान अथवा पतन करनेवाले हो जाते हैं। अतः साधकके लिये उचित है कि संसारकी प्रिय-से-प्रिय वस्तु मिलनेपर भी प्रसन्न न हो और अप्रिय-से-अप्रिय वस्तु मिलनेपर भी उद्विग्न न हो। सम्बन्ध-- पीछेके दो श्लोकोंमें जो बात कही है उसीको आगेके दो श्लोकोंमें व्यतिरेक रीतिसे पुष्ट करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।2.64 2.65।।ध्यायत इति। क्रोधादिति। तपस्विनो विषयत्याग एव विषयग्रहणे पर्यवस्यति। ध्यात्वा हि ते त्यजन्ते। ध्यानकाले एव च (S omits च) संगादयः उपजायन्ते इति अनपायो (K अनुपायो) विषयत्यागः स्थिरप्रज्ञस्य एव।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
तथापि नानाविधदुःखाभिभूतत्वान्न स्वास्थ्यमास्थातुं शक्यमित्याशयेन पृच्छति प्रसाद इति। श्लोकार्धेनोत्तरमाह उच्यत इति। सर्वदुःखहान्या बुद्धिस्वास्थ्येऽपि प्रकृतं प्रज्ञास्थैर्यं कथं सिद्धमित्याशङ्क्याह प्रसन्नेति। बुद्धिप्रसादस्यैव फलान्तरमाह किञ्चेति। तस्माद्बुद्धिप्रसादार्थं प्रयतितव्यमिति शेषः। श्लोकद्वयस्याक्षरोत्थमर्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमुपसंहरति एवमिति। युक्तः समाहितो विषयपारवश्यशून्यः सन्निति यावत्।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
प्रसादे इति। प्रसादे सति अस्य विवेकिनः सर्वदुःखानां त्रिविधतापानां हानिरुपजायते। कुत इत्यत आह प्रसन्नेति। हि यस्मात्प्रसन्नचेतस आशु शीघ्रं बुद्धिः आत्मस्वरुपेणैव निश्चलीभवतीत्यर्थः। एवं प्रसन्नचेतसः स्थिरबुद्धेः कृतकृत्यता यतः तस्माद्रागद्वेषवियुक्तैरिन्द्रियैः शास्त्राविरुद्धेष्वावश्यकेषु जीवनहेतुभूतेषु युक्तः समाचरेदिति वाक्यार्थः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
प्रसादे सति किं स्यात् इत्यत उक्तंप्रसाद इति तदाक्षिपति कथ मिति। तरति शोकमात्मवित् छां.उ.7।1।3 इत्यादिविरोधादिति भावः। किञ्च प्रसादे सति ज्ञानं भवतीति वा व्यवधानान्तरं वा वक्तव्यं तत्रोक्तम्। सर्वदुःखहानिश्चावक्तव्यैवोक्तेति चाक्षेपशेषः। एतत्परिहारत्वेनोत्तरार्धं व्याख्याति प्रसन्ने ति। एतेनप्रसादस्य फलद्वयमुच्यते इत्यपि प्रतीतिर्निरस्ता भवति। प्रसादे सति ब्रह्मापरोक्षज्ञानं भवति। तच्च व्यवधानेनेति भविष्यति। ततो भवति सर्वदुःखहानिः प्रसादफलतयोक्तेति न वक्तव्यानुक्तिः नाप्यवक्तव्योक्तिः।बुद्धियुक्तः 2।50 इति श्लोके सुकृतदुष्कृतहानं ज्ञानफलमित्युक्तम् तदयुक्तम् अपुरुषार्थत्वात् इत्याशङ्कां परिहर्तुं प्रसङ्गादिदमुक्तमिति। ननु यस्यानायासेनाभिलषितविषयोपनतिस्तस्य मनोऽव्याकुलं प्रसन्नमित्युच्यते। ततः कथं प्रसादस्येन्द्रियजयफलत्वं ज्ञानसाधनत्वं चोच्यते इत्यत आह प्रसाद इति। अत्र विवक्षितेति शेषः। स्वतोऽपि प्रयत्नं विनाऽपि विषयागतिर्विषयान्प्रत्यप्रवृत्तिः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक्स्थितिं करोति। प्रसादो नाम स्वतः प्रायो विषयागतिः।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
प्रसादमधिगच्छति इत्युक्तं तत्र प्रसादे सति किं स्यादित्युच्यते। चित्तस्य प्रसादे स्वच्छत्वरूपे सति सर्वदुःखानामाध्यात्मिकादीनामज्ञानविलसितानां हानिर्विनाशोऽस्य यतेरुपजायते। हि यस्मात्प्रसन्नचेतसो यतेराशु शीघ्रमेव बुद्धिर्ब्रह्मात्मैक्याकारा पर्यवतिष्ठते परि समन्तादवतिष्ठते स्थिरा भवति विपरीतभावनादिप्रतिबन्धाभावात्। ततश्च प्रसादे सति बुद्धिपर्यवस्थानं ततस्तद्विरोध्यज्ञाननिवृत्तिः ततस्तत्कार्यसकलदुःखहानिरिति क्रमेऽपि प्रसादे यत्नाधिक्याय सर्वदुःखहानिकरत्वकथनमिति न विरोधः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
किंच चित्तस्य प्रसादे हि अस्य पुंसः सर्वदुःखानां काममूलकानां कामाभावाद्धानिः परिहारो जायते। कामानुदये हेतुमाह प्रसन्नेति। हि यस्मात्प्रसन्नचेतसः पुंसो बुद्धिर्ब्रह्मात्मैक्यनिश्चय आशु शीघ्रं पर्यवतिष्ठते सुदृढो भवति। तस्मिंश्च सति प्राप्याभावान्न कामोदय इत्यर्थः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
प्रसादे किं स्यात् इत्याशङ्क्याह प्रसाद इति। प्रसादे जाते सति अस्य तदनुगृहीतस्य सर्वदुःखानां हानिर्नाशः स्यात्। सर्वपदेनालौकिकविप्रयोगादीनामपि नाशो ज्ञापितस्तेन संयुक्त एव नित्यं तिष्ठेदिति भावो व्यञ्जितः। सर्वदुःखहानौ सत्यां किं स्यात् अत आह प्रसन्नचेतस इति। दुःखहानौ प्रसन्नं चेतो यस्य तादृशो भवति। ततस्तस्य अनु शीघ्रमेव बुद्धिः पर्यवतिष्ठते। मयीति शेषः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अस्य पुरुषस्य मनसः प्रसादे सति प्रकृतिसंसर्गप्रयुक्तसर्वदुःखानां हानिः उपजायते। प्रसन्नचेतसः आत्मावलोकनविरोधिदोषरहितमनसः तदानीम् एव हि विविक्तात्मविषया बुद्धिः मयि पर्यवतिष्ठते अतो मनःप्रसादे सर्वदुःखानां हानिः भवति एव।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
प्रसादे सर्वदुःखानाम् आध्यात्मिकादीनां हानिः विनाशः अस्य यतेः उपजायते। किञ्च प्रसन्नचेतसः स्वस्थान्तःकरणस्य हि यस्मात् आशु शीघ्रं बुद्धिः पर्यवतिष्ठते आकाशमिव परि समन्तात् अवतिष्ठते आत्मस्वरूपेणैव निश्चलीभवतीत्यर्थः।।एवं प्रसन्नचेतसः अवस्थितबुद्धेः कृतकृत्यता यतः तस्मात् रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः शास्त्राविरुद्धेषु अवर्जनीयेषु युक्तः समाचरेत् इति वाक्यार्थः।।सेयं प्रसन्नता स्तूयते
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
प्रसादे सति किं स्यादित्यत्राह प्रसाद इति। प्रसादे सति सर्वदुःखनाशस्ततश्च प्रसन्नचेतसो बुद्धिः प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।2.64 2.65।।नन्विन्द्रियाणां विषयाभिमुखस्वभावानां निरोधस्याशक्यत्वाद्दोषो दुष्परिहर इति कथं प्रज्ञायाः प्रतिष्ठितत्वं इत्याशङ्क्याह द्वाभ्याम् रागेति। यो वश्यात्मा स्वेन्द्रियै रागद्वेषवियुक्तैर्विषयानुपभुञ्जानोऽपि प्रसादं प्रशान्तिमधिगच्छति तस्य प्रसन्नचेतसः प्रज्ञा प्रतिष्ठिताऽवसेया।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
Vedantadeshikacharya Venkatanatha did not comment on this sloka