श्लोक · Shlok 39
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा | कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥
āvṛtaṃ jñānametena jñānino nityavairiṇā. kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca.
Translation · अर्थ
English
O Arjuna, wisdom is enveloped by this constant enemy of the wise in the form of desire, which is unappeasable as fire.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
Explore different interpretations
A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
It is said in the Manu-smṛti that lust cannot be satisfied by any amount of sense enjoyment, just as fire is never extinguished by a constant supply of fuel. In the material world, the center of all activities is sex, and thus this material world is called maithunya-āgāra, or the shackles of sex life. In the ordinary prison house, criminals are kept within bars; similarly, the criminals who are disobedient to the laws of the Lord are shackled by sex life. Advancement of material civilization on the basis of sense gratification means increasing the duration of the material existence of a living entity. Therefore, this lust is the symbol of ignorance by which the living entity is kept within the material world. While one enjoys sense gratification, it may be that there is some feeling of happiness, but actually that so-called feeling of happiness is the ultimate enemy of the sense enjoyer.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
आवृतम् enveloped? ज्ञानम् wisdom? एतेन by this? ज्ञानिनः of the wise? नित्यवैरिणा by the constant enemy? कामरूपेण whose form is desire? कौन्तेय O Kaunteya? दुष्पूरेण unappeasable? अनलेन by fire? च and.Commentary Manu says? Desire can never be satiated or cooled down by the enjoyment ofobjects. But as fire blazes forth the more when fed with Ghee (melted butter) and wood? so it grows the more it feeds on the objects of enjoyment. If all the foodstuffs of the earth? all the precious metals? all the animals and all the beautiful women were to pass into the possession of one man endowed with desire? they would still fail to give him satisfaction.The ignorant man considers desire as his friend when he craves for objects. He welcomes desire for the gratification of the senses but the wise man knows from experience even before suffering the conseence that desire will bring only troubles and misery for him. So it is a constant enemy of the wise but not of the ignorant.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि उस कामरूप शत्रु के द्वारा यह ज्ञान अर्थात् विवेक सार्मथ्य आच्छादित हो जाती है। आत्मानात्म नित्यानित्य और सत्यासत्य में जिस विवेक सार्मथ्य के कारण सब प्राणियों में मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है उसी बुद्धि की क्षमता को यह आवृत कर देता है। यह काम दुष्पूर अर्थात् इसका पूर्ण होना असम्भव ही होता है।अब भगवान् उस काम के निवास स्थान बताते हैं जिसके ज्ञान से शत्रु को नष्ट करना सरल होगा
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--'एतेन'-- सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने पाप करवानेमें मुख्य कारण 'काम' अर्थात् कामनाको बताया था। उसी कामनाके लिये यहाँ 'एतेन'पद आया है। 'दुष्पूरेणानलेन च'-- जैसे अग्निमें घीकी सुहाती-सुहाती (अनुकूल) आहुति देते रहनेसे अग्नि कभी तृप्त नहीं होती, प्रत्युत बढ़ती ही रहती है, ऐसे ही कामनाके अनुकूल भोग भोगते रहनेसे कामना कभी तृप्त नहीं होती, प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती ही रहती है (टिप्पणी प0 194)। जो भी वस्तु सामने आती रहती है, कामना अग्निकी तरह उसे खाती रहती है।भोग और संग्रहकी कामना कभी पूरी होती ही नहीं। जितने ही भोग-पदार्थ मिलते हैं, उतनी ही उनकी भूख बढ़ती है। कारण कि कामना जडकी ही होती है, इसलिये जडके सम्बन्धसे वह कभी मिटती नहीं प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती है। सुन्दरदासजी लिखते हैं-- जो दस बीस पचास सत होइ हजार तो लाख मँगैगी। कोटि अरब्ब खरब्ब असंख्य पृथ्वीपति होन की चाह जगैगी।। स्वर्ग पतालको राज करौ तृष्ना अघकी अति आग लगैगी। सुन्दर एक संतोष बिना सठ तेरी तो भूख कभी न भगैगी।। जैसे, सौ रुपये मिलनेपर हजार रुपयोंकी भूख पैदा होती है, तो इससे सिद्ध हुआ कि नौ सौ रुपयोंका घाटाहुआ है। हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे दस हजार रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है तो यह नौहजार रुपयोंका घाटा हुआ है। दस हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे एक लाख रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो यह नब्बे हजार रुपयोंका घाटा हुआ है। लाख रुपये मिलनेपर फिर दस लाख रुपयोंसे सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत सीधे करोड़ रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो सिद्ध हुआ कि निन्यानबे लाख रुपयोंका घाटा हुआ है। इस प्रकार वहम तो यह होता है कि लाभ बढ़ गया, पर वास्तवमें घाटा ही बढ़ा है। जितना धन मिलता है, उतनी ही दरिद्रता (धनकी भूख) बढ़ती है। वास्तवमें दरिद्रता उसकी मिटती है, जिसे धनकी भूख नहीं है।'चाह गयी चिन्ता मिटी, मनुआँ बेपरवाह'।जिनको कछू न चाहिये, सो साहनपति साह।।वास्तवमें धन उतनी बाधक नहीं है, जितनी बाधक उसकी कामना है। धनकी कामना चाहे धनीमें हो या निर्धनमें, दोनोंको वह परमात्मप्राप्तिसे वञ्चित रखती है। कामना किसीकी भी कभी पूरी नहीं होती; क्योंकि यह पूरी होनेवाली चीज ही नहीं है। कामनासे रहित तो कामनाके मिटनेपर ही हो सकते हैं।'कामरूपेण'--जडके सम्बन्धसे होनेवाले सुखकी चाहको 'काम' कहते हैं। नाशवान् संसारसे थोड़ी भी महत्त्वबुद्धिका होना 'काम' है।अप्राप्तको प्राप्त करनेकी चाह 'कामना' है। अन्तःकरणमें जो अनेक सूक्ष्म कामनाएँ दबी रहती हैं उनको 'वासना' कहते हैं। वस्तुओंकी आवश्यकता प्रतीत होना 'स्पृहा' है। वस्तुमें उत्तमता और प्रियता दीखना 'आसक्ति' है। वस्तु मिलनेकी सम्भावना रखना 'आशा' है। और अधिक वस्तु मिल जाय--यह 'लोभ' या 'तृष्णा' है। वस्तुकी इच्छा अधिक बढ़नेपर 'याचना' होती है। ये सभी 'काम'के ही रूप हैं।'ज्ञानिनो नित्यवैरिणा'-- यहाँ 'ज्ञानिनः' पद साधनमें लगे हुए विवेकशील साधकोंके लिये आया है। कारण कि विवेकशील साधक ही इस कामरूप वैरीको पहचानता है और उसका नाश करता है। साधन न करने-वाले दूसरे लोग तो उसे पहचानते ही नहीं प्रत्युत इसे सुखदायी समझते हैं।भगवान् कहते हैं कि यह काम विवेकशील साधकोंका नित्य वैरी है। कामना उत्पन्न होते ही विवेकशील साधकको विचार आता है कि अब कोई-न-कोई आफत आयेगी! कामनामें संसारका महत्त्व और आश्रय रहता है, जो पारमार्थिक मार्गमें महान् बाधक है। विवेकी साधकको कामना आरम्भसे ही चुभती रहती है। परिणाममें तो कामना सबको दुःख देती ही है। इसलिये यह साधककी नित्य (निरन्तर) वैरी है।भोगोंमें लगे हुए अज्ञानियोंको यह कामना मित्रके समान मालूम देती है; क्योंकि कामनाके कारण ही भोगोंमें सुख प्रतीत होता है। कामना न हो तो भोगपदार्थ सुख नहीं दे सकते। परन्तु परिणाममें उन्हें दुःख, सन्ताप, कैद, नरक आदि प्राप्ति होते ही हैं। इसलिये वास्तवमें यह कामना अज्ञानियोंकी भी नित्य वैरी है। परन्तु अज्ञानियोंको जागृति नहीं रहती, जब कि विवेकशील साधकोंको जागृति रहती है।'आवृतं ज्ञानम्'-- विवेक प्राणिमात्रमें है। पशु-पक्षी आदि मनुष्येतर योनियोंमें यह विवेक विकसित नहीं होता और केवल जीवन-निर्वाहतक सीमित रहता है। परन्तु मनुष्यमें यदि कामना न हो तो यह विवेक विकसित हो सकता है; क्योंकि कामनाके कारण ही मनुष्यका विवेक ढका रहता है। विवेक ढका रहनेसे मनुष्य अपने लक्ष्य परमात्मप्राप्तिकी ओर बढ़ नहीं सकता, क्योंकि कामना उसे चिन्मय-तत्त्वकी ओर नहीं जाने देती, प्रत्युत जड-तत्त्वमें ही लगाये रखती है।अपने प्रचि कोई अप्रिय एवं असत्य बोले तो वह बुरा लगता है और प्रिय एवं सत्य बोले तो अच्छा लगताहै। इसका अर्थ यह हुआ कि अच्छे-बुरे, सद्गुण-दुर्गुण, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका ज्ञान अर्थात् विवेक सभी मनुष्योंमें रहता है। परन्तु ऐसा होनेपर भी वह अप्रिय और असत्य बोलता है, अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, तो इसका कारण यही है कि कामनाने उसका विवेक ढक दिया है।कामनाके कारण ही 'त्याग में सुख है'--यह ज्ञान काम नहीं करता। मनुष्यको प्रतीत तो ऐसा होता है कि अनुकूल भोग-पदार्थके मिलनेसे सुख होता है, पर वास्तवमें सुख उसके त्यागसे होता है। यह सभीका अनुभव है कि जाग्रत् और स्वप्नमें भोग-पदार्थोंसे सम्बन्ध रहनेपर सुख और दुःख दोनों होते हैं, पर सुषुप्ति-(गाढ़ निद्रा-) में भोग-पदार्थोंकी किञ्चित् भी स्मृति न रहनेपर सुख ही होता है, दुःख नहीं। इसलिये गाढ़ निद्रासे जागनेपर वह कहता है कि'मैं बड़े सुखसे सोया'। इसके सिवाय जाग्रत् और स्वप्नसे थकावट आती है, जब कि सुषुप्तिसे थकावट दूर होती है और ताजगी आती है। इससे सिद्ध होता है कि भोग-पदार्थोंके त्यागमें ही सुख है।धनकी कामना होते ही धन मनके द्वारा पकड़ा जाता है। जब बाहरसे धन प्राप्त हो जाता है, तब मनसे पकड़े हुए धनका त्याग हो जाता है और सुखकी प्रतीति होती है। अतः वास्तवमें सुखकी प्रतीति बाहरसे धन मिलनेपर नहीं हुई, प्रत्युत मनसे पकड़े हुए धनके त्यागसे ही हुई है है। यदि धनके मिलनेसे ही सुख होता तो उस धनके रहते हुए कभी दुःख नहीं आता; परन्तु उस धनके रहते हुए भी दुःख आ जाता है।जब मनुष्य किसी वस्तुकी कामना करता है, तब वह पराधीन हो जाता है। जैसे, उसके मनमें घड़ीकी कामना पैदा हुई। कामना पैदा होते ही उसको घड़ीके अभावका दुःख होने लगता है तो यह घड़ीकी पराधीनता है। वह सोचता है कि यदि रुपये मिल जायँ तो अभी घड़ी खरीद लूँ अर्थात् रुपयोंके होनेसे अपनेको स्वाधीन और न होनेसे अपनेको पराधीन मानता है। यह मान्यता बिलकुल गलत है। वास्तवमें रुपये मिलनेपर घड़ीकी पराधीनता तो नहीं रही, पर रुपयोंकी पराधीनता तो हो ही गयी; क्योंकि रुपये भी 'पर' हैं 'स्व' नहीं। जैसे वस्तुकी कामना होनेसे वह वस्तुके पराधीन हुआ, ऐसे ही रुपयोंकी कामना होनेसे रुपयोंके पराधीन हुआ। पराधीनता तो वैसी-की-वैसी ही रही! परन्तु कामनासे विवेक ढका जानेके कारण मनुष्यको वस्तुकी पराधीनताका तो अनुभव होता है, पर रुपयोंकी पराधीनताका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत रुपयोंके कारण वह स्वाधीनताका अनुभव करता है। जो पराधीनता स्वाधीनताके रूपमें दिखायी देती है, उस पराधीनतासे छूटना बड़ा कठिन होता है।संसारमात्र क्षणभङ्गुर है। शरीर, धन, जमीन, मकान आदि जितनी भी सांसारिक वस्तुएँ हैं, वे सब-की-सब प्रतिक्षण विनाशकी ओर जा रही हैं और हमारेसे वियुक्त भी हो रही हैं। परन्तु भोग भोगते समय उनकी क्षणभङ्गुरताका ज्ञान नहीं रहता। पदार्थको नित्य और स्थिर माने बिना सुखभोग हो ही नहीं सकता। साधारण मनुष्योंकी बात ही क्या है, साधक भी भोगोंको नित्य और स्थिर माननेपर ही उनमें फँसता है। इसका कारण कामनाद्वारा विवेक ढका जाना ही है।विशेष बात मनुष्यको सदाके लिये महान् बनानेके उद्देश्यसे भगवान् कामनाको 'नित्यवैरी' बताकर उससे बचनेके लिये सावधान करते हैं; क्योंकि कामना ही सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका कारण है। एक मनुष्य अपनी स्त्रीको ढूँढ रहा था। लोगोंने पूछा--तुम्हारी स्त्रीका नाम क्या है? उसने कहा--फजीती। फिर पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? उसने कहा-- बदमाश। लोगोंने कहा--घबराओ मत, बड़ी पतिव्रता स्त्री है, अपने-आप आ जायगी! कारण कि बदमाशको फजीती (बदनामी) अवश्य मिलती है। इसी प्रकार संसारके नाशवान् भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्यके पास दुःख अपने-आप आते हैं। मनुष्य दुःखोंसे तो बचना चाहता है, पर दुःखोंके कारण 'काम'-(कामना-) को नहीं छोड़ता। कामनाके रहते हुए स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता-- 'काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं' (मानस 7। 90। 1)। भगवान् 'अनलेन दुष्पूरेण' पदोंसे यह बताते हैं कि भोग-पदार्थोंसे कामना कभी पूरी नहीं होती। ज्यों-ज्यों भोग-पदार्थ मिलते हैं, त्यों-ही-त्यों उनकी कामना बढ़ती है और ज्यों-ज्यों कामना बढ़ती है त्यों-ही-त्यों अभावका अधिक अनुभव होता है एवं अभावको मिटानेके लिये मनुष्य पाप-कर्मोंमें प्रवृत्त होता है। जैसे, धनकी कामना उत्पन्न होनेपर मनुष्य धनकी प्राप्तिमें न्याय-अन्यायका विचार नहीं करता। फिर कामना बढ़नेपर (द्वितीयावस्थामें) वह चोरी, डाके आदिमें भी लग जाता है। फिर और अधिक कामना बढ़नेपर (तृतीयावस्थामें) वह धनके लिये दूसरोंको जानेसे भी मार डालता है। इस प्रकार नाशवान् सुखकी कामना करनेवाला मनुष्य अपने लोक और परलोक--दोनोंको महान् दुःखरूप बना लेता है। सम्बन्ध-- किसी शत्रुको नष्ट करनेके लिये उसके रहनेके स्थानोंकी जानकारी होनी आवश्यक है, इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञानियोंके नित्यवैरी 'काम' के रहनेके स्थान बताते हैं?
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
आवृतमिति। कामरूप इच्छायां यतश्चरति। अनलेन च अग्निनेव पूरयितुमशक्येन दृष्टादृष्टद्वयदाहकत्वात्।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
सामान्यतो निर्दिष्टं विशेषतो निर्देष्टुमाकाङ्क्षापूर्वकमनन्तरश्लोकमवतारयति किं पुनरिति। कामस्य ज्ञानं प्रत्यावरणसिद्ध्यर्थं ज्ञानिनो नित्यवैरिणेत्यादिविशेषणम्। प्रतीकमादाय व्याकरोति आवृतमित्यादिना। ज्ञानिनां प्रतिवैरित्वेऽपि नित्यवैरित्वं कामस्य कथमित्याशङ्क्याह ज्ञानी हीति। अनर्थप्राप्तिमन्तरेण कामस्य प्रसङ्गावस्था पूर्वमेवेत्युच्यते अतःशब्देन कामप्रसक्तिरेव परामृश्यते नित्यमेवेत्युत्पत्त्यवस्था कार्यावस्था च कामस्य कथ्यते। ननु सर्वस्यापि कामात्मता न प्रशस्तेति कामो नित्यवैरी भवति ततः कुतो ज्ञानिविशेषणमित्याशङ्क्याह नत्विति। अज्ञस्य नासौ नित्यवैरीत्येतदुपपादयति स हीति। कार्यप्राप्तिप्रागवस्था पूर्वमित्युक्ता अज्ञं प्रति वैरित्वे सत्यपि कामस्य नित्यवैरित्वाभावे फलितमाह अत इति। स्वरूपतो नित्यवैरित्वाविशेषेऽपि ज्ञानाज्ञानाभ्यामवान्तरभेदसिद्धिरित्यर्थः। आकाङ्क्षाद्वारा प्रकृतं वैरिणमेव स्फोरयति किंरूपेणेत्यादिना।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
इदंशब्दवाच्यं दर्शयति आवृतमिति। एतेन कामेन ज्ञानं विवेकरुपमावृतं ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। ज्ञानी हि तदुत्पत्तिकालेऽपि जानात्यनेनाहमनर्थे नियोजित इति। तत आरभ्यैव दुःखी भवति। तेनासौ ज्ञानिनो नित्यवैरी नतु मूर्खस्य। स हि कामं तदुत्पत्तिकाले मित्रमिव पश्यन् तदानीमहमनेन दुःखे नियोजित इति न जानाति किंतु तत्कार्ये दुःखे प्राप्तेऽतस्तस्य नायं नित्यवैरी। केन रुपेण वैरीत्यत आह। कामः कामनेच्छैव रुपं यस्य तेन दुःखेन पूरणमस्य तेन। कुत इत्यत आह। नालं पर्याप्तिरस्य विद्यत इत्यनलः तेन। यो हि कदाचित्तृप्तिं गच्छति स पूरयितुं शक्यः अयं तु न तथेत्यर्थः। चकार उपमार्थः। अनलेन बह्निनेवेति व्याख्यानं तु सुगमत्वादाचार्यैरुपेक्षितम्। यत्तु ज्ञायतेनेनेति ज्ञानमन्तःकरणमिति तदुपेक्ष्यम्। ज्ञानविज्ञाननाशनमित्यनुरोधेनात्रापि विवेकज्ञानग्रहणस्यौचित्यात्। कौन्तेय इति संबोधयन् संबन्धिवियोगो मा भवत्वित्येवंरुपेण कामेनैवावृतज्ञानस्त्वमपि स्त्रीस्वभावे शोकमोहरुपे नियोजितोऽसीति ध्वनयति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
एवं ज्ञेयज्ञानकरणज्ञातृप्रतिबन्धकत्वोक्त्या ज्ञानप्रतिबन्धकत्वमुक्तम्।आवृतं ज्ञानं इत्यनेन पुनः किमुच्यत इत्यत आह शास्त्रत इति। पूर्वं ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वमुक्तं इदानीं तु कथञ्चिज्जातमपि ज्ञानं न स्वकार्याय प्रभवतीत्युच्यते। अतो न पुनरुक्तिदोष इति भावः।कामकारेण चैके ब्र.सू.3।4।15 इति वचनात्। अपरोक्षज्ञानस्य मोक्षसाधने न केनापि प्रतिबन्ध इत्यत उक्तं शास्त्रत इति। परमात्मापारोक्ष्यायेति च। न प्रकाशते न प्रभवति। ज्ञानिन इति व्यर्थम्। ज्ञानस्य ज्ञानिसम्बन्धाव्यभिचारादित्यत आह ज्ञानिनोऽपीति शास्त्रजनितज्ञानवतोऽपि। अल्पज्ञानिनो गुरूपदेशमात्रजनितज्ञानवतः। अपरे तु ज्ञानिनो नित्यवैरिणा न मूर्खस्य। ज्ञानी हि विनाशयिष्यामि काममिति यतते मूर्खस्तु तमनुवर्तते इति वर्णयन्ति तदनेनैव निरस्तम्। अपकारित्वं खल्वत्र वैरित्वं विवक्षितं तच्च ज्ञान्यपेक्षया मूर्खेऽधिकं न हि मूर्खस्तं नानुसन्धत्त इत्येतावता तत्रास्ति।इच्छानुरूपं रूपं यस्यासौ कामरूपः इत्युच्यते। न चैतत्कामेऽन्तःकरणधर्मे सम्भवतीत्यत आह कामेति रूप्यतेऽनयेति रूपमाख्याऽत्र विवक्षितेत्यर्थः। तर्हि विशेषणपदमिदं जातं किमस्य विशेष्वं इत्यत आह नित्येति। यो न पूरयितुं शक्यः स दुष्पूरः। कामस्तु विषयसम्पादनेन पूरयितुं शक्यः। कथं दुष्पूरः इत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे दुष्पूरेणेति। न नञर्थे दुःशब्दः किन्तु कृच्छ्रार्थ इत्यर्थः। तदुपपादयति न हीति। कामविषयोपलक्षणमेतत्। ननु प्रज्वलनात्मकत्वात्क्रोधोऽनलो युक्तः कामस्तु कथमनलः इत्यतः सोपपत्तिकमन्यथा व्याचष्टे यद्यपीति। इदमपि प्राप्तादधिकस्योपलक्षणम्। श्लोकद्वयार्थे प्रमाणसम्मतिमाह उक्तं चेति। कामकः कुत्सितकामो ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमः। तथा बुद्धेरन्तःकरणस्यादर्शस्य मलम्। अथ जीवस्य गर्भस्योल्ब इति सर्वत्र गूढोपमाएतेनेदं इत्युक्तस्य विवरणं द्वितीयश्लोक इति व्याख्यानमपाकृतं भवति।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्मापारोक्ष्याय न प्रकाशते कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि किम्वल्पज्ञानिनः। कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा दुष्पूरेण। दुःखेन हि कामः पूर्यते। न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते। यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तं पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलं बुद्धिर्नास्तीत्यनलः। उक्तं चज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा। आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भस्योल्बो हि कामकः इति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
तथा तेनेदमावृतमिति संग्रहवाक्यं विवृणोति ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानमन्तःकरणं विवेकविज्ञानं वा इदंशब्दनिर्दिष्टमेतेन कामेनावृतं तथाप्यापाततः सुखहेतुत्वादुपादेयः स्यादित्यत आह ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। अज्ञो हि विषयभोगकाले कामं मित्रमिव पश्यंस्तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते वैरित्वं जानाति कामेनाहं दुःखित्वमापादित इति। ज्ञानी तु भोगकालेऽपि जानात्यनेनाहमनर्थे प्रवेशित इति अतोऽविवेकी दुःखी भवति भोगकाले च तत्परिणामे चानेनेति ज्ञानिनोऽसौ नित्यवैरीति सर्वथा तेन हन्तव्य एवेत्यर्थः। तर्हि किंस्वरूपोऽसावित्यत आह कामरूपेण काम इच्छा तृष्णा सैव रूपं यस्य तेन। हे कौन्तेयेति संबन्धाविष्कारेण प्रेमाणं सूचयति। ननु विवेकिना हातव्योऽप्यविवेकिनोपादेयः स्यादित्यत आह दुष्पूरेणानलेन च। चकार उपमार्थः। न विद्यतेऽलं पर्याप्तिर्यस्येत्यनलो वह्निः। स यथा हविषा पूरयितुमशक्यस्तथायमपि भोगेनेत्यर्थः। अतो निरन्तरं संतापहेतुत्वाद्विवेकिन इवाविवेकिनोऽपि हेय एवासौ। तथाच स्मृतिःन जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।। इति। अथवा इच्छाया विषयसिद्धिनिवर्त्यत्वादिच्छारूपः कामो विषयभोगेन स्वयमेव निवर्तिष्यते किं तत्रातिनिर्बन्धेनेत्यत उक्तं दुष्पूरेणानलेन चेति। विषयसिद्ध्या तत्कालमिच्छातिरोधानेऽपि पुनः प्रादुर्भावान्न विषयसिद्धिरिच्छानिवर्तिका किंतु विषयदोषदृष्टिरेव तथेति भावः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
आवृतमिति। ज्ञानमन्तःकरणसत्त्वम्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव इति श्रुतेः। एतेन कामेन रजोगुणात्मकेनावृतम्। ज्ञानिनोऽन्तःकरणविशिष्टस्य प्रमातुः नित्यवैरिणा कामरूपेण दुष्पूरेण पूरयितुमयोग्येन। अयं हि पूर्यमाणोऽनर्थानेव प्रसवेत्। अनलेन अथापि पूर्यते चेत् अनलः नास्त्यलं पर्याप्तिर्यस्य स तथा तेनानलेन। न ह्यनलः काष्ठैस्तर्पयितुं शक्यः किंतु वर्धत एव तद्वदयमपीत्यर्थः। अयं भावः अन्तःकरणसत्वं हि वह्निवत्प्रकाशात्मकं तत्सहजेन कामेन वह्निरिव धूमेनावृतं चेत्प्रमातारमनर्थे पातयति। अन्यथा तदेव स्वभावशुद्धत्वाद्विवेकवैराग्योपगं भूत्वा तमुद्धरेत्। अतोऽयं कामो ज्ञानिनो नित्यवैरीति।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
हे कौन्तेय मूलतो भक्त मदुपदेशयोग्य ज्ञानिनो मदंशत्वेन स्वस्वरूपज्ञानवतो नित्यवैरिणा तेन कामेन ज्ञानमावृतं च पुनरनलेन रसपाचकेनोदरस्थेन तेनापि कामवृद्धिर्भवतीति कामरूपेण ज्ञानमावृतम्। कीदृशेनानलेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणं यस्य सः। अत एवजितं सर्वं जिते रसे इति वचनम्। कामस्यैव वा विशेषणम्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अस्य जन्तोः ज्ञानिनो ज्ञानस्वभावस्य आत्मविषयं ज्ञानम् एतेन कामकारेण विषयव्यामोहजननेन नित्यवैरिणा आवृतं दुष्पूरेण पूर्त्यनर्हविषयेण अनलेन च पर्याप्तिरहितेन।कैः उपकरणैः अयं काम आत्मानम् अधितिष्ठति इति अत्र आह
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
आवृतम् एतेन ज्ञानं ज्ञानिनः नित्यवैरिणा ज्ञानी हि जानाति अनेन अहमनर्थे प्रयुक्तः इति पूर्वमेव। दुःखी च भवति नित्यमेव। अतः असौ ज्ञानिनो नित्यवैरी न तु मूर्खस्य। स हि कामं तृष्णाकाले मित्रमिव पश्यन् तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते जानाति तृष्णया अहं दुःखित्वमापादितः इति न पूर्वमेव। अतः ज्ञानिन एव नित्यवैरी। किंरूपेण कामरूपेण कामः इच्छैव रूपमस्य इति कामरूपः तेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणमस्य इति दुष्पूरः तेन अनलेन न अस्य अलं पर्याप्तिः विद्यते इत्यनलः तेन च।।किमधिष्ठानः पुनः कामः ज्ञानस्य आवरणत्वेन वैरी सर्वस्य लोकस्य इत्यपेक्षायामाह ज्ञाते हि शत्रोरधिष्ठाने सुखेन निबर्हणं कर्तुं शक्यत इति
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
इदंशब्दनिर्दिष्टं दर्शयन्वैरित्वं स्फुटयति आवृतमिति। इदं तु विवेकज्ञानमेतेनावृतम् अज्ञस्य खलु भोगसमये कामः सुखहेतुरेव परिणामे तु वैरितां प्रपद्यते। ज्ञानिनः पुनस्तत्कालमप्यनर्थानुसंधानाद्दुःखहेतुरेवेति नित्यवैरिणेत्युक्तम्। किंच विषयैः पूर्यमाणोऽपि दुःपूरोऽपूर्यमाणः शोकसंतापहेतुत्वादनलतुल्यः। अनेन सर्वान्प्रति नित्यवैरित्वमुक्तम्।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
एतच्छब्देन निर्दिष्टं दर्शयन् वैरित्वं स्फुटयति आवृतं ज्ञानमिति स्पष्टम्। अनलत्वं च शोकसन्तापहेतुत्वात्।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
आवृतं ज्ञानम् इत्यादेः पौनरुक्त्यव्युदासायाह आवरणप्रकारमाहेति। अत्रतेनेदमावृतम् 3।38 इत्युक्ते किं तदावृतमित्याकाङ्क्षाया अपि कथमाकाङ्क्षा युक्तेति भावः। अत्र ज्ञानिशब्दो न तावन्निष्पन्नज्ञानविषयः तदवस्थस्य कामावृतज्ञानत्वाभावात्। ततश्चानिष्पन्नज्ञानसर्वक्षेत्रज्ञपरत्वमेवोचितमित्यभिप्रायेण अस्य जन्तोर्ज्ञानिन इत्युक्तम्।ज्ञानिनः इत्यत्र प्रत्ययस्य श्रुतिसिद्धस्वाभाविकसम्बन्धपरत्वप्रदर्शनायावरणस्यौपाधिकत्वद्योतनाय च ज्ञानस्वभावस्येत्युक्तम्। क्षेत्रज्ञस्यापि कर्मफलभोक्तुः शब्दादिविषयज्ञानावरणाभावात् आत्मविषयं ज्ञानमित्युक्तम्। कामरूपशब्दस्य स्वेच्छागृहीतरूपत्वे प्रसिद्धेस्तद्भ्रमव्युदासायोक्तंकामाकारेणेति। कामस्वभावादर्थान्तरादाक्षिप्तमात्मविषयज्ञानावरणप्रकारं व्यञ्जयति विषयव्यामोहजननेनेति।नित्यवैरिणा आत्मसाक्षात्कारोत्तरावधिनाऽनादिवैरिणेत्यर्थः। नित्यसंसारिसद्भावपक्षे चास्य केषुचिदात्मसु नित्यवैरित्वं सिद्धम्। योग्यैर्लब्धैरलम्भावराहित्यमनलशब्दार्थः।तृष्णाखनिरगाधेयं दुष्पूरा केन पूर्यते। या महद्भिरपि क्षिप्तैः पूरणैरेव खन्यते इत्युक्तप्रकारेणायोग्येषु दुर्लभेषु प्रवृत्तिहेतुत्वं दुष्पूरशब्दविवक्षितमित्यभिप्रायेणोक्तंदुष्पूरेण पूर्त्यनर्हविषयेण अनलेन च पर्याप्तिरहितेनेति। यद्वाऽनलशब्दोऽग्निपर्यायः कामे गौणः नह्यग्नेर्विषयविभागः पर्याप्तिर्वा स्यात् तद्वदिति भावः।