श्लोक · Shlok 37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन | ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
yathaidhāṃsi samiddho.agnirbhasmasātkurute.arjuna. jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasātkurute tathā.
Translation · अर्थ
English
As the blazing fire reduces fuel to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ashes.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
Perfect knowledge of self and Superself and of their relationship is compared herein to fire. This fire not only burns up all reactions to impious activities, but also all reactions to pious activities, turning them to ashes. There are many stages of reaction: reaction in the making, reaction fructifying, reaction already achieved, and reaction a priori. But knowledge of the constitutional position of the living entity burns everything to ashes. When one is in complete knowledge, all reactions, both a priori and a posteriori, are consumed. In the Vedas ( Bṛhad-āraṇyaka Upaniṣad 4.4.22) it is stated, ubhe uhaivaiṣa ete taraty amṛtaḥ sādhv-asādhūnī: “One overcomes both the pious and impious reactions of work.”
Swami SivanandaEnglish Commentary+
यथा as? एधांसि fuel? समिद्धः blazing? अग्निः fire? भस्मसात्कुरुते reduces to ashes? अर्जुन O Arjuna? ज्ञानाग्निः fire of knowledge? सर्वकर्माणि all actions? भस्मसात्कुरुते reduces to ashes? तथा so.Commentary Just as the sees that are roasted cannot germinate? so also the actions that are burnt by the fire of knowledge cannot bear fruits? i.e.? cannot bring man to this world again for the enjoyment of the fruits of his actions. This is reducing actions to ashes. The actions lose their potency as they are burnt by the fire of knowledge. When the knowledge of the Self dawns? all actions with their results are burnt by the fire of that knowledge just as fuel is burnt by the fire. When there is no agencymentality (the idea I do this)? when there is no desire for the fruits? action is no action at all. It has lost its potency. The fire of knowledge can burn all actions except the Prarabdha Karma? or the result of the past action which has brought this body into existence and which has thus already begun to bear fruits or produce effects.According to some philosophers even the Prarabdha Karma is destroyed by the fire of knowledge. Sri Sankara says in his AparokshanubhutiIn the passage his actions are destroyed when the Supreme is realised the Veda expressly speaks of actions (Karmas) in the plural? in order to signify the destruction of even the Prarabdha.There are three kinds of Karmas or reaction to or fructification of past actions (1) Prarabdha? so much of the past actions as has given rise to the present birth? (2) Sanchita? the balance of the past actions that will give rise to future births -- the storehouse of accumulated actions? and (3) Agami or Kriyamana? acts being done in the present life. If by the knowledge of the Self only the Sanchita and Agami were destroyed and not Prarabdha? the dual number would have been used and not the plural. (Sanskrit grammar has singular? dual and plural numbers). (Cf.IV.1019)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
यह दृष्टान्त सुपरिचित तथा अत्यन्त उपयुक्त है। ईन्धन की लकड़ियों का आकारप्रकार या रंग कुछ भी हो जब उन्हें अग्निकुण्ड में डाला जाता है तब सब का अन्तिम परिणाम एक ही होता है भस्म। उस भस्म के ढेर से हम विभिन्न लकड़ियों की राख को अलगअलग नहीं कर सकते। उनका मूलरूप सर्वथा नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार पाप और पुण्य जो भी और जितने भी कर्म हैं वे सब ज्ञानाग्नि में भस्मीभूत हो जाते है। उनका पूर्व का कार्यकारण रूप नष्ट हो जाता है।कर्म फल प्रदान करते हैं। परन्तु सभी कर्म एक साथ ही फलदायी नहीं हो सकते। नियमानुसार जब वे परिपक्व हो जाते हैं तभी उनका फल प्राप्त होने लगता हैं। अनादि काल से जीव कर्तृत्व का अभिमान करके अनेक कर्मों को करता आ रहा है। इसीलिये उसे अनेक प्रकार के शरीर भी धारण करने पड़ते हैं। इन कर्मों का फलोपभोग आवश्यक होता है।शास्त्रों में इन कर्मों का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है (क) संचितअर्जित किये कर्म जो अभी फलदायी नहीं हुए हैं (ख) प्रारब्ध जिन्होंने फल देना प्रारम्भ कर दिया है तथा (ग) आगामी अर्थात् जिन कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा। इस श्लोक में सब कर्मों से तात्पर्य संचित और आगामी कर्मों से है।इसलिये
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--'यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन'--पीछेके श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा सम्पूर्ण पाप-समुद्रको तरनेकी बात कही। उससे यह प्रश्न पैदा होता है कि पापसमुद्र तो शेष रहता ही है, फिर उसका क्या होगा? अतः भगवान् पुनः दूसरा दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि जैसे प्रज्वलित अग्नि काष्ठादि सम्पूर्ण ईंधनोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका किञ्चिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता, ऐसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण पापोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका किञ्चिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता।'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा'--जैसे अग्नि काष्ठको भस्म कर देती है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान-रूपी अग्नि संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण--तीनों कर्मोंको भस्म कर देती है। जैसे अग्निमें काष्ठका अत्यन्त अभाव हो जाता है ऐसे ही तत्त्वज्ञानमें सम्पूर्ण कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जाता है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान होनेपर कर्मोंसे अथवा संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही शेष रहता है। वास्तवमें मात्र क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं (गीता 13। 29)। उन क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेनेसे कर्म होते हैं। नाड़ियोंमें रक्त-प्रवाह होना, शरीरका बालकसे जवान होना, श्वासोंका आना-जाना, भोजनका पचना आदि क्रियाएँ जिस समष्टि प्रकृतिसे होती हैं, उसी प्रकृतिसे खाना-पीना, चलना, बैठना, देखना, बोलना आदि क्रियाएँ भी होती हैं। परन्तु मनुष्य अज्ञानवश उन क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है। इससे वे क्रियाएँ 'कर्म' बनकर मनुष्यको बाँध देती हैं। इस प्रकार माने हुए सम्बन्धसे ही कर्म होते हैं, अन्यथा क्रियाएँ ही होती हैं।तत्त्वज्ञान होनेपर अनेक जन्मोंके संचित कर्म सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। कारण कि सभी संचित कर्म अज्ञानके आश्रित रहते हैं; अतः ज्ञान होते ही (आश्रय, आधाररूप अज्ञान न रहनेसे) वे नष्ट हो जाते हैं। तत्त्वज्ञान होनेपर कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता; अतः सभी क्रियमाण कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् फलजनक नहीं होते। प्रारब्ध कर्मका घटना-अंश (अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति) तो जबतक शरीर रहता है, तबतक रहता है; परन्तु ज्ञानीपर उसका कोई असर नहीं पड़ता। कारण कि तत्त्वज्ञान होनेपर भोक्तृत्व नहीं रहता; अतः अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति सामने आनेपर वह सुखी-दुःखी नहीं होता। इस प्रकार तत्त्वज्ञान होनेपर संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण--तीनों कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। कर्मोंसे अपना सम्बन्ध न रहनेसे कर्म नहीं रहते, भस्म रह जाती है अर्थात् सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। सम्बन्ध--अब भगवान् आगे कहे श्लोकके पूर्वार्धमें तत्त्वज्ञानकी महिमा बताते हुए उत्तरार्धमें कर्मयोगकी विशेष महत्ता प्रकट करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।4.36 4.37।।सर्वं कर्माखिलम् (श्लो. 433) इति यदुक्तं तत्स्फुटयितुं प्रथमश्लोकेन अधर्मोऽपि नश्यति इति वदन् सर्वं कर्म इति द्वितीयेन संस्कारलेशोऽपि नावतिष्ठतीति सूचयन् अखिलम् इति व्याचष्टे अपि चेदिति। यथेति। सुसमिद्धोऽभ्यासजातप्रतिपत्तिदार्ढ्यबन्धेन (K omits सु) ज्ञानाग्निर्भवति यथा तथा प्रयतनीयमिति भावः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
ज्ञाने सत्यपि धर्माधर्मयोरुपलम्भात्कुतस्ततो निवृत्तिरित्याशङ्क्य ज्ञानस्य धर्माधर्मनिवर्तकत्वं दृष्टान्तेन दर्शयितुमनन्तरश्लोकमवतारयति ज्ञानमिति। योग्यायोग्यविभागेन निवर्तकत्वानिवर्तकत्वविभागमुदाहरति यथेति। दृष्टान्तानुरूपं दार्ष्टान्तिकमाचष्टे ज्ञानाग्निरिति। योग्यविषयेऽपि दाहकत्वमग्नेरप्रतिबन्धापेक्षयेति विवक्षित्वा विशिनष्टि सम्यगिति। दार्ष्टान्तिकं व्याचष्टे ज्ञानमेवेति। ननु ज्ञानं साक्षादेव कर्मदाहकं किमिति नोच्यते निर्बीजीकरोति कर्मेति किमिति व्याख्यानमित्याशङ्क्याह नहीति। ज्ञानस्य स्वप्रमेयावरणाज्ञानापाकरणे सामर्थ्यस्य लोके दृष्टत्वादविक्रियब्रह्मात्मज्ञानमपि तदज्ञानं निवर्तयन् तज्जन्यकर्तृत्वभ्रमं कर्मबीजभूतं निवर्तयति। तन्निवृत्तौ च कर्माणि न स्थातुं पारयन्ति नतु साक्षात्कर्मणां निवर्तकं ज्ञानमज्ञानस्यैव निवर्तकमिति व्याप्तेस्तदनिवृत्तौ तु पुनरपि कर्मोद्भवसंभवादित्यर्थः। ज्ञानस्य साक्षात्कर्मनिवर्तकत्वाभावे फलितमाह तस्मादिति। सम्यग्ज्ञानं मूलभूताज्ञाननिवर्तनेन कर्मनिवर्तकमिष्टं चेदारब्धफलस्यापि कर्मणो निवृत्तिप्रसङ्गाज्ज्ञानोदयसमकालमेव शरीरपातः स्यादित्याशङ्क्याह सामर्थ्यादिति। ज्ञानोदयसमसमयमेव देहापोहे तत्त्वदर्शिभिरुपदिष्टं ज्ञानं फलवदिति भगवदभिप्रायस्य बाधितत्वप्रसङ्गादाचार्यलाभान्यथानुपपत्त्या प्रवृत्तफलकर्मसंपादकमज्ञानलेशं न नाशयति ज्ञानमित्यर्थः। कथं तर्हि प्रारब्धफलं कर्म नश्यतीत्याशङ्क्याह येनेति। तर्हि कथं ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्करोतीत्युक्तं तत्राह अत इति। ज्ञानादारब्धफलानां कर्मणां निवृत्त्यनुपपत्तेरनारब्धफलानि यानि कर्माणि पूर्वं ज्ञानोदयादस्मिन्नेव जन्मनि कृतानि ज्ञानेन च सह वर्तमानानि प्राचीनेषु चानेकेषु जन्मस्वर्जितानि तानि सर्वाणि ज्ञानं कारणनिवर्तनेन निवर्तयतीत्यर्थः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
ननु ज्ञानप्लवेन तरिष्यसीत्युक्त्या ज्ञानस्य पापनाशक्त्वं नागतमित्याशङ्क्य पापं नाशयति ज्ञानं नावशेषयति तन्नाश एव तत्तरणमित्यभिप्रेत्य सदृष्टान्तमाह। यथैधांसि काष्ठानि सभ्यग्दीप्तोऽग्निर्भस्मसाद्भस्मीभावं कुरुते। तथा ज्ञानमेवाग्निर्ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मीभावं कुरुते। निर्बीजं करोतीत्यर्थः। अर्जुनेतिसंबोधयन् शुद्धचित्तेनैवेदृशं ज्ञानं लभ्यते नान्येनेति द्योतयति। यद्वा तच्च ज्ञानं सर्वकर्माणि दग्ध्वा शुद्धं ब्रह्म संपद्यत इति सूचयति। यद्वैवंभूतेन ज्ञानेन सर्वाणि कर्माणि भस्मसात्कृत्वाऽन्वर्थशंज्ञो भवेति सूचयन्नाहार्जुनेति। सभ्यग्दर्शनं प्रारब्धकर्मव्यतिरिक्तानां सर्वकर्मणां निर्बीजत्वकारणमित्यभिप्रायः। प्रारब्धकर्मणां प्रवृत्तफलानां भोगेनैव क्षयात्। तस्माद्यन्यप्रवृत्तफलान्यतीतानेकजन्मार्जितानि ज्ञानोत्पत्तेः पूर्वमस्मिन्जन्मनि कृतानि ज्ञानाग्निसाधनानुष्ठानकालिकानि च सर्वाणि भस्मसात्कुरुते। ज्ञानोत्तरभाविनामसंबन्धोऽपि बोध्यः। तथाच भगवतो बादरायणस्य सूत्राणितदिघिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्य्वपदेशात् इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तुअनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेःभोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते इति फलार्थत्वात्कर्मणः फलमदत्त्वा क्षयासंभवात्। ब्रह्माधिगमे सति तद्विपरीतफलं दुरितं न क्षीयत इति प्राप्ते राद्धान्तः। तदधिगमे ब्रह्मसाक्षात्कारे सति उत्तरस्याघस्य दुरितस्याश्लेषोऽसंबन्धः पूर्वस्य विनाशः। कस्मात्तद्य्वपदेशात् तयोरश्लेषविनाशयोः श्रुतिभिर्व्यपदेशात्। तथाच श्रुतयःतद्यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्मं न श्लिष्यतेतद्यथैषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयत एवँहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्तेभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति धर्मस्य पुनः शास्त्रीयत्वाच्छास्त्रीयेण ज्ञानेनाविरोध इत्याशङ्क्याह। इतरस्यापि पुण्यस्य कर्मणः एवमघवदसंश्लेषविनाशौ भवतः। कुतस्तस्यापि स्वफलहेतुत्वेन ज्ञानप्रतिबन्धित्वप्रसङ्गात्।उभे इहैवैष एते तरति इत्यादिश्रुतिषु च दुष्कृतवत्सु कृतस्यापि विनाशव्यपदेशात्। अकर्त्रात्मत्वबोधनिमित्तस्य च कर्मक्षयस्य सुकृतदुष्कृतयोस्तुल्यत्वात्।क्षीयन्ते चास्य कर्माणी ति चाविशेषश्रुतेः। यत्रापि केवल एव पाप्मशब्दः पठ्यते तत्रापि तेनैव पुण्यमप्याकलितमिति द्रष्टव्यम्। ज्ञानापेक्षया निकृष्टफलत्वात्। तुशब्द एवकारार्थः। एवं पुण्यपापयोर्बन्धहेत्वोर्विद्यासामर्थ्यादश्लेषविनाशसिद्य्धा विदुषो देहपाते मुक्तिरवश्यमेव भवतीत्यर्थः। तत्र उभे इहैव एष एते तरतीत्यादिश्रुतिविशेषश्रवणात् अविशेषेणारब्धकार्ययोरनारब्धकार्ययोश्च क्षय इति प्राप्ते प्रत्याह। अनारब्धकार्ये अप्रवृत्तफले एव तु पूर्वे जन्मान्तरसंचिते अस्मिन्नपि च जन्मनि प्राक् ज्ञानोत्पत्तेः संचिते पुण्यपापे तदधिगमात्क्षीयेते नत्वारब्धकार्ये याभ्यामेतह्ब्रह्मज्ञानायतनं जन्म निर्मितम् कुतस्तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति शरीरपातावधिकरणात्क्षेमप्राप्तेः। ननु वस्तु बलेनाकर्त्रात्मावगत्या प्रारब्धकर्माण्यपि कुतो न क्षीयन्ते। अग्निसंबन्धे बीजशक्तिरिवेति चेदुच्यते। न तावदनाश्रित्यारब्धकार्य कर्माशयं तत्त्वावगत्युत्पत्तिरुपपद्यते। आश्रिते च तस्मिन्कुलालचक्रवत्प्रवृत्तवेगस्यान्तराले प्रतिबन्धासंभवात् भवतिवेगक्षयपरिपालनं अकर्त्रात्मावगत्याबाधितमपि मिथ्याज्ञानं कर्माधिष्ठानं जले वृक्षज्ञानवत्संस्कारवशात्कंचित्कालमनुवर्तत एव। अनारब्धकार्ययोः पुण्यपापयोः विद्यासामर्थ्यात्क्षय उक्तः इतरे त्वारब्धकार्ये ते उपभोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म संपद्यते। तस्य तावदेवेत्यादि ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येतीति चैवमादिश्रुतिभ्य इति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
ननु समुद्रवत्तरणे कर्मणां नाशो न स्यादित्याशङ्क्य दृष्टान्तान्तरमाह यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः प्रज्वलितोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते भस्मीभावं नयति हे अर्जुन ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि पापानि पुण्यानि चाविशेषेण प्रारब्धफलभिन्नानि भस्मसात्कुरुते तथा तत्कारणाज्ञानविनाशेन विनाशयतीत्यर्थः। तथाच श्रुतिःभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इतितदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात्इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु इति च सूत्रे। अनारब्धे पुण्यपापे नश्यत एवेत्यत्र सूत्रंअनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः इति। ज्ञानोत्पादकदेहारम्भकाणां तु तद्देहान्तएव विनाशःतस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति श्रुतेःभोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते इति सूत्राच्च। आधिकारिकाणां तु यान्येव ज्ञानोत्पादकदेहारम्भकाणि तान्येव देहान्तरारम्भकाण्यपि। यथा वसिष्ठापान्तरतमःप्रभृतीनाम। तथाच सूत्रम्यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् इति।अधिकारोऽनेकदेहारम्भकं बलवत्प्रारब्धफलं कर्म। तच्चोपासकानामेव नान्येषाम्। अनारब्धफलानि नश्यन्ति आरब्धफलानि तु यावद्भोगसमाप्ति तिष्ठन्ति। भोगश्चैकेन देहेनानेकेन वेति न विशेषः। विस्तरस्त्वाकरे द्रष्टव्यः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
यथेति। एधांसि काष्ठानि। कर्माणि प्रारब्धादन्यानि।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
पापस्यार्णवत्वोक्त्या ज्ञानस्य प्लवत्वोक्त्या च तस्यानल्पत्वादगाधत्वादस्याल्पत्वात्तन्मध्यपातित्वात् कदाचिन्मज्जनसम्भावनापि स्यादित्यल्पस्वरूपस्य महद्वस्तुनिराकारणसामर्थ्ये दृष्टान्तमाह यथैधांसीति। हे अर्जुन यथा अग्निः काष्ठेभ्यः स्वल्पतरोऽपि समिद्धः सन् सम्यक्प्रकारेण सन्धुक्षितः सन् एधांसि काष्ठानि भस्मसात्कुरुते तथा ज्ञानाग्निः ज्ञानरूपोऽग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते भस्मरूपाण्यग्रेऽस्य फलभोगजननासमर्थानि कुरुते।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
सम्यक् प्रवृद्ध अग्निः इन्धनसमुच्चयम् इव आत्मयाथात्म्यज्ञानरूपः अग्निः जीवात्मगतम् अनादिकालप्रवृत्तानेककर्मसञ्चयं भस्मीकरोति।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः सम्यक् इद्धः दीप्तः अग्निः भस्मसात् भस्मीभावं कुरुते हे अर्जुन ज्ञानमेव अग्निः ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा निर्बीजीकरोतीत्यर्थः। न हि साक्षादेव ज्ञानाग्निः कर्माणि इन्धनवत् भस्मीकर्तुं शक्नोति। तस्मात् सम्यग्दर्शनं सर्वकर्मणां निर्बीजत्वे कारणम् इत्यभिप्रायः। सामर्थ्यात् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वात् उपभोगेनैव क्षीयते। अतो यानि अप्रवृत्तफलानि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् कृतानि ज्ञानसहभावीनि च अतीतानेकजन्मकृतानि च तान्येव सर्वाणि भस्मसात् कुरुते।।यतः एवम् अतः
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
समुद्रवत्स्थितस्यैव पापस्यातिलङ्घनमात्रं नतु पापस्य नाश इति भ्रान्तिं दृष्टान्तेन वारयन्नाह यथेति। एधांसि काष्ठानि प्रदीप्तोऽग्निर्यथा भस्मीभावं नयति तथा आत्मज्ञानरूपोऽग्निः प्रारब्धकर्मव्यतिरिक्तानि सर्वाणि कर्माणि भस्मीकरोतीत्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
ननु महतो वृजिनतो ज्ञानस्य निर्बलत्वप्लवत्वेनात्यल्पत्वादित्याशङ्क्य ज्ञानस्य प्रबलत्वमग्निदृष्टान्तद्वारा निरूपयति यथेति। समिद्धोऽग्निर्ज्ञानं च प्रबलं भवति। सर्वकर्माणि स्वोत्पत्तिकाले सम्भूतानि लघूनि गुरूणि च। प्रारब्धकर्मणां तु स्वोत्पत्तिकालसम्भूतत्वाभावान्न दाहः अन्यथा ज्ञानं न स्यात्।अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वं तदवधेः ब्र.सू.4।1।15 इति तत्त्वसूत्रात्।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
नन्वेकस्य कथमनादिकालप्रवृत्तानन्तपापनिवर्तकत्वम्नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ब्र.वै.26।70 इत्यादिवचनाच्च पापस्वरूपनिवर्तकत्वमनुपपन्नम् केवलं विलम्बाय स्यादित्याशङ्क्योच्यते यथैधांसीति। समुद्रसन्तरणदृष्टान्तः पुनःप्रवेशाविरोधी काष्ठभस्मसात्करणदृष्टान्तेन तु पुनः कार्यकरत्वप्रसङ्गोऽपि प्रतिषिद्धः। भस्मसात्कुरुते भस्मीभूतानि कुरुते अकार्यकराणि कुरुत इत्यर्थः।समिद्धः इत्यत्र सर्वदहनयोग्यत्वायोपसर्गधात्वर्थयोर्व्यञ्जनंसम्यक्प्रवृद्ध इति।एधांसि इति बहुवचनमेकस्यानेकनिवर्तकत्वाभिप्रायमिति दर्शयति इन्धनसञ्चयमिति।सर्वकर्माणि इतिवचनाद्विरोधित्वेन स्थितस्य सांसारिकपुण्यविशेषस्यापि निवर्तकत्वमवगतम्। नाभुक्तमित्यादित्वन्यपरम् अन्यथा प्रायश्चित्तशास्त्राण्यपि कुप्येयुरिति भावः।