श्लोक · Shlok 13
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी | नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī. navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan.
Translation · अर्थ
English
Mentally renouncing all actions and self-controlled, the embodied one rests happily in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
The embodied soul lives in the city of nine gates. The activities of the body, or the figurative city of body, are conducted automatically by its particular modes of nature. The soul, although subjecting himself to the conditions of the body, can be beyond those conditions, if he so desires. Owing only to forgetfulness of his superior nature, he identifies with the material body, and therefore suffers. By Kṛṣṇa consciousness, he can revive his real position and thus come out of his embodiment. Therefore, when one takes to Kṛṣṇa consciousness, one at once becomes completely aloof from bodily activities. In such a controlled life, in which his deliberations are changed, he lives happily within the city of nine gates. The nine gates are mentioned as follows: nava-dvāre pure dehī haṁso lelāyate bahiḥ vaśī sarvasya lokasya sthāvarasya carasya ca “The Supreme Personality of Godhead, who is living within the body of a living entity, is the controller of all living entities all over the universe. The body consists of nine gates [two eyes, two nostrils, two ears, one mouth, the anus and the genitals]. The living entity in his conditioned stage identifies himself with the body, but when he identifies himself with the Lord within himself, he becomes just as free as the Lord, even while in the body.” ( Śvetāśvatara Upaniṣad 3.18) Therefore, a Kṛṣṇa conscious person is free from both the outer and inner activities of the material body.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
सर्वकर्माणि all actions? मनसा by the mind? संन्यस्य having renounced? आस्ते rests? सुखम् happily? वशी the selfcontrolled? नवद्वारे in the ninegated? पुरे in the city? देही the embodied? न not? एव even? कुर्वन् acting? न not? कारयन् causing to act.Commentary All actions -- (1) Nitya Karmas These are obligatory duties. Their performance does not produce any merit but their nonperformance produces demerit. Sandhyavandana? etc.? belong to this category.(2) Naimittika Karmas These Karmas are performed on the occurrence of some special events such as the birth of a son? eclipse? etc.(3) Kamya Karmas These are optional. They are intended for the attainment of some special ends (for getting rain? son? etc.)(4) Nishiddha Karmas These are forbidden actions such as theft? drinking liour? etc.(5) Prayaschitta Karmas Actions performed to neutralise the effects of evil actions or sins.The man who has controlled the senses renounces all actions by discrimination? by seeing inaction in action and rests happily in this body of nine openings (the ninegated city)? because he is free from cares? worries? anxieties and fear and his mind is ite calm and he enjoys the supreme peace of the Eternal. In this ninegated city the Self is the king. The senses? the mind? the subconscious mind? and the intellect are the inhabitants or subjects.The ignorant wordly man says? I am resting in the easychair. The man of wisdom who has realised that the Self is distinct from the body which is a product of the five elements? says? I am resting in this body. (Cf.XVIII.17?50)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
जगत् से पलायन करना संन्यास नहीं है। मिथ्या धारणाओं एवं अविवेकपूर्ण आसक्तियों का त्याग ही वास्तविक संन्यास है। जिस पुरुष की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ एवं मन की प्रवृत्तियाँ स्वयं के वश में हैं और जिसके कर्म अहंकार और स्वार्थ से रहित होते हैं उसे ही अनिर्वचनीय आनन्द परम संतोष प्राप्त होता है। तब वह सुखपूर्वक शरीर रूपी नवद्वार नगरी में निवास करता है।नवद्वारयुक्त नगरी का रूपक उपनिषदों में प्रसिद्ध है। शरीर को उस नगरी के समान माना गया है जो प्राचीन काल में किलों की प्राचीर के अन्दर बसायी गयी होता थी। इस शरीर रूपी नगरी के नवद्वार हैं दो आँखें दो नासिका छिद्र दो कान मुँह जननेन्द्रिय तथा गुदेन्द्रिय। इस शरीर में जीवन व्यापार सुचारु रूप से चलने के लिए इनमें से समस्त अथवा अधिकांश द्वारों का होना आवश्यक है। जैसे एक राजा किले में रहकर अपने मंत्रियों द्वारा शासन करता है तब उसकी परिस्थिति मात्र से अधिकारीगण प्रेरणाशक्ति और अनुमति प्राप्त कर अपनाअपना कार्य करते है इसी प्रकार चैतन्य आत्मा स्वयं अकर्ता रहते हुये भी उसके केवल सान्निध्य से समस्त ज्ञानेन्द्रयाँ एवं कर्मेन्द्रियां स्वव्यापार मे व्यस्त रहती हैं।इस प्रसिद्ध रूपक का प्रयोग करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संयमी एवं तत्त्वदर्शी पुरुष शरीर में सुख से रहते हुए उपाधियों के कार्य देखता रहता है परन्तु स्वयं न कर्म करता है और न उपाधियों से करवाता है।और
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--'वशी देही'--इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-आसक्ति होनेसे ही ये मनुष्यपर अपना अधिकार जमाते हैं। ममता-आसक्ति न रहनेपर ये स्वतः अपने वशमें रहते हैं। सांख्ययोगीकी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिमें ममता-आसक्ति न रहनेसे ये सर्वथा उसके वशमें रहते हैं। इसलिये यहाँ उसे 'वशी' कहा गया है। जबतक किसी भी मनुष्यका प्रकृतिके कार्य (शरीर, इन्द्रियों आदि) के साथ किञ्चिन्मात्र भी कोई प्रयोजन रहता है, तबतक वह प्रकृतिके 'अवश' अर्थात् वशीभूत रहता है--'कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः' (गीता 3। 5)। प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है। अतः प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहनेके कारण मनुष्य कर्मरहित हो ही नहीं सकता। परन्तु प्रकृतिके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और कारण--तीनों शरीरोंसे ममता-आसक्तिपूर्वक कोई सम्बन्ध न होनेसे सांख्ययोगी उनकी क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता। यद्यपि सांख्ययोगीका शरीरके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं होता, तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह शरीरधारी ही दीखता है। इसलिये उसे 'देही'कहा गया है।'नवद्वारे पुरे'--शब्दादि विषयोंका सेवन करनेके लिये दो कान, दो नेत्र, दो नासिकाछिद्र तथा एक मुख--ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं, और मल-मूत्रका त्याग करनेके लिये गुदा और उपस्थ--ये दो द्वार शरीरके निचले भागमें हैं। इन नौ द्वारोंवाले शरीरको 'पुर' अर्थात् नगर कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे नगर और उसमें रहनेवाला मनुष्य--दोनों अलग-अलग होते हैं, ऐसे ही यह शरीर और इसमें रहनेका भाव रखनेवाला जीवात्मा--दोनों अलग--अलग हैं। जैसे नगरमें रहनेवाला मनुष्य नगरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता, ऐसे ही सांख्ययोगी शरीरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता।'सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य'--इसी अध्यायके आठवें-नवें श्लोकोंमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और प्राणोंके द्वारा होनेवाली जिन तेरह क्रियाओँका वर्णन हुआ है, उन सब क्रियाओंका बोधक यहाँ 'सर्वकर्माणि' पद है। यहाँ 'मनसा संन्यस्य' पदोंका अभिप्राय है--विवेकपूर्वक मनसे त्याग करना। यदि इन पदोंका अर्थ केवल मनसे त्याग करना माना जाय तो दोष आता है; क्योंकि मनसे त्याग करना भी मनकी एक क्रिया है और गीता मनसे होनेवाली क्रियाको कर्म मानती है--'शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः' (18। 15)। शरीरसे होनेवाली क्रियाओंके कर्तापनका मनसे त्याग करनेपर भी मनकी (त्यागरूप) क्रियाका कर्तापन तो रह ही गया! अतः 'मनसा संन्यस्य' पदोंका तात्पर्य है--विवेकपूर्वक मनसे क्रियाओंके कर्तापनका त्याग करना अर्थात् कर्तापनसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करना। जहाँसे कर्तापनका सम्बन्ध माना है, वहींसे उस सम्बन्धका त्याग करना है। सांख्ययोगी अपनेमें कर्तापन न मानकर उसे शरीरमें ही छोड़ देता है अर्थात् कर्तापन शरीरमें ही है, अपनेमें कभी नहीं।'नैव कुर्वन्न कारयन्'--सांख्ययोगीमें कर्तृत्व और कारयितृत्व दोनों ही नहीं होते अर्थात् वह करनेवाला भी नहीं होता और करवानेवाला भी नहीं होता।शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे किञ्चिन्मात्र भी अहंताममताका सम्बन्ध न होनेके कारण सांख्ययोगीउनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको कैसे मान सकता है? अर्थात् कभी नहीं मान सकता। इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें भी 'नैव किञ्चित् करोमि' पदोंसे यही बात कही गयी है। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने 'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति' पदोंसे कहा है कि शरीरमें रहते हुए भी यह अविनाशी आत्मा कुछ नहीं करता।यहाँ शङ्का होती है कि जीवात्मा स्वयं कोई कर्म नहीं करता; किन्तु वह प्रेरक बनकर कर्म तो करवा सकता है? इसका समाधान यह है कि जैसे सूर्यभगवान्का उदय होनेपर सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा जाता है, लोग अपने-अपने कामोंमें लग जाते हैं, कोई खेती करता है, कोई वेदपाठ करता है, कोई व्यापार करता है आदि। परन्तु सूर्य-भगवान् विहित या निषिद्ध किसी भी क्रियाके प्रेरक नहीं होते। उनसे सबको प्रकाश मिलता है, पर उस प्रकाशका कोई सदुपयोग करे या दुरुपयोग, इसमें सूर्यभगवान्की कोई प्रेरणा नहीं है। यदि उनकी प्रेरणा होती तो पाप या पुण्य-कर्मोंका भागी भी उन्हींको होना पड़ता। ऐसे ही चेतनतत्त्वसे प्रकृतिको सत्ता और शक्ति तो प्राप्त होती है, पर वह किसी क्रियाका प्रेरक नहीं होता। यही बात भगवान्ने यहाँ 'न कारयन्' पदोंसे कही है।'आस्ते सुखम्'--मनुष्यमात्रकी स्वरूपमें स्वाभाविक स्थिति है; परन्तु वे अपनी स्थिति शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिमें मान लेते हैं जिससे उन्हें इस स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। परन्तु सांख्ययोगीको निरन्तर स्वरूपमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होता रहता है। स्वरूप सदा-सर्वदा सुख-स्वरूप है। वह सुख अखण्ड, एकरस और परिच्छिन्नतासे रहित है।एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें जैसी स्थिति होती है, स्वरूपमें वैसी स्थिति नहीं होती। कारण कि स्वरूप ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता है। उस स्वरूपमें मनुष्यकी स्थिति स्वतः-स्वाभाविक है; अतः उसमें स्थित होनेमें कोई श्रम, उद्योग नहीं है। स्वरूपको पहचाननेपर एक स्वरूप-ही-स्वरूप रह जाता है। पहचानमात्रको समझानेके लिये ही यहाँ 'आस्ते' पदका प्रयोग हुआ है। इसे ही चौदहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें 'स्वस्थः' पदसे कहा गया है।यहाँ 'आस्ते' क्रिया जिस तत्त्वकी सत्ताको प्रकट कर रही है, वह सब आधारोंका आधार है। समस्त उत्पन्न तत्त्व उस अनुत्पन्न तत्त्वके आश्रित हैं। उस सर्वाधिष्ठानरूप तत्त्वको किसी आधारकी आवश्यकता ही क्या है? उस स्वतःसिद्ध तत्त्वमें स्वाभाविक स्थितिको ही यहाँ 'आस्ते' पदसे कहा गया है। इसे ही आगे बीसवें श्लोकमें 'ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः' पदोंसे कहा गया है। सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें कहा गया कि सांख्ययोगी न तो कर्म करता है और न करवाता ही है; किन्तु भगवान् तो कर्म करवाते होंगे? इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
सर्वेति। यथा वेश्मान्तर्गतस्य पुंसो न गृहगतैर्जीर्णत्वादिभिः योगः एवं मम चक्षुरादिच्छिद्रगवाक्षनवकालंकृतदेहगेहगतस्य न तद्धर्मयोगः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
तर्हि फले सक्तिं त्यक्त्वा सर्वैरपि कर्तव्यमिति कर्मसंन्यासस्य निरवकाशत्वमित्याशङ्क्याऽविदुषः सकाशाद्विदुषो विशेषं दर्शयति यस्त्विति। सर्वकर्मपरित्यागे प्राप्तं मरणं व्यावर्तयति आस्त इति। वृत्तिं लभमानोऽपि शरीरतापेनाध्यात्मिकादिना तप्यमानस्तिष्ठतीति चेन्नेत्याह सुखमिति। कार्यकरणसंघातपारवश्यं पर्युदस्यति वशीति। आसनस्यापेक्षितमधिकरणं निर्दिशति नवेति। देहसंबन्धाभिमानाभासवत्त्वमाह देहीति। मनसा सर्वकर्मसंन्यासेऽपि लोकसंग्रहार्थं बहिः सर्वं कर्म कर्तव्यमिति प्राप्तं प्रत्याह नैवेति। तान्येव सर्वाणि कर्माणि परित्याज्यानि विशिनष्टि नित्यमिति। तेषां परित्यागे हेतुमाह तानीति। यदुक्तं सुखमास्त इति तदुपपादयति त्यक्तेति। जितेन्द्रियत्वं कायवशीकारस्याप्युपलक्षणम् द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके वागेकेति सप्त शीर्षण्यानि शिरोगतानि शब्दाद्युपलब्धिद्वाराणि। अथापि कथं नवद्वारत्वमधोगताभ्यां पायूपस्थाभ्यां सहेत्याह अर्वागिति। शरीरस्य पुरसाम्यं स्वामिना पौरैश्चाधिष्ठितत्वेन दर्शयति आमेत्यादिना। यद्यपि देहे जीवनत्वाद्देहसंबन्धाभिमानाभासवानवतिष्ठते तथापि प्रवासीव परगेहे तत्पूजापरिभवादिभिरप्रहृष्यन्नविषीदन्व्यामोहादिरहितश्च तिष्ठतीति मत्वाह तस्मिन्निति। विशेषणमाक्षिपति किमिति। तदनुपपत्तिमेव दर्शयति सर्वो हीति। सर्वसाधारणे देहावस्थाने संन्यस्य देहे तिष्ठति विद्वानिति विशेषणमकिंचित्करमिति फलितमाह तत्रेति। विशेषणफलं दर्शयन्नुत्तरमाह उच्यत इति। किमविवेकिनं प्रति विशेषणानर्थक्यं चोद्यते किं वा विवेकिनं प्रतीति विकल्प्याद्यमङ्गीकरोति यस्त्विति। अज्ञत्वं देहित्वेहेतुः। तदेव देहित्वं स्फुटयति देहेति। संघातात्मदर्शिनोऽपि देहे स्थितिप्रतिभासः स्यादिति चेन्नेत्याह नहीति। द्वितीयं दूषयति देहादीति। गृहादिषु देहस्यावस्थानेनात्मावस्थानभ्रमव्यावृत्त्यर्थं देहे विद्वानास्त इति विशेषणमुपपद्यते विवेकवतो देहेऽवस्थानप्रतिभाससंभवादित्यर्थः। ननु विवेकिनो देहावस्थानप्रतिभानेऽपि वाङ्मनोदेहव्यापारात्मनां कर्मणां तस्मिन्प्रसङ्गाभावात्तत्त्यागेन कुतस्तस्य देहेऽवस्थानमुच्यते तत्राह परकर्मणां चेति। ननु विवेकिनो दिगाद्यनवच्छिन्नबाह्याभ्यन्तराविक्रियब्रह्मात्मतां मन्यमानस्य कुतो देहेऽवस्थानमास्थातुं शक्यते तत्राह उत्पन्नेति। तत्र हेतुमाह प्रारब्धेति। यदि प्रारब्धफलं धर्माधर्मात्मकं कर्म तस्योपभुक्तस्य शेषादनुपभुक्ताद्देहादिसंस्कारोऽनुवर्तते तदनुवृत्त्या च तत्रैव देहे विशेषविज्ञानमवस्थानविषयमुपपद्यतेऽतो विवेकवतः संन्यासिनो देहेऽवस्थानव्यपदेशः संभवतीत्यर्थः। अविद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणासंभवेऽपि विद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणमर्थवदित्युपसंहरति देह एवेति। देहे स्वावस्थानविषयो विद्वत्प्रत्ययस्तदविषयश्चाविद्वत्प्रत्ययस्तयोरेवं भेदे विद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणमर्थवदित्युपसंहरन्नेव हेतुं विशदयति विद्वदिति। आरोपितकर्तृत्वाद्यभावेऽपि स्वगतकर्तृत्वादि दुर्वारमित्याशङ्कामनूद्य दूषयति यद्यपीत्यादिना। क्रियासु प्रवर्तयन्नास्त इति पूर्वेण संबन्धः। पूर्वस्यापि शतुरेवमेव संबन्धः। कर्तृत्वं कारयितृत्वं चात्मनो नेत्यत्र विचारयति किमिति। यत्कर्तृत्वं कारयितृत्वं च तत्किं देहिनः स्वात्मसमवायि सदेव संन्यासान्न भवतीत्युच्यते यथा गच्छतो देवदत्तस्य स्वगतैव गतिस्तत्स्थित्या त्यागान्न भवत्यथ वा स्वारस्येन कर्तृत्वं कारयितृत्वं चात्मनो नास्तीति वक्तव्यमाद्ये सक्रियत्वं द्वितीये कूटस्थत्वमित्यर्थः। द्वितीयं पक्षमाश्रित्योत्तरमाह अत्रेति। उक्तेऽर्थे वाक्योपक्रममनुकूलयति उक्तं हीति। तत्रैव वाक्यशेषमपि संवादयति शरीरस्थोऽपीति। स्मृत्युक्तेऽर्थे श्रुतिमपि दर्शयति ध्यायतीवेति। उपाधिगतैव सर्वा विक्रिया नात्मनि स्वतोऽस्तीत्यर्थः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवमशुद्धचित्तस्याविदुषः संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यत इत्युपपादितम्। शुद्धचित्तः परमार्थदर्शी कथमास्त इत्यपेक्षायामाह सर्वेति। सर्वाणि नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं चेति तानि कर्माणि मनसा विवेकबुद्य्धा कर्मादावकर्मदर्शनेन संत्यज्य सुखमास्ते दुःखहेतुसर्वव्यापारोपरभात्। यतः वशी जितेन्द्रियः। क्व आस्त इत्यत आह। नवद्वारे पुरे। द्वे श्रोत्रे नेत्रे नासिके मुखं चेति सप्त शिरसि अवाक् द्वे मूत्रपुरीषविसर्गार्थे। एवं नवद्वारयुक्ते पुरे नगरस्थानीये आत्मेकस्वामिके इन्द्रियाणि परिचारकाः बुद्धिरमात्योऽहंकारो युवराजो मनःशिल्पीत्येवंरुपैरिन्द्रियादिभिः पौरेरधिष्ठिते आस्ते। यतो देही देहाद्य्वतिरिक्तात्मदर्शी। यस्त्वज्ञः सतु देहात्मदर्शी गेहादावास्तेऽतो युक्तं विशेषणम्। यद्यप्येवं तथाप्यात्मसमवायित्वेन कर्तृत्वकारयितृत्वे तस्य स्यातामित्यत आह। नैव कुर्वन्स्वयं न च कारयन् कार्यकरणानि क्रियासु प्रवर्तयन्नास्त इति संबन्धः। यत्तु वशी विवेकवैराग्यसंपन्नो नवद्वारे पुरे मानुषे शरीरे सुखमास्त इति संबन्धः। यद्यपि नवद्वारं श्वमार्जारादिशरीरमपि भवति तथापि वशिशब्दसंयोगान्मानुषमिति लभ्यते। सुखमिति क्रियाविशेषणम्। अनेनान्तःकरणस्य हर्षशोकादयः परिणामा निराकृताः। वशीत्यत्र वैराग्योक्त्या रागाद्यपरपर्यायकामतदवस्थाविशेषक्रोधरूपावन्तःकरणपरिणामौ वारितौ। विवेकोक्त्या चाहंकारतन्निबन्धनममकाराध्यासौ चिन्तनात्मकचित्तपरिणामं च निराकृत्य विशुद्धचिदाकारतया बुद्धेरवस्थानमुक्तम्। ततश्च विशुद्धचिदाकारबुद्धिपरिणाम एव निष्कृष्टो वशिशब्देनोक्तः। किं कृत्वेत्यत आह। मनसा सह सर्वकर्माणि संन्यस्य त्यागेन ज्ञानमप्युपलक्ष्यते। ततश्च संन्यस्यात्मानं ज्ञात्वा सुखमास्त इति ज्ञेयम्। वशिनं विशिनष्टि अदेहीति। देहो लिङ्गशरीरं तद्रहितः। अयमाशयः षोडशकलात्मा हि पुरुषः। तत्र भूतेन्द्रियप्राणाः प्रवर्त्याः। प्रवर्तकमन्तःकरणम्। तच्च बुद्धिसंकल्पकतया। सर्वो हि बुद्य्धा निश्चित्य मनसा संकल्प्य प्रवर्तते। तत्र मनस्त्यागेन विज्ञानकर्मत्यागः संभवतीति क्वेदानीं लिङ्गदेहः। नहि शिरसि च्छिन्ने कबन्धो देहतां प्रतिपद्यते इति मनसेत्युक्तम्। बुद्धिस्तु सर्वाकारपरित्यागेन चिन्मात्र उपसंक्रान्ताहंकारदीनां तु कथापि विवेकेनोमन्मूलितेतीतरे व्याचख्युः। तत्रेदं वक्तव्यम् वशिशब्दयोगं विनापि सर्वकर्माणीत्यादेर्योगात् प्रकरणाच्च मानुषशरीरमेवोपलभ्यते। सर्वकर्माणि संन्यस्येत्यनेन निषिद्धादिमननरुपमानसकर्मत्यागे मनस्त्यागसिद्य्धा त्यागकरणस्यापेक्षितत्वेन च सहशब्दध्याहृत्य पृथङ्यनस्त्यागवर्तनमसंगतम्। किंच विवेकयुक्तमेव मनस्त्यागोऽतो विवेकयुक्तेन मनसा सर्वकर्माणि संन्यस्येत्येव युक्तम्। एतेन वशिशब्देन विवेकवैराग्ययुक्तत्ववर्णनं प्रत्युक्तम्। वशिशब्दस्य स्वतन्त्रवाचि त्वेन जितेन्द्रियत्वप्रतीत्या इतरोक्तार्थस्यार्थिकार्थत्वात्। यदप्यदेही लिङ्गशरीररहित इति तदपि न। भेदबोधकेनिप्रत्येन देहादितरात्मदर्शीति वर्णनस्यैव नवद्वारे पुरे आस्ते इत्यस्य योगेन स्वारसिकत्वेन प्रश्लेषेण क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वात्। इमामेवारुचिं मनसि निधाय पक्षान्तरस्यैतद्य्वाख्यानकर्तृभिर्दर्शितत्वाच्चेति दिक्। यदप्यन्ते वशी जितचित्तः। समाधिस्थो योगी नवद्वारे नवैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि षष्ठः प्राणस्तेनैव तत्प्रवर्त्यानां कर्मेन्द्रियाणां संग्रहः। बुद्य्धहंकारचित्तानीति नवैतानि द्वाराणीव पुरपतेर्जीवस्य भोगार्थं विषयप्रवेशस्थानानि यस्मिन्नवद्वारे पुरे शरीराख्ये विचित्रवासनाकल्पितानन्तविषयवति अनेकैः कर्मसचिवैरधिष्ठिते सुखदुःखादिनानापण्यवति मनसा सर्वद्वारेद्धाटनकुञ्चिकया सह सर्वाणि कर्माणि पुरपतिरिव राज्यकार्याणि संन्यस्य सुखं निर्विकल्पसंविन्मात्ररुपेणास्ते इति तदपि असङ्गतमेव। चित्तस्य वृत्तिनिरोधरुपजयापेक्षया वस्त्रादित्यागवदितरत्यागाप्रसिद्य्धा मनसा सहेति सहशब्दाध्याहारेण वर्णनस्य पुनरुक्तिग्रस्तत्वात्। मृतशरीरस्य पुरस्य सत्त्वेऽपि परोक्तद्वाराणामभावेन नवद्वाराणि यस्मिन्नित्युक्तेरनुचितत्वात्। निर्विकल्पसमाधिस्थस्य भोगप्राप्तिद्वाराणां लयादहं देहाद्भिन्न इत्येतावन्मात्रभानस्याप्यभावात्। नवद्वारे पुरे आस्ते इत्यस्य वैयर्थ्यापत्तेश्चेतिदिक्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
सर्वकर्माणि इत्यस्य स्वरूपेण कर्मत्यागोऽर्थ इति प्रतीतिनिवारणाय प्रतिपाद्यमाह पुनरिति। प्राक्कर्तृत्वाभिमानत्याग उक्तः इदानीं तु कारयितृत्वाभिमानत्यागोऽपीति स्पष्टनम्। स्वरूपेण कर्मत्याग एवोच्यत इत्येतन्निराचष्टे मनसेति। अन्यथा तद्व्यर्थं स्यादिति भावः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
पुनः सन्न्यासशब्दार्थं स्पष्टयति सर्वकर्माणीति। मनसेति विशेषणादभिमानत्यागः।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
अशुद्धचित्तस्य केवलात्संन्यासात्कर्मयोगः श्रेयानिति पूर्वोक्तं प्रपञ्च्याधुना शुद्धचित्तस्य सर्वकर्मसंन्यास एव श्रेयानित्याह नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं चेति सर्वाणि कर्माणि मनसाकर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यत्रोक्तेनाकर्त्रात्मस्वरूपसम्यग्दर्शनेन संन्यस्य परित्यज्य प्रारब्धकर्मवशादास्ते तिष्ठत्येव। किं दुःखेन नेत्याह सुखमनायासेन आयासहेतुकायवाङ्मनोव्यापारशून्यत्वात्। कायवाङ्मनांसि स्वच्छन्दानि कुतो न व्याप्रियन्ते तत्राह वशी स्ववशीकृतकार्यकरणसंघातः। क्वास्ते। नवद्वारे पुरे। द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके वागेकेति शिरसि सप्त द्वे पायूपस्थाख्ये अध इति नवद्वारविशिष्टे देहे। देही देहभिन्नात्मदर्शी प्रवासीव परगेहेतत्पूजापरिभवादिभिरप्रहृष्यन्नविषीदन्नहंकारममकारशून्यस्तिष्ठति। अज्ञो हि देहतादात्म्याभिमानाद्देह एव नतु देही। सच देहाधिकरणमेवात्मनोऽधिकरणं मन्यमानो गृहे भूमावासने वाहमास इत्यभिमन्यते नतु देहेऽहमास इति भेददर्शनाभावात्। संघातव्यतिरिक्तात्मदर्शी तु सर्वकर्मसंन्यासी भेददर्शनाद्देहेऽहमास इति प्रतिपद्यते। अतएव देहादिव्यापाराणामविद्ययात्मन्यक्रिये समारोपितानां विद्यया बाधएव सर्वकर्मसंन्यास इत्युच्यते। एतस्मादेवाज्ञवैलक्षण्याद्युक्तं विशेषणं नवद्वारे पुर आस्त इति। ननु देहादिव्यापाराणामात्मन्यारोपितानां नौव्यापाराणां तीरस्थवृक्ष इव विद्यया बाधेऽपि स्वव्यापारेणात्मनः कर्तृत्वं देहादिव्यापारेषु कारयितृत्वं च स्यादिति नेत्याह नैव कुर्वन्न कारयन् आस्त इति संबन्धः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
एवमविद्वान्फलासक्त्यनासक्तिवशात्कर्मभिर्बध्यते न बध्यते चेत्युक्तम् विद्वांस्तु तद्विपरीत इत्याह सर्वकर्माणीति। वशी जितचित्तः समाधिस्थो योगी नवद्वारे नवैव पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि षष्ठः प्राणस्तेनैव तत्प्रवर्त्यानां कर्मेन्द्रियाणां संग्रहः। बुद्ध्यहंकारचित्तानीति नव। एतानि द्वाराणीव पुरपतेर्जीवस्य भोगार्थं विषयप्रवेशस्थानानि यस्मिन्नवद्वारे शरीराख्ये पुरे विचित्रवासनाकल्पितानन्तविषयवति अनेकैः कर्मसचिवैरधिष्ठिते सुखदुःखादिनानापण्यवति मनसा सर्वद्वारोद्धाटनकुञ्चिकया सह सर्वाणि कर्माणि पुरपतिरिव राजकार्याणि संन्यस्य सुखं निर्विकल्पसंविन्मात्ररूपेणास्ते। कर्माणि क्षेत्रस्यैव धर्मो नत्वात्मन इति क्षेत्रे त्यक्तुं शक्यान्येव। तथाच श्रुतिःशरीरे पाप्मनो हित्वा इति।यत्र सुहार्दः सुकृतो मदन्ते विहाय रोगं तन्वा्ँस्वायाम् इति च। देही सन् देहाभिमानकाले। व्युत्थानेऽपीत्यर्थः। तदापि नैव कुर्वन्नास्ते नापि कारयन्नास्ते राजेवामात्येषु निहितभारः। समाधौ क्षेत्रेण सहात्मनः संबन्धाभावदर्शनात्। यद्वा नवद्वाराणि चक्षुःश्रोत्रनासाबिलद्वन्द्वानि षट् सप्तमं मुखं अधस्तने द्वे इति। अस्मिन्पक्षे इन्द्रियाणि परिचारका बुद्धिरमात्योऽहंकारो युवराज इत्यादिकमूह्यम्। विदुषः कर्मसंबन्ध एव नास्ति दूरे तत्फलासक्त्यनासक्ती इति भावः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
एवं भगवद्भक्तो भगवदाज्ञया कर्म कुर्वन् सुखमाप्नोति अयुक्तस्तु फलाशया कर्म कुर्वन् बद्धो भवतीत्युक्तं तत्र अभक्तस्य सर्वकर्मत्याग एवोत्तम इत्यर्जुनमनस्याभासं प्राप्य त्यागेऽपि भक्तानामेव सुखं नेतरेषामित्याह सर्वकर्माणीति। वशी भगवद्वशे स्थितः सर्वकर्माणि सन्नयस्य त्यक्त्वा नवद्वारे पुरे श्रवणादिकरणसमर्थे देहे देही भगवदर्थं देहाभिमानवान् सुखमास्ते तिष्ठति। मनसा नैव कुर्वन् स्वार्थाहङ्काराभावान्न किञ्चित्कुर्वन्। न वा ममताभावादन्येभ्यः৷৷৷৷৷৷৷৷. परोपकार उपदेशादिना कारयन् सुखमास्त इति भावः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
आत्मनः प्राचीनकर्ममूलदेहसम्बन्धप्रयुक्तम् इदं कर्मणां कर्तृत्वं न स्वरूपप्रयुक्तम् इति विवेकविषयेण मनसा सर्वाणि कर्माणि नवद्वारे पुरे सन्यस्य वशी देही स्वयं देहाधिष्ठानप्रयत्नम् अकुर्वन् देहेन न एव कारयन् सुखम् आस्ते।साक्षाद् आत्मनः स्वाभाविकरूपम् आह
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
सर्वाणि कर्माणि सर्वकर्माणि संन्यस्य परित्यज्य नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं च तानि सर्वाणि कर्माणि मनसा विवेकबुद्ध्या कर्मादौ अकर्मसंदर्शनेन संत्यज्येत्यर्थः आस्ते तिष्ठति सुखम्। त्यक्तवाङ्मनःकायचेष्टः निरायासः प्रसन्नचित्तः आत्मनः अन्यत्र निवृत्तसर्वबाह्यप्रयोजनः इति सुखम् आस्ते इत्युच्यते। वशी जितेन्द्रिय इत्यर्थः। क्व कथम् आस्ते इति आह नवद्वारे पुरे। सप्त शीर्षण्यानि आत्मन उपलब्धिद्वाराणि अवाग् द्वे मूत्रपुरीषविसर्गार्थे तैः द्वारैः नवद्वारं पुरम् उच्यते शरीरम् पुरमिव पुरम् आत्मैकस्वामिकम् तदर्थप्रयोजनैश्च इन्द्रियमनोबुद्धिविषयैः अनेकफलविज्ञानस्य उत्पादकैः पौरैरिव अधिष्ठितम्। तस्मिन् नवद्वारे पुरे देही सर्वं कर्म संन्यस्य आस्ते किं विशेषणेन सर्वो हि देही संन्यासी असंन्यासी वा देहे एव आस्ते तत्र अनर्थकं विशेषणमिति। उच्यते यस्तु अज्ञः देही देहेन्द्रियसंघातमात्रात्मदर्शी स सर्वोऽपि गेहे भूमौ आसने वा आसे इति मन्यते। न हि देहमात्रात्मदर्शिनः गेहे इव देहे आसे इति प्रत्ययः संभवति। देहादिसंघातव्यतिरिक्तात्मदर्शिनस्तु देहे आसे इति प्रत्ययः उपपद्यते। परकर्मणां च परस्मिन् आत्मनि अविद्यया अध्यारोपितानां विद्यया विवेकज्ञानेन मनसा संन्यास उपपद्यते। उत्पन्नविवेकज्ञानस्य सर्वकर्मसंन्यासिनोऽपि गेहे इव देहे एव नवद्वारे पुरे आसनम् प्रारब्धफलकर्मसंस्कारशेषानुवृत्त्या देह एव विशेषविज्ञानोत्पत्तेः। देहे एव आस्ते इति अस्त्येव विशेषणफलम् विद्वदविद्वत्प्रत्ययभेदापेक्षत्वात्।।यद्यपि कार्यकरणकर्माणि अविद्यया आत्मनि अध्यारोपितानि संन्यस्यास्ते इत्युक्तम् तथापि आत्मसमवायि तु कर्तृत्वं कारयितृत्वं च स्यात् इति आशङ्क्य आह नैव कुर्वन् स्वयम् न च कार्यकरणानि कारयन् क्रियासु प्रवर्तयन्। किं यत् तत् कर्तृत्वं कारयितृत्वं च देहिनः स्वात्मसमवायि सत् संन्यासात् न संभवति यथा गच्छतो गतिः गमनव्यापारपरित्यागे न स्यात् तद्वत् किं वा स्वत एव आत्मनः न अस्ति इति अत्र उच्यते न अस्ति आत्मनः स्वतः कर्तृत्वं कारयितृत्वं च। उक्तं हि अविकार्योऽयमुच्यते (गीता 2.25) शरीरस्थोऽपि न करोति न लिप्यते (गीता 13.31) इति। ध्यायतीव लेलायतीव (बृ0 उ0 4.34) इति श्रुतेः।।किञ्च
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
एवं तावच्चित्तशुद्धिशून्यस्य संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यत इत्येतत्प्रपञ्चितम्। इदानीं शुद्धचित्तस्य संन्यासः श्रेष्ठ इत्याह सर्वकर्माणीति। वशी यतचित्तः। सर्वाणि कर्माणि विक्षेपकाणि मनसा विवेकयुक्तेन संन्यस्य सुखं यथा भवत्येवं ज्ञाननिष्ठः सन्नास्ते। क्वास्त इत्यत आह। नवद्वारे नेत्रे नासिके कर्णौ मुखं चेति सप्त शिरोगतानि अधोगते द्वे पायूपस्थरूपे इत्येवं नव द्वाराणि यस्मिंस्तस्मिन्पुरे पुरवदहंभावशून्ये देहे देही अवतिष्ठते। अहंकाराभावादेव स्वयं तेन देहेन नैव कुर्वन्ममकाराभावाच्च न कारयन्नित्यविशुद्धचित्ताद्ध्यावृत्तिरुक्ता। अविशुद्धचित्तो हि संन्यस्य पुनः करोति कारयति च। नत्वयं तथा। अतः सुखमास्त इत्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
अतो योगे मनसैव कर्मत्यागः बाह्यतः कर्म करणं चाभिप्रेतम् अन्यथा मिथ्याचार इति तत्त्वं स्पष्टयति सर्वकर्माणीति। योगे समभूतेन मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं यथा भवति तथा स्वयं नैव कुर्वन्मनसा त्यागात् इन्द्रियैरपि न कारयन्निति साङ्ख्याद्भेदोऽपि सूचितः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
नैव किञ्चित्करोमि इत्यादेःफले सक्तो निबध्यते 5।12 इत्यन्तस्य सङ्कलितार्थमुत्तरश्लोकसङ्गत्यर्थमाह अत इति। अनन्तरश्लोकार्थमाहअथेति। शरीराश्रितेन्द्रियप्राणेषु कर्तृत्वसन्न्यासाभिधानादनन्तरं तदाश्रये शरीर एव कर्तृत्वसन्न्यास उच्यत इति सङ्गतिः। शरीर कर्तृत्वसन्न्यासं प्रति करणतयोक्तस्य मनसः करणीभावानुगुणव्यापारं दर्शयितुंआत्मन इत्याद्युक्तम्। नहि देवादिदेहसम्बन्धमात्रकृतं पुण्यपापकर्तृत्वं तत्सम्बन्धमात्रस्याकर्मवश्येऽपि सद्भावात् अतःप्राचीनकर्ममूलेत्युक्तम्। मुख्यैः सप्तभिरर्वाक् द्वाभ्यां चात्र नवद्वारता पुरमेकादशद्वारम् कठो.2।5।1 इति श्रुतौ तु नाभिब्रह्मरन्ध्राभ्यां सहैकादशद्वारतोक्तिः।पुरे सन्न्यस्येति पुरस्य सन्न्यसनक्रियाधिकरणत्वेनान्वयः प्रकृतानुपयुक्त इति भावः।नवद्वारे पुरे इति निर्देशःसावयवत्वनिरवयवत्वसच्छिद्रत्वनिश्छिद्रत्वपृथुत्वाणुत्वस्वतन्त्रत्वपरतन्त्रत्वनियन्तृत्वनियन्तव्यत्वादिभिर्देहात्मनो विवेकस्य प्रदर्शनार्थः।स्वयमिति देहादिपारतन्त्र्यरहित इत्यर्थः यद्वा परिशुद्धेन स्वेन रूपेणेति भावः।वशी अभिमानबलात्काराद्यविषय इत्यर्थः। प्रयत्नाश्रयत्वशरीरस्पन्दनादिहेतुत्वयोरौपाधिकत्वात्नैव कुर्वन् इत्याद्युक्तम्।सुखमास्ते कर्तृत्वाभिमानप्रयुक्तक्लेशादिरहित आस्त इत्यर्थः। पुरमिव शरीरं पौरानिवेन्द्रियाणि सार्वभौममिव परमात्मानं भृत्यमिव स्वात्मानं पश्यतो भवति हि स्वास्थ्यम्। देहात्मभ्रमे हि पुरादिष्वासीनोऽहमिति मन्यते तन्निवृत्तौ च देह एव पुरस्थानीयो भवतीति भावः।