श्लोक · Shlok 27
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः | प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
sparśānkṛtvā bahirbāhyāṃścakṣuścaivāntare bhruvoḥ. prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau.
Translation · अर्थ
English
Shutting out (all) external contacts and fixing the gaze between the eyrow, ealising the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
Being engaged in Kṛṣṇa consciousness, one can immediately understand one’s spiritual identity, and then one can understand the Supreme Lord by means of devotional service. When one is well situated in devotional service, one comes to the transcendental position, qualified to feel the presence of the Lord in the sphere of one’s activity. This particular position is called liberation in the Supreme. After explaining the above principles of liberation in the Supreme, the Lord gives instruction to Arjuna as to how one can come to that position by the practice of the mysticism or yoga known as aṣṭāṅga-yoga, which is divisible into an eightfold procedure called yama, niyama, āsana, prāṇāyāma, pratyāhāra, dhāraṇā, dhyāna and samādhi. In the Sixth Chapter the subject of yoga is explicitly detailed, and at the end of the Fifth it is only preliminarily explained. One has to drive out the sense objects such as sound, touch, form, taste and smell by the pratyāhāra process in yoga, and then keep the vision of the eyes between the two eyebrows and concentrate on the tip of the nose with half-closed lids. There is no benefit in closing the eyes altogether, because then there is every chance of falling asleep. Nor is there benefit in opening the eyes completely, because then there is the hazard of being attracted by sense objects. The breathing movement is restrained within the nostrils by neutralizing the up-moving and down-moving air within the body. By practice of such yoga one is able to gain control over the senses, refrain from outward sense objects, and thus prepare oneself for liberation in the Supreme. This yoga process helps one become free from all kinds of fear and anger and thus feel the presence of the Supersoul in the transcendental situation. In other words, Kṛṣṇa consciousness is the easiest process of executing yoga principles. This will be thoroughly explained in the next chapter. A Kṛṣṇa conscious person, however, being always engaged in devotional service, does not risk losing his senses to some other engagement. This is a better way of controlling the senses than by aṣṭāṅga-yoga.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
स्पर्शान् contacts? कृत्वा बहिः shutting out? बाह्यान् external? चक्षुः eye (gaze)? च and? एव even? अन्तरे in the middle? भ्रुवोः of the (two) eyrows? प्राणापानौ the outgoing and incoming breaths? समौ eal? कृत्वा having made? नासाभ्यन्तरचारिणौ moving inside the nostrils.Commentary The verses 27 and 28 deal with the Yoga of meditation (Dhyana). External objects or contacts are the sound and the other senseobjects. If the mind does not think of the external objects they are shut out from the mind. The senses are the doors or avenues through which sound and the other senseobjects enter the mind.If you fix the gaze between the eyrows the eyalls remain fixed and steady. Rhythmical breathing is described here. You will have to make the breath rhythmical. The mind becomes steady when the breath becomes rhythmical. When the breath becomes rhythmical there is perfect harmony in the mind and the whole system. (Cf.VI.10?14VIII.10)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
No commentary.
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'--परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है--इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है। 'चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः'--यहाँ 'भ्रुवोः अन्तरे'पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13)--ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है, और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।'प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ'--नासिकासे बाहर निकलनेवाली वायुको 'प्राण' और नासिकाके भीतर जानेवाली वायुको 'अपान' कहते हैं।प्राणवायुकी गति दीर्घ और अपानवायुकी गति लघु होती है। इन दोनोंको सम करनेके लिये पहले बायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर दायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। फिर दायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर बायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। इन सब क्रियाओंमें बराबर समय लगना चाहिये। इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहनेसे प्राण और अपानवायुकी गति सम, शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिकाके बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्शका ज्ञान न हो, तब समझना चाहिये कि प्राणअपानकी गति सम हो गयी है। इन दोनोंकी गति सम होनेपर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मनसे स्वाभाविक ही परमात्माका चिन्तन होने लगता है। ध्यानयोगमें इस प्राणायामकी आवश्यकता होनेसे ही इसका उपर्युक्त पदोंमें उल्लेख किया गया है। 'यतेन्द्रियमनोबुद्धिः' प्रत्येक मनुष्यमें एक तो इन्द्रियोंका ज्ञान रहता है और एक बुद्धिका ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि--दोनोंके बीचमें मनका निवास है। मनुष्यको देखना यह है कि उसके मनपर इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है या बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है अथवा आंशिकरूपसे दोनोंके ज्ञानका प्रभाव है। इन्द्रियोंके ज्ञानमें 'संयोग' का प्रभाव पड़ता है और बुद्धिके ज्ञानमें 'परिणाम' का। जिन मनुष्योंके मनपर केवल इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है, वे संयोगजन्य सुखभोगमें ही लगे रहते हैं; और जिनके मनपर बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है, वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोगका त्याग करनेमें समर्थ हो जाते हैं--'न तेषु रमते बुधः' (गीता 5। 22)। प्रायः साधकोंके मनपर आंशिकरूपसे इन्द्रियों और बुद्धि--दोनोंके ज्ञानका प्रभाव रहता है। उनके मनमें इन्द्रियों तथा बुद्धिके ज्ञानका द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेकको महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं, उसे कर भी नहीं पाते। यह द्वन्द्व ही ध्यानमें बाधक है। अतः यहाँ मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको वशमें करनेका तात्पर्य है कि मनपर केवल बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव रह जाय, इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव सर्वथा मिट जाय।'मुनिर्मोक्षपरायणः'--परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है, ऐसे परमात्मस्वरूपका मनन करनेवाले साधकको यहाँ 'मोक्षपरायणः' कहा गया है। परमात्मतत्त्व सब देश, काल आदिमें परिपूर्ण होनेके कारण सदा-सर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होनेके कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्वकी अनुभूतिमें देरी हो रही है। यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्वकी अनुभूतिमें देरीका काम नहीं है। वास्तवमें उद्देश्य पहलेसे ही बना-बनाया है; क्योंकि परमात्मप्राप्तिके लिये ही यह मनुष्य-शरीर मिला है। केवल इस उद्देश्यको पहचानना है। जब साधक इस उद्देश्यको पहचान लेता है, तब उसमें परमात्मप्राप्तिकी लालसा उत्पन्न हो जाती है। यह लालसा संसारकी सब कामनाओंको मिटाकर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव करा देती है। अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको पहचाननेके लिये ही यहाँ 'मोक्षपरायणः' पदका प्रयोग हुआ है। कर्मयोग, सांख्ययोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा, तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी? इसलिये यहाँ 'मोक्षपरायणः' पदसे ध्यानयोगमें दृढ़ निश्चयकी आवश्यकता बतायी गयी है।'विगतेच्छाभयक्रोधो यः'--अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपनेसे सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल माननेसे उसपर क्रोध आता है। ऐसे ही जीनेकी इच्छा रहनेपर मृत्युसे भय होता है और दूसरोंसे अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरोंपर अपना अधिकार जमानेकी इच्छासे क्रोध होता है। अतः भय और क्रोध होनेमें इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्यमें इच्छापूर्तिका उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रह जाय, तो भय-क्रोधसहित इच्छाका सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छाका सर्वथा अभाव होनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छासे ही मनुष्य जन्म-मरणरूप बन्धनमें पड़ताहै। साधकको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओंकी इच्छासे वस्तुएँ मिल जाती हैं? और क्या जीनेकी इच्छासे मृत्युसे बच जाते हैं? वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओंकी इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्युसे बच सकते हैं। इसलिये यदि साधकका यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्तिके सिवाय कुछ नहीं चाहिये, तो वह वर्तमानमें ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छा रहेगी, तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्युके भयसे भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोधसे भी छुटकारा नहीं होगा। इसलिये मुक्त होनेके लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलनेवाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलनेवाली है तो इच्छा करनेपर भी नहीं मिलेगी। अतः वस्तुका मिलना या न मिलना इच्छाके अधीन नहीं है, प्रत्युत किसी विधानके अधीन है। जो वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है, उसकी इच्छाको छोड़नेमें क्या कठिनाई है? यदि वस्तुकी इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करनेका प्रयत्न करते और यदि जीनेकी इच्छा पूरी होती हो तो मृत्युसे बचनेका प्रयत्न करते। परन्तु इच्छाके अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्युसे बचाव ही होता है। यदि वस्तुओंकी इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीनेकी इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है। जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओंकी इच्छा करते हैं, और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है, जब जीनेकी इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है, वह जीते-जी मुक्त हो जाता है,अमर हो जाता है।'सदा मुक्त एव सः'--उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है। इस माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है। जो मुक्त हो गया है, उसपर किसी भी घटना, परिस्थिति, निन्दा-स्तुति, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जीवन-मरण आदिका किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।'सदा मुक्त एव' पदोंका तात्पर्य है कि वास्तवमें साधक स्वरूपसे सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूपका अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्तिका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध--भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठाका वर्णन करके दोनोंके लिये उपयोगी ध्यानयोगका वर्णन किया। अब सुगमतापूर्वक कल्याण करनेवाली भगवन्निष्ठाका वर्णन करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।5.27 5.28।।स्पर्शानिति। यतेन्द्रियेति। बाह्यस्पर्शान् बहिः कृत्वा अनङ्गीकृत्य भ्रुवोः वामदक्षिणदृष्ट्योः क्रोधरागात्मकयोः अन्तरे तद्रहिते स्थानविशेषे चक्षुरुपलक्षितानि सर्वेन्द्रियाणि कृत्वा विधाय प्राणापानौ धर्माधर्मौ चित्तवृत्त्यभ्यन्तरे साम्येनावस्थाप्य आसीत (K omits आसीत)। नसते कौटिल्येन असाम्येन क्रोधादिवशात् व्यवहरति इति नासा चित्तवृत्तिः। एतदेव बाह्ये। एवंविधो योगी सर्वव्यवहारान् वर्तयन्नपि मुक्त एव।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकत्रयस्य तात्पर्यार्थमाह सम्यग्दर्शनेति। ईश्वरार्पितसर्वभावेनेति। भगवति परस्मिन्नीश्वरे समर्पितः सर्वेषां देहेन्द्रियमनसां भावश्चेष्टाविशेषो न क्वचिदपि बहिस्तेषां व्यापारस्तेनेत्यर्थः। कर्मयोगस्य तत्फलस्य चाभिधानानन्तरमित्यथशब्दार्थः। स्वतो बाह्यानां विषयाणां कुतो बहिष्करणमित्याशङ्क्याह श्रोत्रादीति। तेषां बहिःकरणं कीदृगित्याशङ्क्याह तानिति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवं तत्त्वज्ञाननिष्ठानां यतीनां सद्योमुक्तिरुक्त्वा कर्मयोगिनं च सत्त्वशुद्य्धादिक्रमेण। अथेदानीं ध्यानयोगस्य सम्यग्दर्शनान्तरङ्गासाधनस्य षष्ठाध्या ये विस्तरेण वक्ष्यमाणस्य सूत्रस्थानीयांस्त्रीन्श्लोकानाह। स्पर्शान् शब्दादीन्बाह्यानेव श्रोत्रादिद्वारेण अन्तर्बुद्धौ प्रविष्टन्विषयान् अचिन्तनेन बहिःकृत्वा चक्षुश्चैव भ्रुवोरन्तरे कृत्वा तथा प्राणपानौ नासाभ्यन्तरचारिणौ समौ कृत्वा।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
।।5.27 5.28।।ध्यायिनां मुक्तत्वं साक्षाच्चेत्प्रमाणविरोधः ज्ञानद्वारा चेत्पुनरुक्तिरित्यतः श्लोकद्वयतात्पर्यमाह ध्यानेति। मुक्त एव स इति स्तुतिरिति भावः। पदानां व्यवहितत्वादन्वयमाह बाह्यानिति। स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः शब्दाद्याः। स्पर्शा बाह्या एव तेषां किं बहिष्करणं इत्यत आह श्रोत्रादीनीति। योगेन प्रत्याहारेण श्रोत्रादीनामनियमे पट्वभ्यासादरप्रत्ययवशाच्छब्दाद्या आन्तरा इव भवन्ति। तन्िनयमे तु बाह्या बहिष्कृताः स्युरिति भावः। कृत्वेत्यस्यानुवृत्त्या योजयति चक्षुरिति। दुर्घटमेतदित्यत आह भ्रुवोरिति। चक्षुर्वृत्तौ चक्षुश्शब्द इत्यर्थः।सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं 6।13 इति वक्ष्यमाणविरोध इत्यत आह उक्तं चेति। न्यूनाधिकभावराहित्यं समीकरणमित्यन्यथाप्रतीतिनिरासायानूद्य व्याचष्टे प्राणेति। कुम्भके प्राणायामे ततश्च समौ निर्विकारौ निश्चलावित्यर्थः। इतरत्समीकरणं कुम्भकार्थमेवेति भावः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
।।5.27 5.28।।ध्यानप्रकारमाह स्पर्शानित्यादिना। बाह्यान्स्पर्शन्वहिः कृत्वा श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः। चक्षुर्भ्रुवोरन्तरं कृत्वा भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन्नित्यर्थः। उक्तं च नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये ध्यानी चक्षुर्निधापयेत् इति। प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थितत्वेत्यर्थः।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
।।5.27 5.28।।पूर्वमीश्वरार्पितसर्वभावस्य कर्मयोगेनान्तःकरणशुद्धिस्ततः सर्वकर्मसंन्यासस्ततः श्रवणादिपरस्य तत्त्वज्ञानं मोक्षसाधनमुदेतीत्युक्तम् अधुनास योगी ब्रह्मनिर्वाणम् इत्यत्र सूचितं ध्यानयोगं सम्यग्दर्शनस्यान्तरङ्गसाधनं विस्तरेण वक्तुं सूत्रस्थानीयांस्त्रीञ्श्लोकानाह भगवान्। एतेषामेव वृत्तिस्थानीयः कृत्स्नः षष्ठोऽध्यायो भविष्यति। तत्रापि द्वाभ्यां संक्षेपेण योग उच्यते। तृतीयेन तु तत्फलं परमात्मज्ञानमिति विवेकः स्पर्शाञ्शब्दादीन्बाह्यान्बहिर्भवानपि श्रोत्रादिद्वारा तत्तदाकारान्तःकरणवृत्तिभिरन्तःप्रविष्टान्पुनर्बहिरेव कृत्वा परवैराग्यवशेन तत्तदाकारां वृत्तिमनुत्पाद्येत्यर्थः। यद्येते आन्तरा भवेयुस्तदोपायसहस्रेणामि बहिर्न स्युः स्वभावभङ्गप्रसङ्गात् बाह्यानां तु रागवशादन्तःप्रविष्टानां वैराग्येण बहिर्गमनं संभवतीति वदितुं बाह्यानिति विशेषणम्। तदनेन वैराग्यमुक्त्वाभ्यासमाह चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः कृत्वेत्यनुषज्यते। अत्यन्तनिमीलने हि निद्राख्या लयात्मिका वृत्तिरेका भवेत्। प्रसारणे तु प्रमाणविपर्ययविकल्पस्मृतयश्चतस्रो विक्षेपात्मिका वृत्तयो भवेयुः। पञ्चापि तु वृत्तयो निरोद्धव्या इति अर्धनिमीलनेन भ्रूमध्ये चक्षुषो निधानम्। तथा प्राणापानौ समौ तुल्यावूर्ध्वाधोगतिविच्छेदेन नासाभ्यन्तरचारिणौ कुम्भकेन कृत्वा अनेनोपायेन यताः संयता इन्द्रियमनोबुद्धयो यस्य स तथा। मोक्षपरायणः सर्वविषयविरक्तो मुनिर्मननशीलो भवेत्। विगतेच्छाभयक्रोध इति वीतरागभयक्रोध इत्यत्र व्याख्यातम्। एतादृशो यः संन्यासी सदा भवति मुक्त एव सः। नतु मोक्षः तस्य कर्तव्योऽस्ति। अथवा य एतादृशः स सदा जीवन्नपि मुक्त एव।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
एवं सम्यग्दर्शननिष्ठानां सद्योमुक्तिरुक्ता कर्मयोगश्च सङ्गफलत्यागेन ईश्वरप्रीत्यर्थमनुष्ठितः सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण मोक्षाय भवतीत्यप्युक्तं अथेदानीं सम्यग्दर्शनस्यान्तरङ्गसाधनं ध्यानयोगं विस्तरेण वक्ष्यामीति तत्सूत्रभूतांस्त्रीन्श्लोकानुपदिशति स्पर्शानिति। अत्रोत्तरार्धेन प्राणायाम उक्तः स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यानिति प्रत्याहर उक्तः भ्रुवोरन्तरे चक्षुः कृत्वेति धारणोक्ता विगतेच्छाभयक्रोध इति साधनभूताः फलभूताश्च द्विविधा यमा नियमाश्चोक्ताः यतेन्द्रिय इति वितर्काख्यः संप्रज्ञातः यतमान इति विचाराख्यः यतबुद्धिरित्यानन्दास्मिताख्यौ मोक्षपरायण इत्यसंप्रज्ञात उक्तः शेषेण योगफलमिति विभागः। पाठक्रममनुरुध्यार्थक्रमेणाक्षरार्थः स्पष्टीक्रियते। तत्र विगतेच्छो विगतभयो विगतक्रोध इति संबन्धः। यो हि इच्छावान्स इष्टसिद्ध्यर्थं हिंसानृतस्तेयस्त्रीपरिग्रहानिच्छेत्। अतो विगतेच्छपदेन तद्विपर्ययान्अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः इति सूत्रोक्तान्यमाँल्लक्षयति। तथा भयं स्वोच्छेदशङ्का तया ह्युद्विग्नो नशौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः इति सूत्रोक्तान्नियमान्स्वीकर्तुमिच्छेदतो विगतभय इत्यनेन तेषां ग्रहणम्। तथा क्रोधाक्रान्तो मैत्र्यादीन्भावयितुमशक्तश्चित्तप्रसाधनं कर्तुं न शक्नोति। तच्चमैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसाधनं इति सूत्रितम्। तत्र विगतक्रोधः शान्तप्रकृतित्वात्सुखितेषु मैत्रीं परस्येष्टे न ममैवेष्टमिदं जातमिति भावयेत्। तथा दुःखितेषु करुणां पुण्यवत्सु मुदितां पापवत्सूपेक्षां च भावयेत्। नचैतेन प्रसाधनेन विना चित्तादर्शस्य नैर्मल्यं भवति एवं साधनावस्थायां यमनियमचित्तप्रसाधनानां सिद्ध्यर्थं विगतेच्छाभयक्रोधत्वमीप्सितम्। एवं फलावस्थायामपि तदीप्सितम्। तथाहि संप्रज्ञातसमाधिफलभूतायां मधुमत्यां योगभूमौ स्थितं योगिनं प्रति दिव्याः कामा उपतिष्ठन्ते तत्रापि विगतेच्छत्वमिष्टम्। तथाहिस्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् इति सूत्रम्। स्थानिनो देवास्तैरुपनिमन्त्रणे इहास्यतां इमे रम्यावसथाः इमा रम्या रमाः इमानि जरामरणहराणि रसायनानि इमे वयं किंकराः स्वपुण्यार्जितमिदं स्थानं त्वया भुज्यतामिति प्रार्थनायां क्रियमाणायां सङ्गो लिप्सा तत्र न कर्तव्या नापि तल्लाभेनात्मनो महाभागत्वं देवप्रार्थ्यत्वं मत्वा गर्वोऽपि कर्तव्यस्तयोः सङ्गस्मययोर्भ्रंशहेतुत्वादिति सूत्रार्थः। तथा भयमपि द्विविधं योगान्तरायजं वितर्कजं च। तत्राद्यंव्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाःदुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाविक्षेपसहभुवः इति सूत्राभ्यामुक्तं। स्त्यानं अकर्मण्यता अविरतिरवैराग्यं अङ्गमेजयत्वं कंपवायुः वितर्काहिंसादयस्तज्जं च भयं आद्यस्य निवारणं ईश्वरप्रणिधानेन। तथा च सूत्रिंतततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽन्तरायाभावश्च इति। तत ईश्वरप्रणिधानात् द्वितीयस्य प्रतिपक्षभावनेन। तथाच सूत्रितम्वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् इति।वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदितालोभक्रोधमोहमूला मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् इति च। आदिपदादनृतस्तेयादयः। हिंसादयः प्रत्येकं कृतकारितानुमोदितभेदेन त्रिविधाः। तेऽपि प्रत्येकं लोभादिमूलकत्वेन त्रिविधाः। तेऽपि मृदुमध्यमाधिमात्रभेदेन प्रत्येकं त्रिविधाः। ते च मूलभूता वितर्कास्त्रयश्चत्वारः पञ्च अधिका वा त्रिस्त्रिगुणिता एकाशीतिरष्टोत्तरशतं पञ्चत्रिंशदधिकं शतमधिका वा भवन्ति। शाखाप्रशाखाभेदेनानन्ताश्च। दुःखरूपमज्ञानरूपं चानन्तफलं येषां ते दुःखाज्ञानानन्तफला इत्यनया प्रतिपक्षभावनया ते निवर्तनीया इति। एवं यमनियमचित्तप्रसाधनप्रतिपक्षभावनैर्निरन्तरायं मृदूकृतचित्तो योगी विविक्ते देशेआसीनः संभवात् इति न्यायेन स्थिरसुखमासनमध्यासीत। तत्र देशासने श्रूयेतेसमे शुचौ शर्करवह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोनुकूले नतु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत्। त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि। इति। चक्षुरित्यत्र विसर्गलोपश्छान्दसः। त्रिरुन्नतं कटिवक्षःकन्धराप्रदेशेषून्नतम्। ततो जितासनः प्राणायाममभ्यसेत्। तेन हि मन्दगतौ प्राणे सति तदनुसारि मनोऽपि चाञ्चल्यं त्यजति। नोचेद्वायुविक्षेपेण विक्षिप्यते। तत्र प्राणजयप्रमाणम्प्राणान्प्रपीड्येह सयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत इति श्रुत्युक्तमेव संगृह्णाति। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ इति। प्राणापानौ समौ तुल्यावूर्ध्वाधोगतिविच्छेदेन नासाभ्यन्तरचारिणौ कुम्भकेन कृत्वा ततो बाह्यान्बहिर्भवान्स्पर्शान्विषयसंबन्धानिन्द्रियद्वारा नित्यमन्तर्बुद्धौ क्रियमाणान् योगीन्द्रियाणां प्रत्याहरणेन तान्बहिरेव कुर्यात्। ततो विषयेभ्यो व्यावृत्तेषु करणेषु स्वप्नकाले इवान्तर्मनोमात्रेणावतिष्ठत इत्यर्थः। इमं प्रत्याहारं कर्तुमशक्तस्याविरक्तस्य का गतिरित्यत आह चक्षुश्चैवान्तरेभ्रुवोरिति। चशब्दो वार्थे। चक्षुरेव वा भ्रुवोरन्तरे कुर्यात्। खेचरीं मुद्रामभ्यस्येदित्यर्थः। सा चोक्ता योगसारेलम्बिकोर्ध्वस्थिते गर्ते जिह्वां व्यावृत्य धारयेत्। दृढासनश्चिरं तिष्ठेन्मुद्रैषा खेचरी मता। भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा महादेवेन कीर्तिता इति। य एवं सर्वोऽपि बाह्ये विषये सूर्यादौ संयमो यथोक्तं प्रत्याहारमनुष्ठातुमशक्तान्प्रत्येवोपदिश्यत इति ज्ञेयम्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
ननु स्पर्शभावरूपा स्थितिरतिकठिना अतः स्पर्शसंयोगेऽपि या प्राप्तिः स्यात् स्पर्शजबन्धाभावे न तथा भवेदित्यभिप्रायेणाह स्पर्शानिति द्वयेन। बहिर्बाह्यान् स्पर्शान् कृत्वा बाह्याँल्लौकिकान् स्पर्शानिन्द्रियादिविषयभोगान् बहिः तेषूत्तमाद्यभावेन प्रारब्धकर्मभोगवत्। किञ्च पुनर्भ्रुवोः कालयमरूपयोरन्तरैव चक्षुः दृष्टिं कृत्वा कालयममध्ये मरणरूपोऽस्मीति दृष्ट्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानावूर्ध्वाधोगतिरूपौ संयोगविप्रयोगसुखानुभवाविव समौ कृत्वा मोक्षपरायणः विषयादित्यागपरो विगतेच्छाभयक्रोधो भूत्वा यतेन्द्रियमनोबुद्धिः सन् यः सदा मुनिर्मननशीलो भवति स स्पर्शादिभिर्मुक्त एव स्यादित्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
बाह्यान् विषयस्पर्शान् बहिः कृत्वा बाह्येन्द्रियव्यापारं सर्वम् उपसंहृत्य योगयोग्यासने ऋजुकाय उपविश्य चक्षुः भ्रुवोः अन्तरे नासाग्रे विन्यस्य नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानौ समौ कृत्वा उच्छवासनिः श्वासौ समगति कृत्वा आत्मावलोकनाद् अन्यत्र प्रवृत्त्यनर्हेन्द्रियमनोबुद्धिः तत एव विगतेच्छाभयक्रोधो मोक्षपरायणो मोक्षैकप्रयोजनो मुनिः आत्मावलोकनशीलो यः सदा मुक्त एव साध्यदशायाम् इव साधनदशायाम् अपि मुक्त एव स इत्यर्थः।उक्तस्य नित्यनैमित्तिककर्मेति कर्तव्यताकस्य कर्मयोगस्य योगशिरस्कस्य सुशकताम् आह
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
।।5.27 5.28।। स्पर्शान् शब्दादीन् कृत्वा बहिः बाह्यान् श्रोत्रादिद्वारेण अन्तः बुद्धौ प्रवेशिताः शब्दादयः विषयाः तान् अचिन्तयतः शब्दादयो बाह्या बहिरेव कृताः भवन्ति तान् एवं बहिः कृत्वा चक्षुश्चैव अन्तरे भ्रुवोः कृत्वा इति अनुषज्यते। तथा प्राणापानौ नासाभ्यन्तरचारिणौ समौ कृत्वा यतेन्द्रियमनोबुद्धिः यतानि संयतानि इन्द्रियाणि मनः बुद्धिश्च यस्य सः यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मननात् मुनिः संन्यासी मोक्षपरायणः एवं देहसंस्थानात् मोक्षपरायणः मोक्ष एव परम् अयनं परा गतिः यस्य सः अयं मोक्षपरायणो मुनिः भवेत्। विगतेच्छाभयक्रोधः इच्छा च भयं च क्रोधश्च इच्छाभयक्रोधाः ते विगताः यस्मात् सः विगतेच्छाभयक्रोधः यः एवं वर्तते सदा संन्यासी मुक्त एव सः न तस्य मोक्षायान्यः कर्तव्योऽस्ति।।एवं समाहितचित्तेन किं विज्ञेयम् इति उच्यते भोक्तारं यज्ञतपसां यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च सर्वलोकमहेश्वरं सर्वेषां लोकानां महान्तम् ईश्वरं सुहृदं सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां प्रत्युपकारनिरपेक्षतया उपकारिणं सर्वभूतानां हृदयेशयं सर्वकर्मफलाध्यक्षं सर्वप्रत्ययसाक्षिणं मां नारायणं ज्ञात्वा शान्तिं सर्वसंसारोपरतिम् ऋच्छति प्राप्नोति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येपञ्चमोऽध्यायः।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
स योगी ब्रह्मनिर्वाणमित्यादिषु योगी मोक्षमाप्नोतीत्युक्तं तमेव योगं संक्षेपेण दर्शयन्नाह स्पर्शानिति द्वाभ्याम्। बाह्या एव स्पर्शा रूपरसादयो विषयाश्चिन्तिताः सन्तोऽन्तः प्रविशन्ति तांस्तच्चिन्तात्यागेन बहिरेव कृत्वा चक्षुश्च भ्रुवोरन्तरे भ्रूमध्य एव कृत्वाऽत्यन्तं नेत्रयोर्निमीलने निद्रया मनो लीयते। उन्मीलनेन च बहिः प्रसरति। तदुभयदोषपरिहारार्थमर्धनिमीलनेन भ्रूमध्ये दृष्टिं निधायेत्यर्थः। उच्छ्वासनिःश्वासरूपेण नासिकयोरभ्यन्तरे च चरन्तौ प्राणापानावूर्ध्वाधोगतिनिरोधेन समौ कृत्वा। कुम्भयित्वेत्यर्थः। यद्वा प्राणो यथा बहिर्न निर्याति यथा चापानोऽन्तर्न प्रविशति किंतुनासामध्य एव द्वावपि यथा चरतः तथा मन्दाभ्यामुच्छ्वासनिःश्वासाभ्यां समौ कृत्वेति।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।5.27 5.28।।स योगी ब्रह्मनिर्वाणं 5।24 इत्यादौ प्रोक्तं तमेव योगं समासेन दर्शयन्नाह द्वाभ्याम् स्पर्शानिति।ईश्वरालम्बनं योगो जनयित्वा तु तादृशम्। बहुजन्मविपाकेन भक्तिं जनयति ध्रुवम्। योगेन तु निषिद्धेन यदि देहः प्रसिद्ध्यति। तदा कल्पान्तपर्यन्तं भावनातस्तु तत्फलम्। इति निबन्धे ईश्वरालम्बनस्यैव योगस्य भक्तिजनकत्वमिति। योगेश्वरालम्बनतायाः स्वरूपमाह स्पर्शाः बाह्याः रूपरसादयो विषयाश्चिन्तितता एवान्तः प्रविशन्ति तांस्तच्चिन्तात्यागेन बहिरेव कृत्वा ज्ञानप्रधानं चक्षुश्च भ्रुवोरन्तरे कृत्वा अर्द्धोन्मीलितलोचनेनमन एकाग्रं कृत्वेत्यर्थः। तथोर्द्धाधोगतिकौ प्राणापानौ च समौ कृत्वा कुम्भयित्वा प्राणायामाभिनयेन तदाह नासाभ्यन्तरचारिणाविति। एतेनोपायेन यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्योगफलं न तत्र सिद्धिकामः स्यात् किन्तु मोक्षपरायणः मोक्षार्थं पर ईश्वरस्तदालम्बनो यः स सदा प्रपञ्च एवमुक्त एव जीवन्मुक्त इत्यर्थः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
ज्ञानकर्मात्मिके निष्ठे योगलक्षे सुसंस्कृते। आत्मानुभूतिसिद्ध्यर्थे पूर्वषट्केन चोदिते गी.सं.2 इति सङ्ग्रहमनुसन्दधान उत्तरश्लोकानां सङ्गतिमाह उक्तं कर्मयोगमिति। स्पर्शशब्दस्यात्रानुभवपरस्यानुभाव्यार्थज्ञापनायविषयस्पर्शानित्युक्तम्। फलितमाह बाह्येन्द्रियव्यापारं सर्वमुपसंहृत्येति।उपविश्यासने 6।12 इत्यादिवक्ष्यमाणानुसन्धानेनयोगयोग्येत्याद्युक्तम्।चक्षुः इत्येकवचनं करणाकारैक्यादिति दर्शयितुंचक्षुषी इत्युक्तम्।सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं 6।13 इति वक्ष्यमाणेननासाग्रन्यस्तलोचनः इत्यादिप्रकरणान्तरोक्त्या चभ्रुवोरन्तरे कृत्वा इत्यस्यैकार्थ्यमाहनासाग्र इति। नासाभ्यन्तरसञ्चारमात्रस्य स्वतस्सिद्धस्य विधेयत्वायोगात्समौ कृत्वा इत्येतदेव विधेयमिति दर्शयितुंनासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानावित्यनुवादः। अपानस्य नासाभ्यन्तरसञ्चारव्यञ्जनायउच्छ्वासनिश्श्वासावित्युक्तम्। एक एव हि वायुर्नासापुटेन निष्कामन् प्रविशंश्च प्राणोऽपान इति चोच्यते। वृत्तिस्थानादिसाम्यायोगात्तद्गतिसाम्योक्तिः। न दीर्घमुच्छ्वसन्नापि निश्श्वसन्नित्यर्थः। साक्षात्कारात्यन्ताव्यवहितपूर्वावस्थाविषयत्वाद्यतशब्दस्यप्रवृत्त्यनर्हेत्यर्थ उक्तः।स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यान् इत्यत्र प्रवृत्तिनिवारणम्यतेन्द्रियः इत्यादौ तु तत्फलभूता प्रवृत्त्यनर्हतेत्यपुनरुक्तिरिति भावः। ज्ञानार्थधातौ निष्पन्नस्य मुनिशब्दस्य योगावस्थायां आत्मसाक्षात्काररूपज्ञानविशेषे तात्पर्यमाहआत्मावलोकनशील इति। अत्र वाचंयमत्वादप्यन्तरङ्गभूतोऽयमर्थ इति भावः। सदाशब्दाभिप्रेतं व्यनक्तिसाध्यदशायामिवेति।मुक्त एव मुक्तप्राय इत्यर्थः।