श्लोक · Shlok 25
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया | आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥
śanaiḥ śanairuparamed buddhyā dhṛtigṛhītayā. ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiñcidapi cintayet.
Translation · अर्थ
English
Little by little let him attain to ietude by the intellect held firmly; having made the mind establish itself in the Self, let him not think of anything.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
By proper conviction and intelligence one should gradually cease sense activities. This is called pratyāhāra. The mind, being controlled by conviction, meditation and cessation from the senses, should be situated in trance, or samādhi. At that time there is no longer any danger of becoming engaged in the material conception of life. In other words, although one is involved with matter as long as the material body exists, one should not think about sense gratification. One should think of no pleasure aside from the pleasure of the Supreme Self. This state is easily attained by directly practicing Kṛṣṇa consciousness.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
शनैः gradually? शनैः gradually? उपरमेत् let him attain to ietude? बुद्ध्या by the intellect? धृतिगृहीतया held in firmness? आत्मसंस्थम् placed in the Self? मनः the mind? कृत्वा having made? न not? किञ्चित् anything? अपि even? चिन्तयेत् let him think.Commentary The practitioner of Yoga should attain tranillity gradually or by degrees? by,means of the intellect controlled by steadiness. The peace of the Eternal will fill the heart gradually with thrill and bliss through the constant and protracted practice of steady conentration. He should make the mind constantly abide in the Self within through ceaseless practice. If anyone constantly thinks of the immortal Self within? the mind will cease to think of the objects of sensepleasure. The mental energy should be directed along the spiritual channel by Atmachintana or constant contemplation on the Self.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
पूर्व श्लोकों के अनुसार योग का लक्ष्य है मन का अपने स्वस्वरूप में स्थित हो जाना। यह स्थिति परम आनन्दस्वरूप बतायी गयी है। परन्तु इस स्थिति को प्राप्त करने के उपायों को दर्शाये बिना विषय का सैद्धान्तिक निरूपण मात्र साधकों के लिए अधिक उपयोगी नहीं होता।विचाराधीन दो श्लोकों में ध्यान की सूक्ष्म कला का वर्णन किया गया है। मन को एकाग्र कैसे करें तत्पश्चात् उस समाहित चित्त के द्वारा आत्मा का ध्यान करके तद्रूप कैसे हो इसका विस्तृत विवेचन इन श्लोकों में मिलता है।समस्त कामनाओं का निशेष त्यागकर इन्द्रिय वर्ग को विषयों से सम्यक् प्रकार अपने वश में करना चाहिए। इस श्लोक का प्रत्येक शब्द सफलता के द्वार का सूचक होने से उसकी व्याख्या की आवश्यकता है। यहाँ विशेष रूप से कहा गया है कि सब कामनाओं का निशेष त्याग करना आवश्यक है। इससे आत्मानुभूति की स्थिति के स्वरूप के सम्बन्ध में किसी भी साधक के मन में कोई शंका नहीं रह जानी चाहिए। अशेषत से तात्पर्य यह है कि ध्यान के अन्तिम चरण में साधक को योग के पूर्णत्व की प्राप्ति की इच्छा का भी त्याग कर देना चाहिए यहाँ कामनात्याग को एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यक गुण बताया है परन्तु दुर्भाग्य से अविवेकी लोगों ने कामना को दिये हुए विशेषण की ओर ध्यान नहीं दिया और शास्त्रों के अर्थों को विकृत कर दिया है। उन्होंने यही समझा कि शास्त्र में महत्त्वाकांक्षा रहित जीवन का उपदेश दिया गया है और इस विपरीत धारणा के कारण वे तमोगुण की अकर्मण्यता में फंस जाते है।संकल्प प्रभवान् इस विशेषण की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी अध्याय के दूसरे श्लोक की व्याख्या में संकल्प शब्द का अर्थ बताया जा चुका है। उस दृष्टि से यहाँ अर्थ होगा कि ऐसी कामनाओं को त्यागना है जो विषयों में सुख होने के संकल्प से उत्पन्न होकर मन में असंख्य विक्षेपों को जन्म देती हैं।यदि मनुष्य इन संकल्पजनित इच्छाओं को त्यागने में सफल हो जाता है तो उसके मन में वह सार्मथ्य और दृढ़ता आ जाती है कि वह इन्द्रियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है। सर्वप्रथम इन्द्रियों के उन्मत्त अश्वों को वश में कर लें तो फिर उन्हें सब विषयों से परावृत्त करने में सरलता होती है।यह एक अनुभूत सत्य है कि मन स्वनिर्मित विक्षेपों के कारण दुर्बल होकर इन्द्रियों को अपने वश में नहीं रख पाता। कामनात्याग से उसमें यह क्षमता आ जाती है। परन्तु मन की यह शक्ति और शांति शीघ्रता से किये गये कर्म या कल्पना से नहीं प्राप्त होती है और न किसी विचित्र रहस्यमयी साधना से। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि साधक को धीरेधीरे अपने मन को शांत करना चाहिए।निसन्देह इन्द्रियों की विषयाभिमुखी प्रवृत्ति को संयमित करने पर कुछ मात्रा में मनशांति प्राप्त होती है। तब इस शांति को स्थिर और दृढ़ करने की आवश्यकता होती है। उसका उपाय बताते हुए भगवान् कहते हैं धैर्ययुक्त बुद्धि से मन को आत्मा में स्थिर करना चाहिए। अभ्यास के क्रम में इस उपदेश का बहुत महत्त्व है।सर्वप्रथम इन्द्रियों को मन के द्वारा संयमित करे और तत्पश्चात् मन को उससे सूक्ष्मतर विवेकवती बुद्धि के द्वारा आत्मा में स्थिर करे। ध्येय विषयक वृत्ति के अतिरिक्त अन्य सब वृत्तियों के त्याग के द्वारा ही मन को संयमित करना संभव है। वृत्तियों का प्रवाह मन कहलाता है अत आत्मा के स्वरूप पर सतत अनुसंधान करने से मन आत्मा में ही स्थित हो जायेगा। आत्मा में पूर्णतया स्थित हो जाने पर वह एक दिव्य अलौकिक शान्ति में निमग्न हो जाता है। मनुष्य अपने सजग पुरुषार्थ के द्वारा इस स्थिति तक पहुँच सकता है जो ध्यानयोग का अन्तिम सोपान है।सभी साधकों के द्वारा अभ्यसनीय इस योग का उपदेश देते हुये भगवान् उन्हें सावधान करते हैं कि योग की उपर्युक्त चरम स्थिति तक पहुँचने के पश्चात् किसी अन्य विषय का चिन्तन नहीं करना चाहिये।इस शांत क्षणको पाने के उपरान्त साधक को और कोई कर्तव्य और प्राप्तव्य शेष नहीं रह जाता। उसको इतना ही ध्यान रखना होता है कि किसी नवीन वृत्तिप्रवाह का प्रारम्भ न हो और मन की शान्ति सुदृढ़ रहे। द्वार खटखटाओ और तुम अन्दर प्रवेश करोगे यह भगवान् का आश्वासन है।विश्व के किसी भी धर्मग्रन्थ में केवल दो श्लोकों में ध्यानयोग की विधि से सम्बन्धित निर्देशों का इतना विस्तृत विवरण नहीं मिलता। स्वयं गीता में भी किसी अन्य स्थान पर ऐसा वर्णन नहीं किया गया है। इस दृष्टि से ये दो सारगर्भित श्लोक अतुलनीय और अनुपम हैं।योगाभ्यास में प्रवृत्त जिन साधकों का मन चंचल औरअस्थिर होता है उनके लिए अगले श्लोक में उपाय बताते हैं
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--'बुद्ध्या धृतिगृहीतया'--साधन करते-करते प्रायः साधकोंको उकताहट होती है, निराशा होती है कि ध्यान लगाते, विचार करते इतने दिन हो गये पर तत्त्वप्राप्ति नहीं हुई, तो अब क्या होगी कैसे होगी? इस बातको लेकर भगवान् ध्यानयोगके साधकको सावधान करते हैं कि उसको ध्यानयोगका अभ्यास करते हुए सिद्धि प्राप्त न हो, तो भी उकताना नहीं चाहिये, प्रत्युत धैर्य रखना चाहिये। जैसे सिद्धि प्राप्त होनेपर, सफलता होनेपर धैर्य रहता है, विफलता होनेपर भी वैसा ही धैर्य रहना चाहिये कि वर्ष-के-वर्ष बीत जायँ, शरीर चला जाय, तो भी परवाह नहीं, पर तत्त्वको तो प्राप्त करना ही है (टिप्पणी प0 357)। कारण कि इससे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा काम है नहीं। इसलिये इसको समाप्त करके आगे क्या काम करना है? यदि इससे भी बढ़कर कोई काम है तो इसको छोड़ो और उस कामको अभी करो!--इस प्रकार बुद्धिको वशमें कर ले अर्थात् बुद्धिमें मान, बड़ाई, आराम आदिको लेकर जो संसारका महत्त्व पड़ा है, उस महत्त्वको हटा दे। तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें जिन विषयोंका त्याग करनेके लिये कहा गया है, धैर्यपूर्वक बुद्धिसे उन विषयोंसे उपराम हो जाय।'शनैः शनैरुपरमेत्'--उपराम होनेमें जल्दबाजी न करे; किन्तु धीरे-धीरे उपेक्षा करते-करते विषयोंसे उदासीन हो जाय और उदासीन होनेपर उनसे बिलकुल ही उपराम हो जाय।कामनाओंका त्याग और मनसे इन्द्रिय-समूहका संयमन करनेके बाद भी यहाँ जो उपराम होनेकी बात बतायी है, उसका तात्पर्य है कि किसी त्याज्य वस्तुका त्याग करनेपर भी उस त्याज्य वस्तुके साथ आंशिक द्वेषका भाव रह सकता है। उस द्वेष-भावको हटानेके लिये यहाँ उपराम होनेकी बात कही गयी है। तात्पर्य है कि संकल्पोंके साथ न राग करे, न द्वेष करे; किन्तु उनसे सर्वथा उपराम हो जाय। यहाँ उपराम होनेकी बात इसलिये कही गयी है कि परमात्मतत्त्व मनके कब्जेमें नहीं आता; क्योंकि मन प्रकृतिका कार्य होनेसे जब प्रकृतिको भी नहीं पकड़ सकता, तो फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्मतत्त्वको पकड़ ही कैसे सकता है? अर्थात् परमात्माका चिन्तन करते-करते मन परमात्माको पकड़ ले--यह उसके हाथकी बात नहीं है। जिस परमात्माकी शक्तिसे मन अपना कार्य करता है, उसको मन कैसे पकड़ सकता है?--'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्' (केन0 1। 5)। जैसे, जिस सूर्यके प्रकाशसे दीपक, बिजली आदि प्रकाशित होते हैं, वे दीपक आदि सूर्यको कैसे प्रकाशित कर सकते हैं? कारण कि उनमें प्रकाश तो सूर्यसे ही आता है। ऐसे ही मन, बुद्धि आदिमें जो कुछ शक्ति है, वह उस परमात्मासे ही आती है। अतः वे मन, बुद्धि आदि उस परमात्माको कैसे पकड़ सकते हैं? नहीं पकड़ सकते।दूसरी बात, संसारकी तरफ चलनेसे सुख नहीं पाया है, केवल दुःख-ही-दुःख पाया है। अतः संसारके चिन्तनसे प्रयोजन नहीं रहा। तो अब क्या करें? उससे उपराम हो जायँ। 'आत्मसंस्थं मनः (टिप्पणी प0 358) कृत्वा'--सब जगह एक सच्चिदानन्द परमात्मा ही परिपूर्ण है। संकल्पोंमें पहले और पीछे (अन्तमें) वही परमात्मा है। संकल्पोंमें भी आधार और प्रकाशकरूपसे एक परमात्मा ही परिपूर्ण है। उन संकल्पोंमें और कोई सत्ता पैदा नहीं हुई है; किन्तु उनमें सत्तारूपसे वह परमात्मा ही है। ऐसा बुद्धिका दृढ़ निश्चय, निर्णय रहे। मनमें कोई तरंग पैदा हो भी जाय तो उस तरंगको परमात्माका ही स्वरूप माने।दूसरा भाव यह है कि परमात्मा देश, काल, वस्तु, व्यक्ति,घटना, परिस्थिति आदि सबमें परिपूर्ण है। ये देश, काल आदि तो उत्पन्न होते हैं और मिटते हैं; परन्तु परमात्मतत्त्व बनता-बिगड़ता नहीं है। वह तो सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। उस परमात्मामें मनको स्थिर करके अर्थात् सब जगह एक परमात्मा ही है, उस परमात्माके सिवाय दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं--ऐसा पक्का निश्चय करके कुछ भी चिन्तन न करे।'न किञ्चिदपि चिन्तयेत्'--संसारका चिन्तन न करे--यह बात तो पहले ही आ गयी। अब 'परमात्मा सबजगह परिपूर्ण है' ऐसा चिन्तन भी न करे। कारण कि जब मनको परमात्मामें स्थापन कर दिया, तो अब चिन्तन करनेसे सविकल्प वृत्ति हो जायगी अर्थात् मनके साथ सम्बन्ध बना रहेगा, जिससे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होगा। अगर 'हमारी ऐसी स्थिति बनी रहे'--ऐसा चिन्तन करेंगे तो परिच्छिन्नता बनी रहेगी अर्थात् चित्तकी और चिन्तन करनेवालेकी सत्ता बनी रहेगी। अतः सब जगह एक परमात्मा ही परिपूर्ण है ऐसा दृढ़ निश्चय करनेके बाद किसी प्रकारका किञ्चिन्मात्र भी चिन्तन न करे। इस प्रकार उपराम होनेसे स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जायगा, जिसका वर्णन पहले बाईसवें श्लोकमें हुआ है।ध्यानसम्बन्धी मार्मिक बातसबसे मुख्य बात यह है कि परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है। सब देशमें, सब कालमें, सम्पूर्ण वस्तुओंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें और सम्पूर्ण क्रियाओंमें परमात्मा साकार, निराकार आदि सब रूपोंसे सदा ज्यों-का-त्यों विराजमान है। उस परमात्माके सिवाय जितना भी प्रकृतिका कार्य है, वह सब-का-सब परिवर्तनशील है। परन्तु परमात्मतत्त्वमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ, न होगा और न हो ही सकता है। उस परमात्माका ध्यान ऐसे किया जाय कि जैसे कोई मनुष्य समुद्रमें गहरा उतर जाय, तो जहाँतक दृष्टि जाती है, वहाँतक जल-ही-जल दीखता है। नीचे देखो तो भी जल है, ऊपर देखो तो भी जल है, चारों तरफ जल-ही-जल परिपूर्ण है। इस तरह जहाँ स्वयं अपने-आपको एक जगह मानता है, उसके भीतर भी परमात्मा है, बाहर भी परमात्मा है, ऊपर भी परमात्मा है, नीचे भी परमात्मा है, चारों तरफ परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण है। शरीरके भी कण-कणमें वह परमात्मा है। उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना ही मनुष्यमात्रका ध्येय है और वह नित्य-निरन्तर प्राप्त है। उस परमात्मतत्त्वसे कोई कभी दूर हो सकता ही नहीं। किसी भी अवस्थामें उससे कोई अलग नहीं हो सकता। केवल अपनी दृष्टि विनाशी पदार्थोंकी तरफ रहनेसे वह सदा परिपूर्ण, निर्विकार, सम, शान्त रहनेवाला परमात्मतत्त्व दीखता नहीं।अगर उस परमात्माकी तरफ दृष्टि, लक्ष्य हो जाय कि वह सब जगह ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है, तो स्वतः ध्यान हो जायगा, ध्यान करना नहीं पड़ेगा। जैसे, हम सब पृथ्वीपर रहते हैं, तो हमारे भीतर-बाहर, ऊपर और चारों तरफ आकाश-ही-आकाश है, पोलाहट-ही-पोलाहट है; परन्तु उसकी तरफ हमारा लक्ष्य नहीं रहता। अगर लक्ष्य हो जाय, तो हम निरन्तर आकाशमें ही रहते हैं। आकाशमें ही चलते हैं, फिरते हैं, खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं, जगते हैं। आकाशमें ही हम सब काम कर रहे हैं। परन्तु आकाशकी तरफ ध्यान न होनेसे इसका पता नहीं लगता। अगर उस तरफ ध्यान जाय कि आकाश है, उसमें बादल होते हैं, वर्षा होती है, उसमें सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि हैं, तो आकाशका ख्याल होता है, अन्यथा नहीं होता। आकाशका ख्याल न होनेपर भी हमारी सब क्रियाएँ आकाशमें ही होती हैं। ऐसे ही उस परमात्मतत्त्वकी तरफ ख्याल न होनेपर भी हमारी सम्पूर्ण क्रियाएँ उस परमात्मतत्त्वमें ही हो रही हैं। इसलिये गीताने कहा कि--'शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया' अर्थात् जिस बुद्धिमें धीरज है, ऐसी बुद्धिके द्वारा धीरे-धीरे उपराम हो जाय। संसारकी कोई भी बात मनमें आये, तो उससे उपराम हो जाय। साधककी भूल यह होती है कि जिस समय वह परमात्माका ध्यान करने बैठता है, उस समय सांसारिक वस्तुकी याद आनेपर वह उसका विरोध करने लगता है। विरोध करनेसे भी वस्तुका अपने साथ सम्बन्ध हो जाता है और उसमें राग करनेसे भी सम्बन्ध हो जाता है। अतः न तो उसका विरोध करें और न उसमें राग करें। उसकी अपेक्षा करें, उससे उदासीन हो जायँ। बेपरवाह हो जायँ। संसारकी याद आ गयी तो आ गयी, नहीं आयी तो नहीं आयी--इस बेपरवाहीसे संसारके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ेगा। अतः भगवान् कहते हैं कि उससे उदासीन ही नहीं, उपराम हो जाय--'शनैः शनैः उपरमेत्'।उत्पन्न होनेवाली चीज नष्ट होनेवाली होती है--यह नियम है। अतः संसारका कितना ही संकल्प-विकल्प हो जाय, वह सब नष्ट हो रहा है। इसलिये उसको रखनेकी चेष्टा करना भी गलती है और नाश करनेका उद्योग करना भी गलती है। संसारमें बहुत-सी चीजें उत्पन्न और नष्ट होती हैं, पर उनका पाप और पुण्य हमेंनहीं लगता; क्योंकि उनसे हमारा सम्बन्ध नहीं है। ऐसे ही मनमें संकल्प-विकल्प आ जाय, संसारका चिन्तन हो जाय, तो उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। न तो याद आनेवाली वस्तुके साथ सम्बन्ध है और न जिसमें वस्तुकी याद आयी, उस मनके साथ ही सम्बन्ध है। हमारा सम्बन्ध तो सब जगह परिपूर्ण परमात्मासे है। अतः उत्पन्न और नष्ट होनेवाले संकल्प-विकल्पसे क्या तो राग करें और क्या द्वेष करें?यह तो उत्पत्ति और विनाशका एक प्रवाह है। इससे उपराम हो जाय, विमुख हो जाय, इसकी कुछ भी परवाह न करे।एक परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण है। जब हम अपना एक व्यक्तित्व पकड़ लेते हैं, तब 'मैं हूँ' ऐसा दीखने लगता है। यह व्यक्तित्व, 'मैं'-पन भी जिसके अन्तर्गत है, ऐसा वह अपार, असीम, सम, शान्ति, सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन परमात्मा है। जैसे, सम्पूर्ण पदार्थ, क्रियाएँ आदि एक प्रकाशके अन्तर्गत हैं। उस प्रकाशका सम्बन्ध है तो मात्र वस्तुओँ, क्रियाओँ, व्यक्तियों आदिके साथ है और नहीं है तो किसीके भी साथ सम्बन्ध नहीं है। प्रकाश अपनी जगह ज्यों-का-त्यों स्थित है। उसमें कई वस्तुएँ आती-जाती रहती हैं, कई क्रियाएँ होती रहती हैं; किन्तु प्रकाशमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। ऐसे ही प्रकाशस्वरूप परमात्माके साथ किसी भी वस्तु, क्रिया आदिका कोई सम्बन्ध नहीं है। सम्बन्ध है तो सम्पूर्णके साथ सम्बन्ध है, नहीं तो किसीके साथ भी सम्बन्ध नहीं है। ये वस्तु, क्रिया आदि सब उत्पत्ति-विनाशशील हैं और वह परमात्मा अनुत्पन्न तत्त्व है। उस परमात्मामें स्थित होकर कुछ भी चिन्तन न करे।एक चिन्तन 'करते' हैं और एक चिन्तन 'होता' है। चिन्तन करे नहीं और अपने-आप कोई चिन्तन हो जाय तो उसके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, तटस्थ रहे। वास्तवमें हम तटस्थ ही हैं; क्योंकि संकल्प-विकल्प तो उत्पन्न और नष्ट होते हैं, पर हम रहते हैं। इसलिये रहनेवाले स्वरूपमें ही रहें और संकल्प-विकल्पकी उपेक्षा कर दें, तो हमारेपर वह (संकल्प-विकल्प) लागू नहीं होगा। साधक एक गलती करता है कि जब उसको संसार याद आता है, तब वह उससे द्वेष करता है कि इसको हटाओ, इसको मिटाओ। ऐसा करनेसे संसारके साथ विशेष सम्बन्ध जुड़ जाता है। इसलिये उसको हटानेका कोई उद्योग न करे, प्रत्युत ऐसा विचार करे कि जो संकल्प-विकल्प होते हैं, उनमें भी वह परमात्मतत्त्व ओतप्रोत है। जैसे जलमें बर्फका ढेला डाल दें, तो बर्फ स्वयं भी जल है और उसके बाहर भी जल है। ऐसे ही संकल्प-विकल्प कुछ भी आये, वह परमात्माके ही अन्तर्गत है और संकल्प-विकल्पके भी अन्तर्गत परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण है। जैसे समुद्रमें बड़ी-बड़ी लहरें उठती हैं। एक लहरके बाद दूसरी लहर आती है। उन लहरोंमें भी जल-ही-जल है। देखनेमें लहर अलग दीखती है, पर जलके सिवाय लहर कुछ नहीं है। ऐसे ही संकल्प-विकल्पमें परमात्मतत्त्वके सिवाय कोई तत्त्व नहीं है, कोई वस्तु नहीं है।अभी कोई पुरानी घटना याद आ गयी, तो वह घटना पहले हुई थी, अब वह घटना नहीं है। मनुष्य जबर्दस्ती उस घटनाको याद करके घबरा जाता है कि क्या करूँ, मन नहीं लगता! वास्तवमें जब परमात्माका ध्यान करते हैं, उस समय अनेक तरहकी पुरानी बातोंकी याद, पुराने संस्कार नष्ट होनेके लिये प्रकट होते हैं। परन्तु साधक इस बातको समझे बिना उनको सत्ता देकर और मजबूत बना लेता है। इसलिये उनकी उपेक्षा कर दे। उनको न अच्छा समझे और न बुरा समझे, तो वे जैसे उत्पन्न हुए, वैसे ही नष्ट हो जायँगे। हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है। हम परमात्माके हैं और परमात्मा हमारा है। सब जगह परिपूर्ण उस परमात्मामें हमारी स्थिति सब समयमें है--ऐसा मानकर चुप बैठ जाय। अपनी तरफसे कुछ भी चिन्तन न करे। अपने-आप चिन्तन हो जाय तो उससे सम्बन्ध न जो़ड़े। फिर वृत्तियाँ अपने-आप शान्त हो जायँगी और परमात्माका ध्यान स्वतः होगा। कारण कि वृत्तियाँ आने-जानेवाली हैं और परमात्मा सदा रहनेवाला है। जो स्वतःसिद्ध है, उसमें करना क्या पड़ेगा? करना कुछ है ही नहीं। साधक ऐसा मान लेता है कि मैं ध्यान करता हूँ, चिन्तन करता हूँ--यह गलती है। जब सब जगह एक परमात्मा ही है, तो क्या चिन्तन करे, क्या ध्यान करे! समुद्रमें लहरें होती हैं, पर जल-तत्त्वमें न लहरें हैं, न समुद्र है। ऐसे ही परमात्मतत्त्वमें न संसार है, न आकृति है, न आना-जाना है। वह परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है, सम है, शान्त है, निर्विकार है, स्वतःसिद्ध है। उसका चिन्तन करना नहीं पड़ता। उसका चिन्तन क्या करें? उसमें तो हमारी स्थिति स्वतः है, हर समय है।व्यवहार करते समय भी उस परमात्मासे हम अलग नहीं होते, प्रत्युत निरन्तर उसमें रहते हैं। जब व्यवहारवाली वस्तुओंको आदर देते हैं, महत्त्व देते हैं, तब विक्षेप होता है। एकान्तमें बैठे हैं और कोई बात याद आ जाती है तो विक्षेप हो जाता है। वास्तवमें विक्षेप उस बातसे नहीं होता। उसको सत्ता दे देते हैं, महत्ता दे देते हैं, उससे विक्षेप होता है। जैसे आकाशमें बादल आते हैं और शान्त हो जाते हैं, ऐसे ही मनमें कई स्फुरणाएँ आती हैं और शान्त हो जाती हैं। आकाशमें कितने ही बादल आयें और चले जायँ, पर आकाशमें कुछ परिवर्तन नहीं होता; वह ज्यों-का-त्यों रहता है। ऐसे ही ध्यानके समय कुछ याद आये अथवा न आये, परमात्मा ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण रहता है। कुछ याद आये तो उसमें भी परमात्मा है और कुछ याद न आये तो उसमें भी परमात्मा है। देखनेमें, सुननेमें, समझनेमें जो कुछ आ जाय, उन सबके बाहर भी परमात्मा है और सबके भीतर भी परमात्मा है। चर और अचर जो कुछ है, वह भी परमात्मा है। दूर-से-दूर भी परमात्मा है नजदीक-से-नजदीक भी परमात्मा है। परन्तु अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह बुद्धिके अन्तर्गत नहीं आता (गीता 13। 15)। ऐसा वह परमात्मा सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन है। सब जगह पूर्ण आनन्द, अपार आनन्द, सम आनन्द, शान्त आनन्द, घन आनन्द, अचल आनन्द, अटल आनन्द, आनन्द-ही-आनन्द है! एकान्तमें ध्यान करनेके सिवाय दूसरे समय कार्य करते हुए भी ऐसा समझे कि परमात्मा सबमें परिपूर्ण है। कार्य करते हुए सावधान होकर परमात्माकी सत्ता मानेंगे, तो ध्यानके समय बड़ी सहायता मिलेगी और ध्यानके समय संकल्प-विकल्पकी उपेक्षा करके परमात्मामें अटल स्थित रहेंगे, तो व्यवहार करते समय परमात्माके चिन्तनमें बड़ी सहायता मिलेगी। जो साधक होता है, वह घंटे-दो-घंटे नहीं, आठों पहर साधक होता है। जैसे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपनेमें निरन्तर स्थित रहता है, ऐसे ही मात्र जीव परमात्मामें निरन्तर स्थित रहते हैं। ब्राह्मण तो पैदा होता है, पर परमात्मा पैदा नहीं होता। परन्तु काम-धंधा करते हुए पदार्थोंकी, क्रियाओँकी, व्यक्तियोंकी तरफ वृत्ति रहनेसे उन सबमें परिपूर्ण परमात्मा दीखता नहीं। इसलिये एकान्तमें बैठकर ध्यान करते समय और व्यवहारकालमें कार्य करते समय साधककी दृष्टि इस तरफ रहनी चाहिये कि सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना,क्रिया आदिमें एक परमात्मतत्त्व ही ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। उसीमें स्थित रहे और कुछ भी चिन्तन न करे। सम्बन्ध--पूर्वोक्त प्रकारसे निर्विकल्प स्थिति न हो तो क्या करे--इसके लिये आगेके श्लोकमें अभ्यास बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।6.24 6.25।।कामानां त्यागे (SN कामानामुपायत्यागे) उपायः संकल्पत्याग इत्याह संकल्पेति। शनैः शनैरिति। मनसैव न (S omit न) व्यापारोपरमेण। धृतिं गृहीत्वा क्रमात् क्रममभिलाषदुःखं प्रतनूकृत्य किंचिदपि विषयाणां त्यागग्रहणादिकं न चिन्तयेत्।यत्तु (S यथात्वन्यैर् यथा तु कैश्चिद्) अन्यैर्व्याख्यातम् नकिञ्चिदपि चिन्तयेत् इति तन्नास्मभ्यं रुचितम्। शून्यवादप्रसंगात्।।6.24 6.25।।कामानां त्यागे (SN कामानामुपायत्यागे) उपायः संकल्पत्याग इत्याह संकल्पेति। शनैः शनैरिति। मनसैव न (S omit न) व्यापारोपरमेण। धृतिं गृहीत्वा क्रमात् क्रममभिलाषदुःखं प्रतनूकृत्य किंचिदपि विषयाणां त्यागग्रहणादिकं न चिन्तयेत्।यत्तु (S यथात्वन्यैर् यथा तु कैश्चिद्) अन्यैर्व्याख्यातम् नकिञ्चिदपि चिन्तयेत् इति तन्नास्मभ्यं रुचितम्। शून्यवादप्रसंगात्।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
कामत्यागद्वारेणेन्द्रियाणि प्रत्याहृत्य किं कुर्यादिति शङ्कितारं प्रत्याह शनैः शनैरिति। सहसाविषयेभ्यः सकाशादुपरमे मनसो न स्वास्थ्यं संभवतीत्यभिप्रेत्याह न सहसेति। तत्र साधनं धैर्ययुक्ता बुद्धिरित्याह कयेत्यादिना। भूम्यादीरव्याकृतपर्यन्ताः प्रकृतीरष्ट पूर्वपूर्वत्र धारणं कृत्वोत्तरोत्तरक्रमेण प्रविलापयेदिति भावः। अव्यक्तमात्मनि प्रविलाप्यात्ममात्रनिष्ठं मनो विधाय चिन्तयितव्याभावादतिस्वस्थो भवेदित्याह आत्मेति। तत्र संस्थितिमेव मनसो विवृणोति आत्मैवेति। योगविधिमुपक्रम्य किमिदमुक्तमित्याशङ्क्याह एष इति। यन्मनसो नैश्चल्यमिति शेषः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवं कृत्वा किं कुर्यादित्यत आह शनैरिति। धृतिगृहीतया धैर्ययुक्तया बुद्य्धोपरमेन्मनस उपरतिं संपादयेत्। शनैः शनैः क्रमेण नतु सहसा। ननूपरतिं प्रापितमपि मनः पुनः पदार्थान्तरचिन्तरनेनोपरतिं हास्यतीत्याशङ्क्याह। आत्मसंस्थमात्मैव सर्वं न ततोऽन्यत् किंचिदस्तीत्येवमात्मसंस्थं मनः कृत्वा आत्मेतरवस्त्वभावान्न किंचिदपि चिन्तयेत्। मनसो मैश्चल्यस्य परमयोगावधित्वात्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
शनैःशनैरुपरमेद्बुद्ध्या इति बुद्धेरपीन्द्रियग्रामनियमने कारणत्वस्य वक्ष्यमाणत्वात् कथमेतदित्यत आह बुद्धेरिति। अनेनोपरमेदित्यस्यार्थद्वयमुक्तं भवति।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
बुद्धेः कारणत्वं मनोनिग्रहे आत्मरमणे च।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
भूमिकाजयक्रमेण शनैःशनैरुपरमेत्। धृतिर्धैर्यमखिन्नता तथा गृहीता या बुद्धिरवश्यकर्तव्यतानिश्चयरूपा तया यदा कदाचिदवश्यं भविष्यत्येव योगः किं त्वरयेत्येवंरूपया शनैःशनैर्गुरूपदिष्टामार्गेण मनो निरुन्ध्यात्। एतेनानिर्वेदनिश्चयौ प्रागुक्तौ दर्शितौ। तथाच श्रुतिःयच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानं महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि।। इति। वागिति वाचं लौकिकीं वैदिकीं च मनसि व्यापारवति नियच्छेत्।नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् इति श्रुतेः। वाग्वृत्तिनिरोधेन मनोवृत्तिमात्रशेषो भवेदित्यर्थः। चक्षुरादिनिरोधोऽप्येतस्यां भूमौ द्रष्टव्यः। मनसीति छान्दसं दैर्ध्यम्। तन्मनः कर्मेन्द्रियज्ञानेन्द्रियसहकारि नानाविधविकल्पसाधनं करणम्। ज्ञाने जानातीति ज्ञानमिति व्युत्पत्त्या ज्ञातर्यात्मनि ज्ञातृत्वोपाधावहंकारे नियच्छेत् मनोव्यापारान्परित्यज्याहंकारमात्रं परिशेषयेत्। तच्च ज्ञानं ज्ञातृत्वोपाधिमहंकारमात्मनि महति महत्तत्त्वे सर्वव्यापके नियच्छेत्। द्विविधो ह्यहंकारो विशेषरूपः सामान्यरूपश्चेति। अयमहमेतस्य पुत्र इत्येवं व्यक्तमभिमन्यमानो विशेषरूपो व्यष्ट्यहंकारः। अस्मीत्येतावन्मात्रभिमन्यमानः सामान्यरूपः समष्ट्यहंकारः। स च हिरण्यगर्भो महानात्मेति च सर्वानुस्यूतत्वादुच्यते। ताभ्यामहंकारभ्यां विविक्तो निरुपाधिकः शान्तात्मा सर्वान्तरश्चिदेकरसस्तस्मिन्महान्तमात्मानं समष्टिबुद्धिं नियच्छेत्। एवं तत्कारणमव्यक्तमपि नियच्छेत्। ततो निरुपाधिकस्त्वंपदलक्ष्यः शुद्ध आत्मा साक्षात्कृतो भवति। शुद्धे हि चिदेकरसे प्रत्यगात्मनि जडशक्तिरूपमनिर्वाच्यमव्यक्तं प्रकृतिरुपाधिः। सा च प्रथमं सामान्याहंकाररूपं महत्तत्वं नाम धृत्वा व्यक्तीभवति। ततो बहिर्विशेषाहंकारूपेण ततो बहिर्मनोरूपेण ततो बहिर्वागादीन्द्रियरूपेण। तदेतच्छ्रत्याभिहितंइन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः।।महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः।। इति। तत्र गवादिष्विव वाङ्निरोधः प्रथमा भूमिः।।बालमुग्धादिष्विव निर्मनस्त्वं द्वितीया। तन्द्र्यमिवाहंकारराहित्यं तृतीया। सुषुप्ताविव महत्तत्त्वराहित्यं चतुर्थी। तदेतद्भूमिचतुष्टयमपेक्ष्य शनैःशनैःरुपरमेदित्युक्तम्। यद्यपि महत्तत्त्वशान्तात्मनोर्मध्ये महत्तत्त्वोपादानमव्याकृताख्यं तत्त्वं श्रुत्योदाहारि तथापि तत्र महत्तत्त्वस्य नियमनं नाभ्यधायि। सुषुप्ताविव जीवस्वरूपस्यसता सोम्य तदा संपन्नो भवति इति श्रुतेः स्वरूपलयप्रसङ्गात्। तस्य च कर्मक्षये सति पुरुषप्रयत्नमन्तरेण स्वतएव सिद्धत्वात्तत्त्वदर्शनानुपयोगित्वाच्चदृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः इति पूर्वमभिधाय सूक्ष्मत्वसिद्धये निरोधसमाधेरभिधानात्। सच तत्त्वदिदृक्षोर्दर्शनसाधनत्वेन दृष्टतत्त्वस्य च जीवन्मुक्तिरूपक्लेशक्षयायापेक्षितः। ननु शान्तात्मन्यवरुद्धस्य चित्तस्य वृत्तिरहितत्वेन सुषुप्तिवदर्शनहेतुत्वमिति चेत्। न। स्वतःसिद्धस्य दर्शनस्य निवारयितुमशक्यत्वात्। तदुक्तम्आत्मानात्माकारं स्वभावतोऽवस्थितं सदा चित्तम्। आत्मैकाकारतया तिरस्कृतानात्मदृष्टि विदधीत।। यथा घट उत्पद्यमानः स्वतो वियत्पूर्ण एवोत्पद्यते। जलतण्डुलादिपूरणं तूत्पन्ने घटे पश्चात्पुरुषप्रयत्नेन भवति। तत्र जलादौ निःसारितेऽपि वियन्निःसारयितुं न शक्यते। मुखपिधानेऽप्यन्तर्वियदवतिष्ठत एव तथा चित्तमुत्पद्यमानं चैतन्यपूर्णमेवोत्पद्यते। उत्पन्ने तु तस्मिन्मूषानिषिक्तद्रुतताम्रवद्धटदुःखादिरूपत्वं भोगहेतुधर्माधर्मसहकृतसामग्रीवशाद्भवति। तत्र घटदुःखाद्यनात्माकारे विरामप्रत्ययाभ्यासेन निवारितेऽपि निर्निमित्तश्चिदाकारो वारयितुं न शक्यते। ततो निरोधसमाधिना निर्वृत्तिकेन चित्तेन संस्कारमात्रशेषतयातिसूक्ष्मत्वेन निरुपाधिकचिदात्ममात्राभिमुखत्वाद्वृत्तिं विनैव निर्विघ्नमात्मानुभूयते। तदेतदाहआत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् इति। आत्मनि निरुपाधिके प्रतीचि संस्था समाप्तिर्यस्य तदात्मसंस्थं सर्वप्रकारवृत्तिशून्यं स्वभावसिद्धात्माकारमात्रविशिष्टं मनः कृत्वा धृतिगृहीतया विवेकबुद्ध्या संपाद्यासंप्रघातसमाधिस्थः सन् किंचिदपि अनात्मानमात्मानं वा न चिन्तयेन्न वृत्त्या विषयीकुर्यात्। अनात्माकारवृत्तौ हि व्युत्थानमेव स्यात्। आत्माकारवृत्तौ च संप्रज्ञातः समाधिरित्यसंप्रज्ञातसमाधिस्थैर्याय कामपि चित्तवृत्तिं नोत्पादयेदित्यर्थः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
शनैः शनैरिति। भूमिकाजयक्रमेण दिव्यादिव्यविषयेभ्य उपरमेद्वव्यावृत्तो भवेत्। कथम्। धृतिगृहीतया बुद्ध्येति। धृतिःधृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्विकी इत्युक्तलक्षणा तया गृहीतया वशीकृतया बुद्ध्योपरमेत्। तथा एवमुपरतं मनः आत्मनि स्वरूपे संस्था स्थितिर्यस्य न तु दृश्ये द्रष्टरि वा तत्तथा आत्मैकाकारमेकाग्रमित्यर्थः। द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थंसर्वार्थतैकार्थतयोः क्षयोदयौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः इति सूत्रितमैकाग्र्यं प्रापयेत्। सूत्रार्थस्तु अहमिदं पश्यामीत्यनुभवे हि द्रष्टा दृश्यं दर्शनं च भासते। तत्र दर्शनभानमप्रत्याख्येयमतो द्रष्टरि दृश्ये चोपरक्तं चित्तं सवार्थमिति। न तु दर्शनोपरक्ततापि सर्वार्थतायां गणिता। तदभावे चित्तस्य नाशापत्तेः। द्रष्टृदृश्योपरागाभावे तु एकार्थं तदुच्यते यथा स्वप्ने। तत्र हि दृश्यं नास्तीति पामराणामपि प्रसिद्धम्। द्रष्टापि नास्ति। तदा इन्द्रियाणामभावात्।आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्ता इतिश्रुत्यैव भोक्तृत्वस्येन्द्रियसंनियोगशिष्टत्वात्। किंतु द्रष्टृदृश्यवासनावासितं चित्रपटसदृशमेकं मन एवास्ति। तच्च स्वयंज्योतिषा पुरुषेण भास्यमानं जाग्रद्वत्स्वप्नेऽपि द्रष्टृदृश्योपरागं प्रकाशयति। तद्वासनावासितत्वात्। एवं सति यदा सर्वार्थतायाः क्षय एकार्थताया उदयश्च तदा चित्तस्यैकाग्रतारूपः परिणामो भवतीति। तदेवमात्मसंस्थं मनः कृत्वेति संप्रज्ञातसमाधिरुक्तः। तत्रापि पूर्वाभ्यासवशाच्चित्तस्य द्रष्टृदृश्योपरागो वासनामयो भातीति तन्निवारणेनासंप्रज्ञातसमाधिमाह न किंचिदपि चिन्तयेदिति। ध्यातृध्यानध्येयविभागमपि न स्मरेत्किंतु अखण्डैकरससंविदात्मना सुषुप्तवत्तिष्ठेदित्यर्थः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
ननु कथमिन्द्रियग्रामं विनियच्छेदित्यपेक्षयामाह शनैः शनैरिति। धृतिगृहीतया वियोगतापादिदुःखसहनशीलधैर्यगृहीतया बुद्ध्या मनः आत्मसंस्थं भावात्मकस्थितं कृत्वा शनैःशनैरुपरमेत् स्वभोगरूपेभ्य उपशमयेत्। कथमुपरतिर्भवेदित्यत आह न किञ्चिदपि चिन्तयेदिति। भावात्मकस्वरूपातिरिक्तं किञ्चिदपि न चिन्तयेन्न भावयेत्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
स्पर्शजाः सङ्कल्पजाश्च इति द्विविधाः कामाः स्पर्शजाः शीतोष्णादयः सङ्कल्पजाः पुत्रपौत्रक्षेत्रादयः तत्र सङ्कल्पप्रभवाः स्वरूपेण एव त्यक्तुं शक्याः तान् सर्वान् मनसा एव तदनन्वयानुसन्धानेन त्यक्त्वा स्पर्शजेषु अवर्जनीयेषु तन्निमित्तहर्षो द्वेगौ त्यक्त्वा समन्ततः सर्वस्माद् विषयात् सर्वम् इन्द्रियग्रामं विनियम्य शनैः शनैः धृतिगृहीतया विवेकविषयया बुद्ध्या सर्वस्माद् आत्मव्यतिरिक्ताद् उपरम्य आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिद् अपि चिन्तयेत्।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
शनैः शनैः न सहसा उपरमेत् उपरतिं कुर्यात्। कया बुद्ध्या। किंविशिष्टया धृतिगृहीतया धृत्या धैर्येण गृहीतया धृतिगृहीतया धैर्येण युक्तया इत्यर्थः। आत्मसंस्थम् आत्मनि संस्थितम् आत्मैव सर्वं न ततोऽन्यत् किञ्चिदस्ति इत्येवमात्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्। एष योगस्य परमो विधिः।।तत्र एवमात्मसंस्थं मनः कर्तुं प्रवृत्तो योगी
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
यदि तु प्राक्तनकर्मसंस्कारेण मनो विचलेत्तर्हि धारणया स्थिरीकुर्यादित्याह शनैरिति। धृतिर्धारणा तया गृहीतया वशीकृतया बुद्ध्यात्मसंस्थमात्मन्येव सम्यक् स्थितं निश्चलं मनः कृत्वोपरमेत्। तच्च शनैःशनैरभ्यासक्रमेण नतु सहसा। उपरमस्वरूपमाह। न किंचिदपि चिन्तयेत्। निश्चले मनसि स्वयमेव प्रकाशमानपरमानन्दस्वरूपो भूत्वात्मध्यानादपि न निवर्तेतेत्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।6.22 6.25।।तदेव विशिनष्टि यं लब्ध्वेति। एतेनेष्टप्राप्त्यनिष्टनिवृत्तिफलको योगः समन्वितःतं विद्यात् ৷৷. योगसंज्ञितं दुःखसंयोगेन वियोग एव योग इति विरुद्धलक्षणया उच्यते। यस्मादेवं महाफलो योगस्तस्मात्स एव यत्नोऽभ्यसनीयः इत्याह सार्धेन। स निश्चयेनेति यत्नेन।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
।। 6.25 अथ ममकारपरित्यागादिकं प्राग्विप्रकीर्णोक्तमखिलमिदानीं सुखग्रहणायेह सौकर्यप्रदर्शनाय च सङ्कलय्य योगदशापर्यन्ततया स्मार्यतेसङ्कल्प इत्यादिभिः श्लोकैः।सङ्कल्पप्रभवान् सर्वान् कामांस्त्यक्त्वा इत्येतावतैव सिद्धौ पुनःअशेषतः इति पदं निश्शेषत्यागानर्हाणां विषयाणां सूचकम्। न चोत्तरवाक्ये तदन्वयः ग्रामशब्देन पर्याप्तत्वात्। अतः प्रयुक्तपदवैयर्थ्यपरिहारायअशेषतश्च कामांस्त्यक्त्वा इति चकाराभावेऽपि योज्यम्। अपि च सङ्कल्पप्रभवत्वेन विशेषणमेव असङ्कल्पप्रभवकामसूचकमित्यभिप्रायेण विभजते स्पर्शजा इति।मनसैव इति पदं मध्यस्थितत्वादपेक्षितत्वाच्च काकाक्षिन्यायेन पूर्वोत्तरान्वितमिति दर्शयितुंतान् सर्वान् मनसैवेत्यादिकमुक्तम्। कामत्यागकरणस्य मनसोऽवान्तरव्यापारतदनन्वयानुसन्धानम् कर्मोपाधिकशरीरान्विता हि पुत्रादयः न त्वात्मस्वरूपान्विता इत्यनुसन्धानेनेत्यर्थः।न प्रहृष्येत् 5।20 इत्यादिभिः प्रागेवोक्तं स्मारयतिस्पर्शजेष्वित्यादिना।समन्ततः इत्यत्र पदच्छेदादिभ्रमव्युदासायाह सर्वस्माद्विषयादिति। प्रक्रान्तादशिथिलत्वरूपाया धृतेर्हेतुमाहविवेकविषययेति। उपरम्य बाह्यालाभार्थं मानसमुद्योगं वारयित्वेत्यर्थः। उपरम्येति व्याख्यानमङ्गत्वद्योतनाय।किञ्चिदपीति आत्मव्यतिरिक्तमनुकूलप्रतिकूलोदासीनं सर्वमित्यर्थः।