श्लोक · Shlok 38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति | अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥
kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati. apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi.
Translation · अर्थ
English
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Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
There are two ways to progress. Those who are materialists have no interest in transcendence; therefore they are more interested in material advancement by economic development, or in promotion to the higher planets by appropriate work. When one takes to the path of transcendence, one has to cease all material activities and sacrifice all forms of so-called material happiness. If the aspiring transcendentalist fails, then he apparently loses both ways; in other words, he can enjoy neither material happiness nor spiritual success. He has no position; he is like a riven cloud. A cloud in the sky sometimes deviates from a small cloud and joins a big one. But if it cannot join a big one, then it is blown away by the wind and becomes a nonentity in the vast sky. The brahmaṇaḥ pathi is the path of transcendental realization through knowing oneself to be spiritual in essence, part and parcel of the Supreme Lord, who is manifested as Brahman, Paramātmā and Bhagavān. Lord Śrī Kṛṣṇa is the fullest manifestation of the Supreme Absolute Truth, and therefore one who is surrendered to the Supreme Person is a successful transcendentalist. To reach this goal of life through Brahman and Paramātmā realization takes many, many births ( bahūnāṁ janmanām ante ). Therefore the supermost path of transcendental realization is bhakti-yoga, or Kṛṣṇa consciousness, the direct method.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
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Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
सम्भव है कि ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग पर चलता हुआ कोई श्रद्धावान् साधक मृत्यु का ग्रास बन जाए अथवा पर्याप्त संयम के अभाव में योग से पतित हो जाए। उसके पतन को दर्शाने के लिए जो अत्यन्त उपयुक्त और प्रभावोत्पादक दृष्टान्त अर्जुन के मुख से महर्षि व्यासजी ने दिया है उसे प्राय साहित्यिक क्षेत्र में उद्धृत किया जाता है।कभीकभी ग्रीष्म ऋतु में पर्वतों के पार्श्व भाग से कोई छत्रवत् मेघमालिका ऊर्ध्वदिशा में उठती हुई दृष्टिगोचर होती है। परन्तु तीव्र वेग से प्रवाहित वायु के स्पर्श से वह मेघ खण्ड अनेक छोटेछोटे मेघखण्डों में विभक्त हो जाता है। ये मेघखण्ड पूर्णतया प्रबल वायु की दया पर आश्रित इतस्तत लक्ष्यहीन भ्रमण करते रहते हैं। ग्रीष्म ऋतु के ये मेघ न कृषकों की अपेक्षाएं पूर्ण कर सकते हैं और न तृषितों की पिपासा को ही शान्त कर सकते हैं। किसी सुरक्षित स्थान को न प्राप्त कर अन्त में वे स्वयं भी नष्ट हो जाते है। अर्जुन का प्रश्न है कि क्या योगभ्रष्ट पुरुष की गति भी उस मेघ के समान ही नहीं होगीअर्जुन यह प्रश्न क्यों पूछता है वह स्वयं ही इसका कारण बताता है
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--[अर्जुनने पूर्वोक्त श्लोकमें कां गतिं कृष्ण गच्छति कहकर जो बात पूछी थी, उसीका इस श्लोकमें खुलासा पूछते हैं।]'अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि'--वह सांसारिक प्रतिष्ठा-(स्थिति-) से तो जानकर रहित हुआ है अर्थात् उसने संसारके सुख-आराम, आदर-सत्कार, यश-प्रतिष्ठा आदिकी कामना छोड़ दी है, इनको प्राप्त करनेका उसका उद्देश्य ही नहीं रहा है। इस तरह संसारका आश्रय छोड़कर वह परमात्मप्राप्तिके मार्गपर चला; पर जीवित-अवस्थामें परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई और अन्त-समयमें साधनसे विचलित हो गया अर्थात् परमात्माकी स्मृति नहीं रही।'कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति'--ऐसा वह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ अर्थात् सांसारिक और पारमार्थिक--दोनों उन्नतियोंसे रहित हुआ साधक छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? तात्पर्य है कि जैसे किसी बादलके टुकड़ेने अपने बादलको तो छोड़ दिया और दूसरे बादलतक वह पहुँचा नहीं, वायुके कारण बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो गया। ऐसे ही साधकने संसारके आश्रयको तो छोड़ दिया और अन्त-समयमें परमात्माकी स्मृति नहीं रही, फिर वह नष्ट तो नहीं हो जाता? उसका पतन तो नहीं हो जाता?बादलका दृष्टान्त यहाँ पूरा नहीं बैठता। कारण कि वह बादलका टुकड़ा जिस बादलसे चला, वह बादल और जिसके पास जा रहा था, वह बादल तथा वह स्वयं (बादलका टुकड़ा)--ये तीनों एक ही जातिके हैं अर्थात् तीनों ही जड़ हैं। परन्तु जिस साधकने संसारको छोड़ा, वह संसार और जिसकी प्राप्तिके लिये चला वह परमात्मा तथा वह स्वयं (साधक)--ये तीनों एक जातिके नहीं हैं। इन तीनोंमें संसार जड़ है और परमात्मा तथा स्वयं चेतन हैं। इसलिये 'पहला आश्रय छोड़ दिया और दूसरा प्राप्त नहीं हुआ'--इस विषयमें ही उपर्युक्त दृष्टान्त ठीक बैठता है।इस श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका आशय यह है कि साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे जीवका अभाव तो कभी हो ही नहीं सकता। अगर इसके भीतर संसारका उद्देश्य होता, संसारका आश्रय होता, तो यह स्वर्ग आदि लोकोंमें अथवा नरकोंमें तथा पशु-पक्षी आदि आसुरी योनियोंमें चला जाता, पर रहता तो संसारमें ही है। उसने संसारका आश्रय छोड़ दिया और उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति हो गया, पर प्राणोंके रहते-रहते परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई और अन्तकालमें किसी कारणसे उस उद्देश्यके अनुसार साधनमें स्थिति भी नहीं रही, परमात्मचिन्तन भी नहीं रहा, तो वह वहाँसे भी भ्रष्ट हो गया। ऐसा साधक किस गतिको जायगा? विशेष बात अगर इस श्लोकमें 'परमात्माकी प्राप्तिसे और साधनसे भ्रष्ट (च्युत) हुआ'--ऐसा अर्थ लिया जाय, तो ऐसा कहना यहाँ बन ही नहीं सकता। कारण कि आगे जो बादलका दृष्टान्त दिया है, वह उपर्युक्त अर्थके साथ ठीक नहीं बैठता। बादलका टुकड़ा एक बादलको छोड़कर दूसरे बादलकी तरफ चला, पर दूसरे बादलतक पहुँचनेसे पहले बीचमें ही वायुसे छिन्न-भिन्न हो गया। इस दृष्टान्तमें स्वयं बादलके टुकड़ेने ही पहले बादलको छोड़ा है अर्थात् अपनी पहली स्थितिको छोड़ा है और आगे दूसरे बादलतक पहुँचा नहीं, तभी वह उभयभ्रष्ट हुआ है। परन्तु साधकको तो अभी परमात्माकी प्राप्ति हुई ही नहीं, फिर उसको परमात्माकी प्राप्तिसे भ्रष्ट (च्युत) होना कैसे कहा जाय?दूसरी बात, साध्यकी प्राप्ति होनेपर साधक साध्यसे कभी च्युत हो ही नहीं सकता अर्थात् किसी भी परिस्थितिमें वह साध्यसे अलग नहीं हो सकता, उसको छोड़ नहीं सकता। अतः उसको साध्यसे च्युत कहना बनता ही नहीं। हाँ, अन्तसमयमें स्थिति न रहनेसे, परमात्माकी स्मृति न रहनेसे उसको 'साधनभ्रष्ट' तो कह सकते हैं, पर 'उभयभ्रष्ट' नहीं कह सकते। अतः यहाँ बादलके दृष्टान्तके अनुसार वही उभयभ्रष्ट लेना युक्तिसंगत बैठता है, जिसने संसारके आश्रयको जानकर ही अपनी ओरसे छोड़ दिया और परमात्माकी प्राप्तिके लिये चला, पर अन्तसमयमें किसी कारणसे परमात्माकी याद नहीं रही, साधनसे विचलितमना हो गया। इस तरह संसार और साधन--दोनोंमें उसकी स्थिति न रहनसे ही वह उभयभ्रष्ट हुआ है। अर्जुनने भी सैंतीसवें श्लोकमें 'योगाच्चलितमानसः' कहा है और इस (अड़तीसवें) श्लोकमें 'अप्रतिष्ठः विमूढो ब्रह्मणः पथि' और 'छिन्नाभ्रमिव' कहा है। इसका तात्पर्य यही है कि उसने संसारको छोड़ दिया और परमात्माकी प्राप्तिके साधनसे विचलित हो गया, मोहित हो गया। सम्बन्ध--पूर्वोक्त सन्देहको दूर करनेके लिये अर्जुन आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।6.37 6.39।।अयतः इत्यादि नह्युपपद्यते इत्यन्तम्। प्राप्ताद्योगात् यदि ( N यस्य instead यदि) चलितेऽपि चित्ते श्रद्धा न हीयते। विनष्टश्रद्धौ हि सिद्धयोगोऽपि सर्वं निष्फलं कुरुते। उक्तं हि यदा प्राप्यापि विज्ञानं दूषितं चित्तविभ्रमात्।तदैव ( तदैवम्) ध्वंसते शीघ्र तूलराशिवानलात्।।योगस्य सम्यक् सिद्धौ अजातायां किं लोकान्निष्क्रान्तः सम्यक् च ब्रह्मणि न निलीन (K न लीन इति) इति नश्येत् अथवा ब्रह्मणि अप्रतिष्ठितत्वात् विनश्यति परलोकबाधाय इति प्रश्नः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
प्रश्नमेव विवृणोति कच्चिदिति। प्रशस्तप्रश्नार्थत्वं कच्चिदित्यस्याङ्गीकृत्य व्याचष्टे किमिति। उभयविभ्रष्टत्वं स्पष्टयति कर्मेत्यादिना। वायुना छिन्नं विशकलितमभ्रं यथा नश्यति तद्वदित्याह छिन्नेति। नाशाशङ्कानिमित्तमाह निराश्रय इति। कर्ममार्गरूपावष्टम्भाभावेऽपि ज्ञानमार्गावष्टम्भस्तस्य भविष्यतीत्याशङ्क्याह विमूढः सन्निति। नहि कर्मिणं प्रतीयमाशङ्का युक्ताभिलाषं त्यक्त्वेश्वरे समर्प्या समर्प्य वा कर्मानुतिष्ठतो निरुपचारेण तद्भ्रंशवचनासंभवात्सर्वकर्मसंन्यासिनस्तु विहितानां त्यागाज्ज्ञानोपायाच्चविच्युतेरनर्थप्राप्तिशङ्का युक्तेति भावः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
स्वाशयं स्फटयति कच्चिदिति प्रश्ने। उभयविभ्रष्टः सर्वकर्मणां त्यागात् कर्ममार्गात् सभ्यग्दर्शनालाभाद्योगाच्च विभ्रष्टः स किं नश्यत्युत न नश्यति।थ उभयविभ्रष्टत्वमेव दर्शयति द्वाभ्यां विशेषणाभ्याम्। अप्रतिष्ठो निराश्रयः कर्ममार्गरुपाश्रयरहितः। ब्रह्मणः पथि ब्रह्मप्राप्तिमार्गे विमूढः ज्ञानमार्गावष्टम्भशून्यः। उभयविभ्रष्टस्य नाशे दृष्टान्तमाह। छिन्नभ्रमिव यथा पूर्वस्मादभ्राद्विच्छिनोऽभ्रैकदेशः परमप्तिमार्गे विमूढः ज्ञानमार्गावष्टम्भशून्यः। उभयविभ्रष्टस्य नाशे दृष्टान्माह। छिन्नाभ्रमिव यथा पूर्वस्मादभ्राद्विच्छिनोऽभ्रैकदेशः परमभ्रमप्राप्य मध्य एवनश्यति तद्वत्। महाबाहो इतिसंबोधयन् भक्तोद्धारणसमर्थैरति प्रबलैर्बाहुभिर्युक्ते त्वयि सति तस्य नाशो न युक्त इति द्योतयति। यत्तु प्रश्नमेव विवृणोति। कश्चिदितिकिमित्यस्मिन्नर्थे। नश्यति नरकं प्राप्नोति। किंवा तस्य गत्यन्तरमस्तीति किमापेक्षितं पक्षान्तरं पूरणीयम्। ननु नरकपातान्तस्तस्य को वापराध इत्याशङ्क्याह ब्रह्मणः पथि विमूढ इति। ननु कृतानां काम्यकर्मणां तथा चित्तशुद्य्धर्थमनुष्ठितानामावश्यककर्मणां फलं प्राप्स्यति कुतोऽस्य नरकप्राप्तिरित्याशङ्क्याहउयविभ्रष्ट इति। कृतौरावश्यककर्मबिश्चित्तशुद्धौ जातायामपि तदुपेयमोचकज्ञानपरिभिश्चित्तशुद्धौ जातायामपि तदुपेयमोचकज्ञानपरिभ्रष्टः किमन्यतेषामावश्यकर्कणां फलं प्राप्नुयात् तथा स्वात्मानं कर्तृत्वादिरहितं कर्मण्यनधिकारिणं निश्चित्य ब्रह्मार्पणं ब्रह्मविरित्याद्युक्तमार्गेण शुद्य्धार्थ कर्माचरणात् कथं वा कर्मण्यधिकारी स्यादित्युभयविभ्रष्टपदस्यार्थः। ननु किमित्येवं ब्रह्मणः पथि तस्य विमूढतेत्यत उक्तमप्रतिष्ठ इति। प्रतिष्ठा क्षुद्र पुरुषार्थपरित्यागेन परमार्थशक्तिलक्षणा तद्रहित इत्यर्थ इतीतरैःस कल्पितं तदसत्। काम्यकर्मणां फलस्यावश्यंभावेनोभयभ्रष्टत्वाभावात् तथा स्वात्मानमित्यादेः किं मम मोक्षेण काम्यादीनेव तत्तल्लोकप्राप्तये करिष्यामीति स्वपूर्वग्रन्थविरुद्धत्वात्। नहि काम्यकर्ममार्गे प्रवृत्तस्ततो भ्रष्ट इति शङ्कितुं शक्यते अतः संन्यातीति भाष्यटीकायामुक्त्त्वाच्च। एतेनाप्रतिष्ठशब्दार्थो.़पि प्रत्युक्तः। विमूढो ब्रह्मणः पथीत्यनेनैव परमपुरुषार्थाशक्तेरुक्तत्वात्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
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Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
।।6.37 6.39।।अयतिरप्रयत्नः।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
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Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
कच्चिदिति। कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः कर्ममार्गाद्योगमार्गाच्च विभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव पूर्वमपरं वा मेघसंघमप्राप्य मध्ये एव नश्यति तद्वत्। अप्रतिष्ठो निराश्रयः। हे महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ब्रह्मप्राप्तिमार्गे।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
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Sri RamanujaSanskrit Commentary+
उभयविभ्रष्टः अयं छिन्नाभ्रम् इव कच्चित् न नश्यति यथा मेघशकलः पूर्वस्मात् महतो मेघात् छिन्नः परं महान्तं मेघम् अप्राप्य मध्ये विनष्टो भवति तथा एव कच्चित् न नश्यति कथम् उभयविभ्रष्टता अप्रतिष्ठो विमूढो ब्रह्मणः पथि इति यथावस्थितं स्वर्गादिसाधनभूतं कर्म फलाभिसन्धिरहितस्य अस्य पुरुषस्य स्वफलसाधनत्वेन प्रतिष्ठा न भवति इति अप्रतिष्ठः। प्रक्रान्ते ब्रह्मणः पथि विमूढः तस्मात् पथः प्रच्युतः अतउभयभ्रष्टतया किम् अयं नश्यति एव उत न नश्यति।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
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Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
प्रश्नाभिप्रायं विवृणोति कच्चिदिति। कर्मणामीश्वरार्पितत्वादननुष्ठानाच्च न तावत्कर्मफलं स्वर्गादिकं प्राप्नोति योगानिष्पत्तेश्च न मोक्षं प्राप्नोति एवमुभयस्माद्भ्रष्टोऽप्रतिष्ठो निराश्रयः अतएव ब्रह्मणः प्राप्त्युपाये पथि मार्गे विमूढः सन्कच्चित्किं न नश्यति किंवा नश्यतीत्यर्थः। नाशे दृष्टान्तःयथा छिन्नमभ्रं पूर्वस्मादभ्राद्विश्लिष्टमभ्रान्तरं चाप्राप्तं सन्मध्य एव विलीयते तद्वदित्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
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Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
।। 6.38 एवं प्रागुक्तमेव योगसाधनं यथावच्छ्रुतम् अथ प्रागुक्तमेव योगमाहात्म्यं श्रोतव्यं सर्वप्रकारान्वितं प्रपञ्चेन श्रोतुं पृच्छतीत्याह अथेति। योगमाहात्म्यशब्देन सङ्ग्रहश्लोकस्थयोगसिद्धिशब्दो व्याख्यातः। सिद्धिकारणं हि माहात्म्यम् सिद्धिश्चात्र शिथिलस्यापि योगस्य चिरतरमनेकपुण्यलोकावाप्तिः पुनर्योगयोग्ययोगिकुलसम्भवः तद्द्वारा पुनर्योगपौष्कल्यं ततश्चापवर्ग इत्येवंरूपा। एषा च सिद्धिः अनितरसाधारणेन माहात्म्येन। ननुनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति 2।40 इत्यादौ कर्मयोगस्य माहात्म्यमुक्तम् अत्र तु तत्फलभूतस्यात्मावलोकनरूपयोगस्य अतः कथं श्रुतमित्युक्तम् तत्राहअन्तर्गतेति। ततः किमित्यत्राहतच्चेति। योगाङ्कुरभूतात्मज्ञानगर्भतया पुष्कलयोगस्वरूपसाधनतया च हि कर्मयोगस्य माहात्स्यं तत्रोदितम् ततश्च योगोपाधिके तदङ्गभूतकर्मयोगमाहात्म्येऽभिहिते अङ्गीभूतयोगमाहात्म्यमेवोक्तं भवतीति भावः।अयतिः इत्यादिपदानामर्थौचित्यात् क्रमभेदेन अन्वयो दर्शितः। तत्र प्रवृत्तस्य हि ततश्चलितत्वं वाच्यम् नतु तत्र श्रद्धोपेतमात्रस्येति अतः श्रद्धया तत्कार्यलक्षणेत्यभिप्रायेणयोगे प्रवृत्त इत्युक्तम्। उपेतशब्द एव वाऽत्र श्रद्धाकृतयोगाधिगमपर इत्यभिप्रायः।योगसंसिद्धिमप्राप्य योगसिद्धेः पूर्वमेवेत्यर्थः।योगाच्चलितमानसः पुष्कलयोगं कर्तुमननुगुणचित्त इत्यर्थः। कामभोगमोक्षनिरयेषु कतमामित्यर्थः।कां गतिं गच्छति इति सामान्यनिर्दिष्टमेवकच्चित् इत्यादिना विवृतम्।दृष्टान्तेऽप्युभयभ्रष्टत्वप्रकारं दर्शयतियथेति। उभयभ्रष्टताविवरणरूपत्वात्विमूढो ब्रह्मणः पथि इत्येकस्याभिधानाच्च पारिशेष्यादप्रतिष्ठपदं सांसारिकफलसाधनकर्मभ्रंशाभिप्रायमित्याहयथावस्थितमिति। कर्मस्वरूपानुष्ठानप्रयासादौ न किञ्चिन्न्यूनम् अभिसन्धिवैषम्यात्तु निष्फलं संवृत्तमित्यभिप्रायः।विमूढो ब्रह्मणः पथि इति ब्रह्मपथे अज्ञानं न विवक्षितम् ज्ञात्वोपक्रम्य निवृत्तं प्रति पृच्छ्यमानत्वात्। अतो विमोहकार्ययोगनिवृत्तिरत्र विमूढशब्देन लक्ष्यत इत्यभिप्रायेणप्रक्रान्त इत्यादिप्रच्युत इत्यन्तमुक्तम्।ब्रह्मणः पथि ब्रह्मप्राप्त्युपायभूते योग इत्यर्थः।एतं मे संशयम् इति निर्दिश्यमानस्य संशयस्यार्थसिद्धं शिरोन्तरमाहकिमयं नश्यत्येवेति। अर्हसि सर्वज्ञत्वकारुणिकत्वप्रियसखत्वादियुक्तस्त्वं योग्योऽसीत्यर्थः।कृष्णशब्देन त्वच्छब्देन चाभिप्रेतमाह स्वत इति। करणाधीनम् अविशदानुमानादिप्रायं क्रमभावि कतिपयविषयं कादाचित्कमपि हि त्वदन्येषां ज्ञानमिति भावः। एतेनयो वेत्ति युगपत्सर्वं प्रत्यक्षेण सदा स्वतः। तं प्रणम्य हरिं शास्त्रं न्यायतत्त्वं प्रचक्ष्महे न्या.त. इति तु भगवन्नाथमुनिमिश्राणां वचनमनुसंहितम्।न ह्युपपद्यत इति युक्तिविरोधोऽभिप्रेतः।