श्लोक · Shlok 2
श्रीभगवानुवाच | संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ | तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥
śrībhagavānuvāca. saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau. tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate.
Translation · अर्थ
English
The Blessed Lord said Renunciation and the Yoga of action both lead to the highest bliss; but of the two, the Yoga of action is superior to the renunciation of action.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
Fruitive activities (seeking sense gratification) are cause for material bondage. As long as one is engaged in activities aimed at improving the standard of bodily comfort, one is sure to transmigrate to different types of bodies, thereby continuing material bondage perpetually. Śrīmad-Bhāgavatam (5.5.4–6) confirms this as follows: nūnaṁ pramattaḥ kurute vikarma yad indriya-prītaya āpṛṇoti na sādhu manye yata ātmano ’yam asann api kleśa-da āsa dehaḥ parābhavas tāvad abodha-jāto yāvan na jijñāsata ātma-tattvam yāvat kriyās tāvad idaṁ mano vai karmātmakaṁ yena śarīra-bandhaḥ evaṁ manaḥ karma-vaśaṁ prayuṅkte avidyayātmany upadhīyamāne prītir na yāvan mayi vāsudeve na mucyate deha-yogena tāvat “People are mad after sense gratification, and they do not know that this present body, which is full of miseries, is a result of one’s fruitive activities in the past. Although this body is temporary, it is always giving one trouble in many ways. Therefore, to act for sense gratification is not good. One is considered to be a failure in life as long as he makes no inquiry about his real identity. As long as he does not know his real identity, he has to work for fruitive results for sense gratification, and as long as one is engrossed in the consciousness of sense gratification one has to transmigrate from one body to another. Although the mind may be engrossed in fruitive activities and influenced by ignorance, one must develop a love for devotional service to Vāsudeva. Only then can one have the opportunity to get out of the bondage of material existence.” Therefore, jñāna (or knowledge that one is not this material body but spirit soul) is not sufficient for liberation. One has to act in the status of spirit soul, otherwise there is no escape from material bondage. Action in Kṛṣṇa consciousness is not, however, action on the fruitive platform. Activities performed in full knowledge strengthen one’s advancement in real knowledge. Without Kṛṣṇa consciousness, mere renunciation of fruitive activities does not actually purify the heart of a conditioned soul. As long as the heart is not purified, one has to work on the fruitive platform. But action in Kṛṣṇa consciousness automatically helps one escape the result of fruitive action so that one need not descend to the material platform. Therefore action in Kṛṣṇa consciousness is always superior to renunciation, which always entails a risk of falling. Renunciation without Kṛṣṇa consciousness is incomplete, as is confirmed by Śrīla Rūpa Gosvāmī in his Bhakti-rasāmṛta-sindhu (1.2.258): prāpañcikatayā buddhyā hari-sambandhi-vastunaḥ mumukṣubhiḥ parityāgo vairāgyaṁ phalgu kathyate “When persons eager to achieve liberation renounce things related to the Supreme Personality of Godhead, thinking them to be material, their renunciation is called incomplete.” Renunciation is complete when it is in the knowledge that everything in existence belongs to the Lord and that no one should claim proprietorship over anything. One should understand that, factually, nothing belongs to anyone. Then where is the question of renunciation? One who knows that everything is Kṛṣṇa’s property is always situated in renunciation. Since everything belongs to Kṛṣṇa, everything should be employed in the service of Kṛṣṇa. This perfect form of action in Kṛṣṇa consciousness is far better than any amount of artificial renunciation by a sannyāsī of the Māyāvādī school.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
संन्यासः renunciation? कर्मयोगः Yoga of action? च and? निःश्रेयसकरौ leading to the highest bliss? उभौ both? तयोः of these two? तु but? कर्मसंन्यासात् than renunciation of action? कर्मयोगः Yoga of action? विशिष्यते is superior.Commentary Sannyasa (renunciation of action) and Karma Yoga (performance of action) both lead to Moksha or liberation or the highest bliss. Though both lead to Moksha? yet of the two means of attaining to Moksha? Karma Yoga is better than mere Karma Sannyasa (renunciation of action) without the knowledge of the Self.But renunciation of actions with the knowledge of the Self is decidedly superior to Karma Yoga.Moreover? Karma Yoga is easy and is therefore suitable to all. (Cf.III.3V.5VI.46)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
अर्जुन के प्रश्न से श्रीकृष्ण समझ गये किस तुच्छ अज्ञान की स्थिति में अर्जुन पड़ा हुआ है। वह कर्मसंन्यास और कर्मयोग इन दो मार्गों को भिन्नभिन्न मानकर यह समझ रहा था कि वे साधक को दो भिन्न लक्ष्यों तक पहुँचाने के साधन थे।मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति निष्क्रियता की ओर होती है। यदि मनुष्यों को अपने स्वभाव पर छोड़ दिया जाय तो अधिकांश लोग केवल यही चाहेंगे कि जीवन में कमसेकम परिश्रम और अधिकसेअधिक आराम के साथ भोजन आदि प्राप्त हो जाय। इस अनुत्पादक अकर्मण्यता से उसे क्रियाशील बनाना उसके विकास की प्रथम अवस्था है। यह कार्य मनुष्य की सुप्त इच्छाओं को जगाने से सम्पादित किया जा सकता है। विकास की इस प्रथमावस्था में स्वार्थ से प्रेरित कर्म उसकी मानसिक एवं बौद्धिक शिथिलता को दूर करके उसे अत्यन्त क्रियाशील बना देते हैं।तदुपरान्त मनुष्य को क्रियाशील रहते हुये स्वार्थ का त्याग करने का उपदेश दिया जाता है। कुछ काल तक निष्काम भाव से ईश्वर की पूजा समझ कर जगत् की सेवा करने से उसे जो आनन्द प्राप्त होता है वही उसके लिए स्फूर्ति एवं प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। इसी भावना को कर्मयोग अथवा यज्ञ की भावना कहा गया है। कर्मयोग के पालन से वासनाओं का क्षय होकर साधक को मानो ध्यानरूप पंख प्राप्त हो जाते हैं जिनकी सहायता से वह शांति और आनन्द के आकाश मे ऊँचीऊँची उड़ाने भर सकता है। ध्यानाभ्यास का विस्तृत विवेचन अगले अध्याय में किया गया है।उपर्युक्त विचार से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आत्मविकास के लिये तीन साधन हैं काम्य कर्म निष्काम कर्म तथा निदिध्यासन। पूर्व अध्यायों में कर्म योग का वर्णन हो चुका है और अगले अध्याय का विषय ध्यान योग है। अत इस अध्याय में अहंकार और स्वार्थ के परित्याग द्वारा कर्मों के संन्यास का निरूपण किया गया है।इस श्लोक में भगवान् ने कहा है कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों ही कल्याणकारक हैं तथापि इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठतर है। श्रीकृष्ण के इस कथन का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे कर्मयोग की अपेक्षा संन्यास को हीनतर बताते हैं। ऐसा समझना अपने अज्ञान का प्रदर्शन करना है अथवा अब तक किये भगवान् के उपदेश को ही नहीं समझना है। यहाँ संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ कहने के अभिप्राय को हमें समझना चाहिये। विकास की जिस अवस्था में अर्जुन था उसको तथा युद्ध की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अर्जुन के लिए संन्यास की अपेक्षा कर्म करने का उपदेश ही उपयुक्त था। अर्थ यह हुआ कि दोनों ही श्रेयष्कर होने पर भी विशेष परिस्थितियों को देखते हुये संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ कहा गया है। अधिकांश लोग अर्जुन के रोग से पीड़ित होते हैं उन सबके लिए कर्मयोग ही वासना क्षय का एकमात्र उपाय है। अत यहाँ कर्मयोग को श्रेष्ठ कहने के तात्पर्य को हमको ठीक से समझना चाहिए।ऐसा क्यों इस पर कहते हैं
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--[भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार सांख्ययोग और कर्मयोगका पालन प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिके मनुष्य कर सकते हैं। कारण कि उनका सिद्धान्त किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिको लेकर नहीं है। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका त्याग करके विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीको 'कर्मसंन्यास' नामसे कहा है। परन्तु भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार ज्ञान-प्राप्तिके लिये सांख्ययोगका पालन प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्रतासे कर सकता है और उसका पालन करनेमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता भी नहीं है। इसलिये भगवान् प्रचलित मतका भी आदर करते हुए अपने सिद्धान्तके अनुसार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।]'संन्यासः'--यहाँ 'संन्यासः' पदका अर्थ 'सांख्य-योग' है, कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं। अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् कर्मोंके त्यागपूर्वक संन्यासका विवेचन न करके कर्म करते हुए ज्ञानको प्राप्त करनेका जो सांख्ययोगका मार्ग है, उसका विवेचन करते हैं। उस सांख्ययोगके द्वारा मनुष्य प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिमें रहते हुए प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक ज्ञान प्राप्त कर सकता है अर्थात् अपना कल्याण कर सकता है। सांख्ययोगकी साधनामें विवेक-विचारकी मुख्यता रहती है। विवेकपूर्वक तीव्र वैराग्यके बिना यह साधना सफल नहीं होती। इस साधनामें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वपर दृष्टि रहती है। राग मिटे बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। इसलिये भगवान्ने देहाभिमानियोंके लिये यह साधन क्लेशयुक्त बताया है (गीता 12। 5)। इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगका साधन किये बिना संन्यासका साधन होना कठिन है; क्योंकि संसारसे राग हटानेके लिये कर्मयोग ही सुगम उपाय है। 'कर्मयोगश्च'--मानवमात्रमें कर्म करनेका राग अनादिकालसे चला आ रहा है, जिसे मिटानेके लिये कर्म करना आवश्यक है (गीता 5। 3)। परन्तु वे कर्म किस भाव और उद्देश्यसे कैसे किये जायँ कि करनेका राग सर्वथा मिट जाय, उस कर्तव्य-कर्मको करनेकी कलाको 'कर्मयोग' कहते हैं। कर्मयोगमें कार्य छोटा है या बड़ा, इसपर दृष्टि नहीं रहती। जो भी कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसीको निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये करना है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये यह आवश्यक है कि कर्म अपने लिये न किये जायँ। अपने लिये कर्म न करनेका अर्थ है--कर्मोंके बदलेमें अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा न होना। जबतक अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा रहती है, तबतक कर्मोंके साथ सम्बन्ध बना रहता है।'निःश्रेयसकरावुभौ'--अर्जुनका प्रश्न था कि सांख्ययोग और कर्मयोग--इन दोनों साधनोंमें कौन-सा साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाला है? उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये दोनों ही साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाले हैं। कारण कि दोनोंके द्वारा एक ही समताकी प्राप्ति होती है। इसी अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें भी भगवान्ने इसी बातकी पुष्टि की है। तेरहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने सांख्ययोग और कर्मयोग--दोनोंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेकी बात कही है। इसलिये ये दोनों ही परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं (गीता 3। 3)।'तयोस्तु कर्मसंन्यासात्'--एक ही सांख्ययोगके दो भेद हैं--एक तो चौथे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें कहा हुआ सांख्ययोग, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग है; और दूसरा, दूसरे अध्याके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक कहा हुआ सांख्ययोग, जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है। यहाँ 'कर्मसंन्यासात्' पद दोनों ही प्रकारके सांख्ययोगका वाचक है।'कर्मयोगो विशिष्यते'--आगेके (तीसरे) श्लोकमें भगवान्ने इन पदोंकी व्याख्या करते हुए कहा है कि कर्मयोगी नित्यसंन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगके बिना सांख्य-योगका साधन होना कठिन है तथा कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें तो कर्मयोगकी आवश्यकता है, पर कर्मयोगमें सांख्ययोगकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये दोनों साधनोंके कल्याणकारक होनेपर भी भगवान् कर्मयोगको ही श्रेष्ठ बताते हैं। कर्मयोगी लोकसंग्रहके लिये कर्म करता है--'लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि' ( गीता 3। 20)। लोकसंग्रहका तात्पर्य है--निःस्वार्थभावसे लोकमर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये, लोगोंको उन्मार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगानेके लिये कर्म करना अर्थात् केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको गीतामें 'यज्ञार्थ कर्म' के नामसे भी कहा गया है। जो केवल अपने लिये कर्म करता है, वह बँध जाता है (3। 9 13)। परन्तु कर्मयोगी निःस्वार्थ-भावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है; अतः वह कर्मबन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है (4। 23)। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है। कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके द्वारा किया जा सकता है, चाहे वह किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो। परन्तु अर्जुन जिस कर्मसंन्यासकी बात कहते हैं, वह एक विशेष परिस्थितिमें किया जा सकता है (गीता 4। 34); क्योंकि तत्त्वज्ञ महापुरुषका मिलना, उनमें अपनी श्रद्धा होना और उनके पास जाकर निवास करना--ऐसी परिस्थिति हरेक मनुष्यको प्राप्त होनी सम्भव नहीं है। अतः प्रचलित प्रणालीके सांख्ययोगका साधन एक विशेष परिस्थितिमें ही साध्य है, जबकि कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके लिये साध्य है। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है।प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करना कर्मयोग है। युद्धजैसी घोर परिस्थितिमें भी कर्मयोगका पालन किया जा सकता है। कर्मयोगका पालन करनेमें कोई भी मनुष्य किसी भी परिस्थितिमें असमर्थ और पराधीन नहीं है; क्योंकि कर्मयोगमें कुछ भी पानेकी इच्छाका त्याग होता है। कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छा रहनेसे ही कर्तव्य-कर्म करनेमें असमर्थता और पराधीनताका अनुभव होता है।कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। सांख्ययोगी और कर्मयोगी--इन दोनोंको ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना है, इसलिये दोनों ही साधकोंको कर्तृत्व और भोक्तृत्व--इन दोनोंको मिटानेकी आवश्यकता है। तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि होनेसे सांख्ययोगी कर्तृत्वको मिटाता है। उतना तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि न होनेसे कर्मयोगी दूसरोंके हितके लिये ही सब कर्म करके भोक्तृत्वको मिटाता है। इस प्रकार सांख्ययोगी कर्तृत्वका त्याग करके संसारसे मुक्त होता है और कर्मयोगी भोक्तृत्वका अर्थात् कुछ पानेकी इच्छाका त्याग करके मुक्त होता है। यह नियम है कि कर्तृत्वका त्याग करनेसे भोक्तृत्वका त्याग और भोक्तृत्वका त्याग करनेसे कर्तृत्वका त्याग स्वतः हो जाता है। कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही कर्तृत्व होता है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारके भी सुखभोगकी इच्छा नहीं है, वह क्रियामात्र है, कर्म नहीं। जैसे यन्त्रमें कर्तृत्व नहीं रहता, ऐसे हीकर्मयोगीमें कर्तृत्व नहीं रहता। साधकको संसारके प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिमें स्पष्ट ही अपना राग दीखता है। उस रागको वह अपने बन्धनका खास कारण मानता है तथा उसे मिटानेकी चेष्टा भी करता है। उस रागको मिटानेके लिये कर्मयोगी किसी भी प्राणी, पदार्थ आदिको अपना नहीं मानता (टिप्पणी प0 280), अपने लिये कुछ नहीं करता तथा अपने लिये कुछ नहीं चाहता। क्रियाओँसे सुख लेनेका भाव न रहनेसे कर्मयोगीकी क्रियाएँ परिणाममें सबका हित तथा वर्तमानमें सबकी प्रसन्नता और सुखके लिये ही हो जाती हैं। क्रियाओँसे सुख लेनेका भाव होनेसे क्रियाओँमें अभिमान (कर्तृत्व) और ममता हो जाती है। परन्तु उनसे सुख लेनेका भाव सर्वथा न रहनेसे कर्तृत्व समाप्त हो जाता है। कारण कि क्रियाएँ दोषी नहीं हैं, क्रियाजन्य आसक्ति और क्रियाओंके फलको चाहना ही दोषी है। जब साधक क्रियाजन्य सुख नहीं लेता तथा क्रियाओंका फल नहीं चाहता तब कर्तृत्व रह ही कैसे सकता है? क्योंकि कर्तृत्व टिकता है भोक्तृत्वपर। भोक्तृत्व न रहनेसे कर्तृत्व अपने उद्देश्यमें (जिसके लिये कर्म करता है, उसमें) लीन हो जाता है और एक परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है।कर्मयोगीका 'अहम्' (व्यक्तित्व) शीघ्र तथा सुगमता-पूर्वक नष्ट हो जाता है, जबकि ज्ञानयोगीका 'अहम्' दूरतक साथ रहता है। कारण यह है कि 'मैं सेवक हूँ' (केवल सेव्यके लिये सेवक हूँ, अपने लिये नहीं)--ऐसा माननेसे कर्मयोगीका 'अहम्' भी सेव्यकी सेवामें लग जाता है;परन्तु 'मैं मुमुक्षु हूँ' ऐसा माननेसे ज्ञानयोगीका 'अहम्' साथ रहता है। कर्मयोगी अपने लिये कुछ न करके केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करता है, पर ज्ञानयोगी अपने हितके लिये साधन करता है। अपने हितके लिये साधन करनेसे 'अहम्' ज्यों-का-त्यों बना रहता है।ज्ञानयोगकी मुख्य बात है--संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव करना और कर्मयोगकी मुख्य बात है--रागका अभाव करना। ज्ञानयोगी विचारके द्वारा संसारकी सत्ताका अभाव तो करना चाहता है, पर पदार्थोंमें राग रहते हुए उसकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। यद्यपि विचारकालमें ज्ञानयोगके साधकको पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव दीखता है, तथापि व्यवहारकालमें उन पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ता प्रतीत होने लगती है। परन्तु कर्मयोगके साधकका लक्ष्य दूसरोंको सुख पहुँचानेका रहनेसे उसका राग स्वतः मिट जाता है। इसके अतिरिक्त मिली हुई सामग्रीका त्याग करना कर्मयोगीके लिये जितना सुगम पड़ता है, उतना ज्ञानयोगीके लिये नहीं। ज्ञानयोगकी दृष्टिसे किसी वस्तुको मायामात्र समझकर ऐसे ही उसका त्याग कर देना कठिन पड़ता है; परन्तु वही वस्तु किसीके काम आती हुई दिखायी दे तो उसका त्याग करना सुगम पड़ता है। जैसे,हमारे पास कम्बल पड़े हैं तो उन कम्बलोंको दूसरोंके काममें आते जानकर उनका त्याग करना अर्थात् उनसे अपना राग हटाना साधारण बात है; परन्तु (यदि तीव्र वैराग्य न हो तो) उन्हीं कम्बलोंको विचारद्वारा अनित्य, क्षणभङ्गुर, स्वप्नके मायामय पदार्थ समझकर ऐसे ही छोड़कर चल देना कठिन है। दूसरी बात, मायामात्र समझकर त्याग करनेमें (यदि तेजीका वैराग्य न हो तो) जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि नहीं है, उन खराब वस्तुओंका त्याग तो सुगमतासे हो जाता है, पर जिनमें हमारी सुखबुद्धि है, उन अच्छी वस्तुओंका त्याग कठिनतासे होता है। परन्तु दूसरेके काम आती देखकर जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि है, उन वस्तुओंका त्याग सुगमतासे हो जाता है; जैसे--भोजनके समय थालीमेंसे रोटी निकालनी पड़े तो ठंडी, बासी और रूखी रोटी ही निकालेंगे। परन्तु यदि वही रोटी किसी दूसरेको देनी हो तो अच्छी रोटी ही निकालेंगे, खराब नहीं। इसलिये कर्मयोगकी प्रणालीसे रागको मिटाये बिना सांख्ययोगका साधन होना बहुत कठिन है। विचारद्वारा पदार्थोंकी सत्ता न मानते हुए भी पदार्थोंमें स्वाभाविक राग रहनेके कारण भोगोंमें फँसकर पतनतक होनेकी सम्भावना रहती है। केवल असत्के ज्ञानसे अर्थात् असत्को असत् जान लेनेसे रागकी निवृत्ति नहीं होती (टिप्पणी प0 281)। जैसे, सिनेमामें दीखने-वाले पदार्थों आदिकी सत्ता नहीं है-- ऐसा जानते हुए भी उसमें राग हो जाता है।सिनेमा देखनेसे चरित्र, समय, नेत्र-शक्ति और धन--इन चारोंका नाश होता है--ऐसा जानते हुए भी रागके कारण सिनेमा देखते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वस्तुकी सत्ता न होनेपर भी उसमें राग अथवा सम्बन्ध रह सकता है। यदि राग न हो तो वस्तुकी सत्ता माननेपर भी उसमें राग उत्पन्न नहीं होता। इसलिये साधकका मुख्य काम होना चाहिये--रागका अभाव करना, सत्ताका अभाव करना नहीं; क्योंकि बाँधनेवाली वस्तु राग या सम्बन्ध ही है, सत्तामात्र नहीं। पदार्थ चाहे सत् हो, चाहे असत् हो, चाहे सत्-असत् से विलक्षण हो, यदि उसमें राग है तो वह बाँधनेवाला हो ही जायगा। वास्तवमें हमें कोई भी पदार्थ नहीं बाँधता। बाँधता है हमारा सम्बन्ध, जो रागसे होता है। अतः हमारेपर राग मिटानेकी ही जिम्मेवारी है। सम्बन्ध--अब भगवान् कर्मयोगको श्रेष्ठ कहनेका कारण बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
संन्यास इति। संन्यासः कर्म योगः च नात्र एकोऽभिहितः अपि तु उभौ। संमिलितौ तौ निश्श्रेयसं दत्तः। योगेन विना संन्यासो न संभवतीति योगस्य विशेषः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
प्रश्नमेवमुत्थाप्य प्रतिवचनमुत्थापयति स्वाभिप्रायमिति। निर्णयाय तद्द्वारेण परस्य संशयनिवृत्त्यर्थमित्यर्थः। एवं प्रश्ने प्रवृत्ते कर्मयोगस्य सौकर्यमभिप्रेत्य प्रशस्यतरत्वमभिधित्सुर्भगवान्प्रतिवचनं किमुक्तवानित्याशङ्क्याह संन्यास इति। उभयोरपि तुल्यत्वशङ्कां वारयति तयोस्त्विति। कथं तर्हि ज्ञानस्यैव मोक्षोपायत्वं विवक्ष्यते तत्राह ज्ञानोत्पत्तीति। तर्हि द्वयोरपि प्रशस्यत्वमप्रशस्यत्वं वा तुल्यमित्याशङ्क्याह उभाविति। ज्ञानसहायस्य कर्मसंन्यासस्य कर्मयोगापेक्षया विशिष्टत्वविवक्षया विशिनष्टि केवलादिति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
अर्जुनसंशयनिर्वतकमुत्तरं श्रीभगवानुवाच संन्यास इति। उभो यद्यपि निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन मोक्षोपयोगिनौ तथापि तयोस्तु कर्मसंन्यासादशुद्धचित्तेनाविरक्तेन कृतात्कर्मयोगश्चित्तशुद्य्धा वैराग्यादिजनको विशिष्यत उत्कृष्टो भवतीति कर्मयोगं स्तौति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
सन्न्यासमिति प्रश्नवाक्ये सन्न्यास इति परिहारवाक्ये च सन्न्यासयोगशब्दौ यतिगृहस्थाश्रमविषयावेव तयोः सर्वकर्मत्यागात्तदनुष्ठानरूपत्वात्। ज्ञेय इति वचनं तु न सन्न्यासशब्दव्याख्यानपरम्। किन्तु यो द्वेषादिवर्जितो गृही सोऽपि सन्न्यासी ज्ञातव्य इति स्तुतिपरमेवेत्यत आह नायमिति। अयं परिहारवाक्यस्थः। प्रश्नवाक्यस्थस्य तात्पर्यनिर्णये तथाऽभ्युपगमात्। योगश्च न गृहस्थाश्रम इत्यपि द्रष्टव्यम्। कुतो न इति चेत् अत्र तयोस्त्विति सन्न्यासात्कर्मयोगस्य विशिष्टत्ववचनात् तस्य चास्मत्पक्ष एव सम्भवादन्यत्रासम्भवादिति भावः। कुतो भवत्पक्षे सम्भवः इत्यत आह द्वन्द्वेति। मत्पूजा मदर्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठानम्। आश्रमार्थत्वे कुतोऽसम्भवः इत्यत आह तानीति। तान्याधानादीनि। अत्यरेचयत् अत्यरिच्यत इतिवचनादिति वर्तते। न्यस्यतेऽस्मिन्सर्वमिति ब्रह्मैव न्यास इति कश्चित्। तदसत् तपोऽपेक्षयोत्तमत्वाभिधानस्यासङ्गतत्वात्। उपायोपेयभावेन सङ्गतिरिति चेत् तर्हि तत्सिद्धौ लोकत एवोत्तमत्वसिद्धेरभिधानवैयर्थ्यात्। गृहस्थाश्रमाद्यत्याश्रमस्योत्तमत्वमयुक्तम्। गृहस्थाश्रमो हि सर्वधर्मोपपन्नस्तत्समर्थे मध्यमे वयसि अनुष्ठेयो महाफलश्च यत्याश्रमस्तु निष्क्रियश्चरमे वयसि गृहस्थधर्मानधिकृतैरन्धपङ्गवादिभिरनुष्ठेयोऽल्पफलश्चेति केचित् तन्निरासार्थमाह सन्न्यासस्त्विति। काम्यकर्मरहितत्वात् निष्क्रियाख्योऽपि सधर्मकः। न केवलं सधर्मकः किन्तु न तस्माद्यत्याश्रमानुष्ठेयाद्यतिभक्त्यापि यत्फलं प्राप्नुयान्न तत्सर्वैर्गृहस्थधर्मैरित्यर्थः। ब्रह्मचर्यादेव ब्रह्मचर्यं विसृज्यैव विरजेत् विरक्तो भवेत् तदहरेव प्रव्रजेत् जा.उ.4या.उ.1 इति श्रुतिशेषः। कर्मेत्याश्रमान्तरम्। यदुक्तंनायं इत्यादि तदुपसंहरति अत इति। अत्र परिहारवाक्ये।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
नायं सन्न्यासो यत्याश्रमः।द्वन्द्वत्यागात्तु सन्न्यासान्मत्पूजैव गरीयसी इति वचनात्।तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत् इति च।सन्नायासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः। न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते। तद्भक्तोऽपि हि यद्गच्छेतद्गृहस्थो न धार्मिकः। मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते। यदाधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् इति नारदीये। ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ৷৷. यदहरेव विरजेत् जा.उ.4 या.उ.1 इति च। सन्न्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम महीयसी। येषामत्राधिकारो न तेषां कर्मेति निश्चयः इत्यादेश्च ब्राह्मे। अतो नात्राश्रमः सन्न्यास उक्तः।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
एवमर्जुनस्य प्रश्ने तदुत्तरं श्रीभगवानुवाच निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन मोक्षोपयोगिनौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासादनधिकारिकृतात्कर्मयोगो विशिष्यते श्रेयानधिकारसंपादकत्वेन।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
अस्योत्तरं भगवानुवाच संन्यास इति। निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुतया। तथापि कर्मसंन्यासादविरक्तकृतात्कर्मयोग एव विशिष्यते। चित्तशुद्धिद्वारा वैराग्यादिहेतुत्वात्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
भगवानेतत्प्रश्नोत्तरमाह कृपया सन्न्यास इति। सन्न्यासः कर्मणां त्यागः कर्मयोगः कर्मानुष्ठानमेतावुभौ निश्श्रेयसकरौ मोक्षापादकौ तयोरपि कर्मसन्न्यासात् केवलं कर्मत्यागात् मदाज्ञया फलानभिलाषेण मदर्पणधिया कर्मयोगः कर्मानुष्ठानं विशिष्यते उत्तममित्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
श्रीभगवानुवाच संन्यासः ज्ञानयोगः कर्मयोगः च ज्ञानयोगशक्तस्य अपि उभौ निरपेक्षौ निःश्रेयसकरौ। तयोः तु कर्मसंन्यासाद् ज्ञानयोगात् कर्मयोगः एव विशिष्यते।कुत इत्यत आह
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
संन्यासः कर्मणां परित्यागः कर्मयोगश्च तेषामनुष्ठानं तौ उभौ अपि निःश्रेयसकरौ मोक्षं कुर्वाते ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन। उभौ यद्यपि निःश्रेयसकरौ तथापि तयोस्तु निःश्रेयसहेत्वोः कर्मसंन्यासात् केवलात् कर्मयोगो विशिष्यते इति कर्मयोगं स्तौति।।कस्मात् इति आह
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच संन्यास इति। अयं भावःनहि वेदान्तवेद्यात्मतत्त्वविदं प्रति कर्मयोगमहं ब्रवीमि यतः पूर्वोक्तेन संन्यासेन विरोधः स्यात् अपितु देहात्माभिमानिनं त्वां बन्धुवधादिनिमित्तशोकमोहादिकृतमेनं संशयं देहात्मविवेकज्ञानासिना छित्त्वा परमात्मज्ञानोपायभूतं कर्मयोगमातिष्ठेति ब्रवीमि। कर्मयोगेन शुद्धचित्तस्य चात्मतत्त्वज्ञाने जाते सति तत्परिपाकार्थं ज्ञाननिष्ठाङ्गत्वेन संन्यासः पूर्वमुक्तः। एवं सत्यङ्गप्रधानयोर्विकल्पायोगात्संन्यासः कर्मयोगश्चेत्येतावुभावपि भूमिकाभेदेन समुच्चितावेव निःश्रेयसं साधयतः तथापि तु तयोर्मध्ये कर्मसंन्यासात्सकाशात्कर्मयोगो विशिष्टो भवति।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
इति प्रश्ने भगवानर्जुनं पुष्टिनिष्ठभक्तं तदोभयकोटिसंशयापन्नं योगसाङ्ख्यसारं ग्राहयन् पूर्वशिष्टां कर्मयोगस्थितिमुत्तरमाह सन्न्यासः कर्मयोगश्चेति। हे अर्जुन यद्यपि साङ्ख्यीयः सन्न्यासः कर्मयोगश्चेत्युभौ मुख्यतः स्वतन्त्रतया पुरुषार्थसाधकौ नात्राङ्गप्रधानभावः एतयोरेकमप्यास्थितः परं श्रेयो मोक्षलक्षणं विन्दति। तथापि कर्मसन्न्यासात् कर्मणां त्यागात् सर्वस्यैव त्यागो बाह्यतः कर्मयोगो विशिष्यते तत्त्वज्ञानिनोऽपि लोकानुग्रहार्थं कर्मकरणश्रवणात्। मनसैव त्यागः न बाह्यतः। तवापि फलद इति भावः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
अथ सद्वारकत्वाभिधानस्य अधिकारिविशेषनियततया द्वयोरप्यव्यवहितसाधनत्वमुपपादयंस्तत एव मृदितकषायस्यापि सौकर्यशैघ्र्यसङ्गिनस्तस्यैव कर्तव्यतां च द्रढयन् भगवानुवाच सन्न्यास इति। ज्ञानयोगाशक्तस्य कर्मयोगसापेक्षत्वात्तच्छक्तस्यैव निरपेक्षसाधनत्वोक्तिरुपपन्नेत्यभिप्रायेणाह ज्ञानयोगशक्तस्यापीति।उभौ निश्श्रेयसकरा इत्येतत्सामर्थ्यात्एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् 5।4 इति वक्ष्यमाणानुसन्धानाच्चनिरपेक्षावित्युक्तम्। चकारेणाप्येतदेव व्यज्यते। अन्वाचयेतरेतरयोगसमाहारा हि पृथक्फलसाधनत्वप्रकरणविरुद्धाः। अतः पृथक्स्वातन्त्र्यगर्भः समुच्चय एवात्र चार्थः। तर्हि द्वावप्यनियमेनयथेच्छमुपादेयौ कर्मयोगस्य तु किमर्थं प्रशंसा इति शङ्काव्युदासाय तुशब्दः। तदभिप्रायव्यञ्जनार्थमेवकारः।