श्लोक · Shlok 3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति | निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati. nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate.
Translation · अर्थ
English
He should be known as a perpertual Sannyasi who neither hates nor desires; for, free from the pairs of opposites, O mighty-armed Arjuna, he is easily set free from bondage.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
One who is fully in Kṛṣṇa consciousness is always a renouncer because he feels neither hatred nor desire for the results of his actions. Such a renouncer, dedicated to the transcendental loving service of the Lord, is fully qualified in knowledge because he knows his constitutional position in his relationship with Kṛṣṇa. He knows fully well that Kṛṣṇa is the whole and that he is part and parcel of Kṛṣṇa. Such knowledge is perfect because it is qualitatively and quantitatively correct. The concept of oneness with Kṛṣṇa is incorrect because the part cannot be equal to the whole. Knowledge that one is one in quality yet different in quantity is correct transcendental knowledge leading one to become full in himself, having nothing to aspire to or lament over. There is no duality in his mind because whatever he does, he does for Kṛṣṇa. Being thus freed from the platform of dualities, he is liberated – even in this material world.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
ज्ञेयः should be known? सः he? नित्यसंन्यासी perpetual ascetic? यः who? न not? द्वेष्टि hates? न not? काङ्क्षति desires? निर्द्वन्द्वः one free from the pairs of opposites? हि verily? महाबाहो O mightyarmed? सुखम् easily? बन्धात् from bondage? प्रमुच्यते is set free.Commentary A man does not become a Sannyasi by merely giving up actions because of laziness or ignorance or some family arrel or calamity or unemployment. A true Sannyasi is not a hypocritical coward.The Karma Yogi who neither hates pain and the objects which give him pain? nor desires pleasure and the objects that give him pleasure? who has neither attachment nor aversion to any senseobject and who has risen above the pairs of heat and cold? joy and sorrow? success and failure? victory and defeat? gain and loss? praise and censure? honour and dishonour? should be known as a perpetual Sannyasi though he is ever engaged in action.One need not have taken Sannyasa formally but if he has the above mental attitutde? he is a perpetual Sannyasi. Mere ochrecoloured robe cannot make one a Sannyasi. What is wanted is a pure heart with true renunciation of egoism and desires. Physical renunciation of objects is no renunciation at all. (Cf.VI.1)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
इस श्लोक में स्वयं भगवान् ही कर्मयोग के श्रेष्ठत्व का कारण बताते हैं। भगवान् द्वारा यहां दी हुई संन्यास की परिभाषा उसके विषय में प्रचलित निरर्थक धारणाओं को दूर कर देती है। वेषभूषा के बाह्य आडंबर की अपेक्षा आन्तरिक गुणों का अधिक महत्व है। श्रीकृष्ण के विचारानुसार राग और द्वेष से रहित पुरुष ही संन्यासी कहलाने योग्य है।रागद्वेष जयपराजय सुखदुख आदि इसी प्रकार के द्वन्द्वात्मक चक्र हैं जिन पर आरू ढ़ मन जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है। हम तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही जीवन में आनेवाली परिस्थितियों को समझ पाते हैं। अन्धकार के सन्दर्भ में ही प्रकाश का ज्ञान होता है। किसी वस्तु के विपरीत धर्मवाली वस्तु के न होने पर हम उस वस्तु को यथार्थ रूप मे नहीं समझ पाते।यदि वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बुद्धि के पास तुलनात्मक अध्ययन प्रणाली ही उपलब्ध हो तब उसका त्याग करने का अर्थ होगा विचार के साधन अन्तकरण का ही त्याग करना। एक वाहन द्वारा सड़क पर यात्रा करना संभव है परन्तु समुद्र यात्रा नहीं। उसके लिए उस वाहन का त्याग करके जलपोत की आवश्यकता होती है। असंख्य नामरूपों की सृष्टि में तो बुद्धि का उपयोग किया जा सकता है। यहाँ कहा गया है कि समस्त प्रकार के भेद दर्शनों से मुक्त हुआ अर्थात् मन और बुद्धि के अतीत हुआ पुरुष ही सच्चा संन्यासी है।यह कोई सहज कार्य नहीं है। द्वन्द्वों से रहित होने का अर्थ है र्मत्य जीव का सभी बन्धनों से मुक्त हो जाना। संन्यासी की इस परिभाषा से यह नहीं समझें कि साधकों के लिए दुखपूर्ण निराशा के जीवन को चित्रित करने का भगवान् का प्रयत्न है। अर्जुन के मन में दीर्घकाल से अर्जित वासनाओं का संचय था। अत उसके आत्मविकास को ध्यान मे रखकर भगवान् उसे संन्यास जीवन को स्वीकार करने की शीघ्रता से परावृत करना चाहते हैं।
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--'महाबाहो'--'महाबाहो' सम्बोधनके दो अर्थ होते हैं--एक तो जिसकी भुजाएँ बड़ी और बलवान् हों अर्थात् जो शूरवीर हो; और दूसरा, जिसके मित्र तथा भाई बड़े पुरुष हों। अर्जुनके मित्र थे प्राणिमात्रके सुहृद् भगवान् श्रीकृष्ण और भाई थे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर। इसलिये यह सम्बोधन देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि कर्मयोगके अनुसार सबकी सेवा करनेका बल तुम्हारेमें है। अतः तुम सुगमतासे कर्मयोगका पालन कर सकते हो।'यो न द्वेष्टि'--कर्मयोगी वह होता है, जो किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, सिद्धान्त आदिसे द्वेष नहीं करता। कर्मयोगीका काम है सबकी सेवा करना, सबको सुख पहुँचाना। यदि उसका किसीके भी साथ किञ्चिन्मात्र भी द्वेष होगा तो उसके द्वारा कर्मयोगका आचरण साङ्गोपाङ्ग नहीं हो सकेगा। अतः जिससे कुछ भी द्वेष हो,उसकी सेवा कर्मयोगीको सर्वप्रथम करनी चाहिये।सबसे पहले 'न द्वेष्टि' पद देनेका तात्पर्य यह है, कि जो किसीको भी बुरा समझता है और किसीका भी बुरा चाहता है वह कर्मयोगके तत्त्वको समझ ही नहीं सकता।मार्मिक बात प्राणिमात्रके हितके उद्देश्यसे कर्मयोगीके लिये बुराईका त्याग करना जितना आवश्यक है, उतना भलाई करना आवश्यक नहीं है। भलाई करनेसे केवल समाजका हित होता है; परन्तु बुराईरहित होनेसे विश्वमात्रका हित होता है। कारण यह है कि भलाई करनेमें सीमित क्रियाओँ और पदार्थोंकी प्रधानता रहती है; परन्तु बुराईरहित होनेमें भीतरका असीम भाव प्रधान रहता है। यदि भीतरसे बुरा भाव दूर न हुआ तो बाहरसे भलाई करें तो इससे अभिमान पैदा होगा, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है। भलाई करनेका अभिमान तभी पैदा होता है, जब भीतर कुछ-न-कुछ बुराई हो। जहाँ अपूर्णता (कमी) होती है, वहीं अभिमान पैदा होता है। परन्तु जहाँ पूर्णता है, वहाँ अभिमानका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।गहराईसे देखा जाय तो नाशवान् वस्तुओंकी सहायताके बिना भलाई नहीं की जा सकती। जिन वस्तुओंसे हम भलाई करते हैं, वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं; प्रत्युत उन्हींकी हैं, जिनकी हम भलाई करते हैं। फिर भी यदि भलाईका अभिमान होता है, तो यह नाशवान्का सङ्ग है। जबतक नाशवान्का सङ्ग है, तबतक 'योग' की सिद्धि नहीं होती। मैंने भलाई की--यह अभिमान बुराईसे भी अधिक भयंकर है; क्योंकि यह भाव मैं-पनमें बैठ जाता है। कर्म और फल तो मिट जाते हैं, पर जबतक मैं-पन रहता है, तबतक मैं-पनमें बैठा हुआ भलाईका अभिमान नहीं मिटता। दूसरी बात, बुराईको तो हम बुराईरूपसे जानते ही हैं, पर भलाईको बुराईरूपसे नहीं जानते। इसलिये भलाईके अभिमानका त्याग करना बहुत कठिन है; जैसे--लोहेकी हथकड़ीका तो त्याग कर सकते हैं; पर सोनेकी हथकड़ीका त्याग नहीं कर सकते; क्योंकि वह गहनारूपसे दीखती है। इसलिये बुराईरहित होकर ही भलाई करनी चाहिये। वास्तवमें बुराईका त्याग होनेपर विश्वमात्रकीभलाई अपने-आप होती है, करनी नहीं पड़ती। इसलिये बुराईरहित महापुरुष अगर हिमालयकी एकान्त गुफामें भी बैठा हो, तो भी उसके द्वारा विश्वका बहुत हित होता है।'न काङ्क्षति'--कर्मयोगमें कामनाका त्याग मुख्य है। कर्मयोगी किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी कामना नहीं करता। कामना-त्याग और परहितमें परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। निष्काम होनेके लिये दूसरेका हित करना आवश्यक है। दूसरेका हित करनेसे कामनाके त्यागका बल आता है। कर्मयोगमें कर्ता निष्काम होता है, कर्म नहीं; क्योंकि जड होनेके कारण कर्म स्वयं निष्काम या सकाम नहीं हो सकते। कर्म कर्ताके अधीन होते हैं, इसलिये कर्मोंकी अभिव्यक्ति कर्तासे ही होती है। निष्काम कर्ताके द्वारा ही निष्काम-कर्म होते हैं, जिसे कर्मयोग कहते हैं। अतः चाहे 'कर्मयोग' कहें या 'निष्काम-कर्म'--दोनोंका अर्थ एक ही होता है। सकाम कर्मयोग होता ही नहीं। निष्काम होनेसे कर्ता कर्मफलसे असङ्ग रहता है; परन्तु जब कर्तामें सकामभाव आ जाता है, तब वह कर्मफलसे बँध जाता है (गीता 5। 12)। सकामभाव तभी नष्ट होता है, जब कर्ता कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता, प्रत्युत सम्पूर्ण कर्म दूसरोंके हितके लिये ही करता है। इसलिये कर्ताका भाव नित्य-निरन्तर निष्काम रहना चाहिये। कर्तामें जितना निष्कामभाव होगा, उतना ही कर्मयोगका सही आचरण होगा। कर्ताके सर्वथा निष्काम होनेपर कर्मयोग सिद्ध हो जाता है।'ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी'--अर्जुनने युद्ध न करके भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करनेकी इच्छा प्रकट की थी--'गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके' (गीता 2। 5) अर्थात् गुरुजनोंको न मारकर संन्यास लेना ही श्रेष्ठ है। भगवान् उसी बातका उत्तर देते हुए मानो कह रहे हैं कि हे अर्जुन! वह संन्यास तो गुरुजनोंके मर जानेके भयसे किया जानेवाला बाहरी संन्यास है, पर कर्मयोगीका संन्यास राग-द्वेषके त्यागसे होनेवाला नित्य संन्यास अर्थात् भीतरी एवं सच्चा संन्यास है।आगे छठे अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने केवल अग्निका त्याग करनेवाले अर्थात् संन्यास-आश्रममात्र ग्रहण करनेवाले पुरुषको संन्यासी न कहकर भीतरसे संसारके आश्रयका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको ही संन्यासी कहा है। इस प्रकार भगवान्के मतमें कर्मयोगी ही वास्तविक संन्यासी है। कर्म करते हुए भी कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखना ही संन्यास है। कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखनेवालेको कर्मोंका फल कभी किसी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी नहीं मिलता--'न तु संन्यासिनां क्वचित्'(गीता 18। 12)। इसलिये शास्त्रविहित समस्त कर्म करते हुए भी कर्मयोगी सदा संन्यासी ही है।कर्मयोगका अनुष्ठान किये बिना सांख्ययोगका पालन करना कठिन है। इसलिये सांख्ययोगका साधक पहले कर्मयोगी होता है, फिर संन्यासी (सांख्ययोगी) होता है। परन्तु कर्मयोगके साधकके लिये सांख्ययोगका अनुष्ठान करना आवश्यक नहीं है। इसलिये कर्मयोगी आरम्भसे ही संन्यासी है।जिसके राग-द्वेषका अभाव हो गया है, उसे संन्यास-आश्रममें जानेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि अपनी नहीं है और अपने लिये भी नहीं है--ऐसा निश्चय होनेके बाद रागद्वेष मिटकर ऐसा ही यथार्थ अनुभव हो जाता है, फिर व्यवहारमें संसारसे सम्बन्ध दीखनेपर भी भीतरसे (राग-द्वेष न रहनेसे) सम्बन्ध होता ही नहीं। यही 'नित्यसंन्यास' है। लौकिक अथवा पारलौकिक प्रत्येक कार्य करते समय कर्मयोगीका संसारसे सर्वथा संन्यास रहता है, इसलिये वह नित्यसंन्यासी ही समझनेयोग्य है।संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद अर्थात् लिप्तताका अभाव ही संन्यास है और कर्मयोगीमें राग-द्वेष न रहनेसे संसारसे लिप्तता रहती ही नहीं। अतः कर्मयोगी नित्यसंन्यासी है। 'निर्द्वन्द्वो हि सुखं बन्धात्प्रमुच्यते' (टिप्पणी प0 283) साधनाके आरम्भमें साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व रहता है। सत्सङ्ग, स्वाध्याय, विचार आदि करनेसे वह परमात्मप्राप्तिको अपना ध्येय तो मान लेता है, पर उसके अपने कहलानेवाले मन इन्द्रियों आदिकी रुचि स्वाभाविक ही भोग भोगने तथा संग्रह करनेमें रहती है। इसलिये साधक कभी परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करना चाहता है और कभी भोग एवं संग्रहको। उसे जैसा सङ्ग मिलता है, उसीके अनुसार उसके भावोंमें परिवर्तन होता रहता है। ऐसा होनेपर भी वह भोगोंको शान्तिसे नहीं भोग सकता; क्योंकि सत्सङ्ग आदिके संस्कार उसके अन्तःकरणमें वैराग्य (भोगोंसे अरुचि) पैदा करते रहते हैं। इस प्रकार साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व (भोग भोगूँ या साधन करूँ) चलता रहता है। इस द्वन्द्वपर ही अहंभाव टिका हुआ है। हमें सांसारिक भोग और संग्रहमें लगना ही नहीं है, प्रत्युत एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना है--ऐसा दृढ़ निश्चय होनेपर द्वन्द्व नहीं रहता और अहंभाव परमात्मतत्त्वमें लीन हो जाता है।वास्तवमें संसारका महत्त्व अन्तःकरणमें अङ्कित हो जानेसे ही द्वन्द्व रहता है। भोग भोगते रहनेसे दूसरोंसे सुख चाहते रहनेसे, संसारके प्राणी-पदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अङ्कित हो जाता है। उनसे सुख लेनेसे वह महत्त्व बढ़ता जाता है, जिससे उनको प्राप्त करनेकी रुचि प्रबल हो जाती है। वह रुचि एक परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको स्थायी और दृढ़ नहीं होने देती। इससे साधकमें द्वन्द्व बना रहता है। उद्देश्यकी दृढ़ताके लिये साधकको यह पक्का विचार करना चाहिये कि कितना ही सुख, आराम, भोग क्यों न मिल जाय, मुझे उसे लेना ही नहीं है, प्रत्युत परहितके लिये उसका त्याग करना है। यह विचार जितना दृढ़ होगा, उतना ही साधक निर्द्वन्द्व होगा।निर्द्वन्द्व होनेकी मुख्य बात इसी श्लोकमें 'न द्वेष्टि न काङ्क्षति' पदोंसे कही गयी है जिसका तात्पर्य है--रागद्वेषसे रहित होना। राग-द्वेषको मिटानेके लिये यह विचार करना चाहिये कि अपने न चाहनेपर भी अनुकूलता और प्रतिकूलता आती ही है अर्थात् अपने चाहनेपर अनुकूलता आती हो--ऐसी बात नहीं है और न चाहनेपर प्रतिकूलता न आती हो ऐसी बात भी नहीं है। अनुकूलता-प्रतिकूलता तो प्रारब्धके फलस्वरूप आती-जाती रहती है, फिर इसके आने अथवा जानेकी चाहना क्यों करें? अनुकूलताके प्रति राग और प्रतिकूलताके प्रति द्वेष अपनी भूलसे होता है। इस प्रकार विचार करनेसे भूल मिटकर राग-द्वेष सर्वथा समाप्त हो जाते हैं।दूसरी बात यह है कि अपनी (स्वयंकी) सत्ता स्वतन्त्र है, किसी पदार्थ, व्यक्ति, क्रियाके अधीन नहीं है; क्योंकि सुषुप्ति-अवस्थामें जब हम संसारको भूल जाते हैं, तब भी अपनी सत्ता बनी रहती है; जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थामें भी हम प्राणी, पदार्थके बिना रह सकते हैं। फिर (अपनी स्वतन्त्र सत्ता होते हुए भी) उनमें राग-द्वेष करके हम उनके अधीन क्यों बनें? इस प्रकार विचार करनेसे भी राग-द्वेष मिट जाते हैं।संसारका राग उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है। यह राग कभी स्थायी नहीं रहता; किन्तु हम नये-नये प्राणी, पदार्थोंमें राग करके इसे बनाये रखनेकी चेष्टा करते हैं। परन्तु परमात्माकी अभिलाषा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली नहीं है; क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेके नाते जीवका परमात्मासे अखण्ड सम्बन्ध है। परमात्माकी अभिलाषा कभी घटती-ब़ढ़ती भी नहीं। केवल संसारमें राग अधिक होनेपर वह घटती हुई और राग कम होनेपर वह बढ़ती हुई दीखती है। इसलिये 'मैं' सदा जीता रहूँ; मैं सब कुछ जान लूँ; मैं सदा सुखी रहूँ'--इस रूपमें सत्चित्आनन्दस्वरूप परमात्माकी अभिलाषा जीवमात्रमें निरन्तर रहती है। जब संसारका राग मिट जाता है और एकमात्र परमात्माकी अभिलाषा रह जाती है, तब द्वन्द्व नहीं रहता। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग--तीनों ही योग-मार्गोंमें निर्द्वन्द्व होना बहुत आवश्यक है। जबतक द्वन्द्व है, तबतक मुक्ति नहीं होती (गीता 7। 27)। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें राग और द्वेष--ये दो शत्रु हैं (गीता 3। 34)। निर्द्वन्द्व होनेसे ये दोनों मिट जाते हैं और इनके मिटनेसे सुखपूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। संसारमें उलझनेके दो ही कारण हैं--राग और द्वेष। जितने भी साधन हैं, सब राग-द्वेषको मिटानेके लिये ही हैं (टिप्पणी प0 284)। राग-द्वेषके मिटनेपर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति स्वतःसिद्ध है। इसमें परिश्रम है ही नहीं। कारण कि परमात्म-तत्त्वकी अनुभूति असत्के द्वारा नहीं होती, प्रत्युत असत्के त्यागसे होती है। असत्की सत्ता रागद्वेषपर ही टिकी हुई है। असत् संसार तो स्वतः ही मिट रहा है, पर अपनेमें राग-द्वेषको पकड़नेसे संसार स्थिर दीखता है। अतः जो संसार निरन्तर मिट रहा है, उसमें रागद्वेष न रहनेसे मुक्ति नहीं होगी तो क्या होगा? इसलिये निर्द्वन्द्व अर्थात् राग-द्वेषसे रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध--इस अध्यायके दूसरे श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनोंको परम कल्याण करनेवाले बताया। उसकी व्याख्या अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
ज्ञेय इति। अतश्च स एव सार्वकालिकः संन्यासी येन मनसो अभिलाषप्रद्वेषौ संन्यस्तौ। यतोऽस्य द्वन्द्वेभ्यः क्रोधमोहादिभ्यो निष्क्रान्ता धीः स सुखं प्रमुच्यत ( K omit प्र ) एव।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
कर्म हि बन्धकारणं प्रसिद्धं तत्कथं निःश्रेयसकरं स्यादिति शङ्कते कस्मादिति। अकर्त्रात्मविज्ञानात्प्रागपि सर्वदासौ संन्यासी ज्ञेयो यो रागद्वेषौ क्वचिदपि न करोतीत्याह इत्याहेति। यथानुष्ठीयमानानि कर्माणि संन्यासिनं न निबध्नन्ति कृतानि च वैराग्येन्द्रियसंयमादिना निवर्तन्ते तथैवानभिसंहितफलानि नित्यनैमित्तिकानि योगिनमपि न निबध्नन्ति निवर्तयन्ति च संचितं दुरितमित्यभिप्रेत्याह निर्द्वन्द्वो हीति। कर्मयोगिनो नित्यसंन्यासित्वज्ञानमन्यथाज्ञानत्वान्मिथ्याज्ञानमित्याशङ्क्याह एवंविध इति। कर्मिणोऽपि रागद्वेषाभावेन संन्यासित्वं ज्ञातुमुचितमित्यर्थः। रागद्वेषरहितस्यानायासेन बन्धप्रध्वंससिद्धेश्च युक्तं तस्य संन्यासित्वमित्याह निर्द्वन्द्व इति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
तत्र हेतुमाह ज्ञेय इति। स निषकामकर्मयोगी नित्यं संन्यासी ज्ञातव्यः। यत्तु यदोयोगात्तदोऽध्याहारः। सनित्यसंन्यासीत्येकं पदम्। नित्यैः कर्मभिः सह वर्तत इति सनित्यः स चासौ संन्यासी चेति तन्न। स इत्येनेनैव नित्यादिकर्मानुष्ठातुर्लामेनाध्याहारस्य क्लिष्टकल्पनायाश्च वैयर्थ्यात्। नित्यसंन्यासीति विवक्षितार्थालाभाच्च। केऽसौ यो न द्वेष्टि दुःखं तत्साधनं च सुखं तत्साधनं च नाकाङ्क्षति रागद्वेषराहित्यरुपसंन्यासगुणयोगात् अयमपि संन्यासीति भावः। एतेन द्वेषमूलकानि श्येनादीनि नानुतिष्ठति स्वर्गादिफलाकाङ्क्षप्रयुक्तानि ज्योतिष्टोमादीन्यपि। तस्मात्संन्यासगुणयोगादयमपि संन्यासीति भाव इति प्रत्युक्तम्। क्रियायाः कर्ममात्रसाकाङ्क्षत्वेनास्यार्थस्यार्थिकत्वात्। श्येनाद्यननुष्ठानमात्रेण सर्वत्र रागद्वेषानिवृत्त्या संन्यासिगुणयोगासिद्धेः। अत्रादिपदाभ्यां आभिचारिककर्मणां अग्निष्टोमादीनां चैव लाभः श्येनादिसमभिव्याहारात् द्वेषेत्यादिना विशेषितत्वाच्च। यद्यादिपदाभ्यां भाष्योक्तमपि लभ्यत इत्याग्रहस्तर्हि तेनैव निर्वाहे कृतमनया कुसष्ट्या। यत्तु न द्वेष्टि भगवदर्पणबुद्य्धा क्रियमाणं कर्म निष्फलत्वशङ्क्येति तच्चिन्त्यम्। संकोचे मानाभावात् संन्यासिगुणयोगालाभाच्च। हि यस्मात्सुखदुःखराग्द्वेषशीतोष्णादिद्वन्द्ववर्जितः सुखमनायासेनैव बन्धात्संसाराज्ज्ञानप्राप्त्या प्रमुच्यते यथा त्वं महाबाहुत्वादस्माद्युद्धादनायासेनैव मोक्ष्यसे तथेति द्योतयन्नाह महाबाहो इति। यत्तु यद्यप्येवं तथापि हि प्रसिद्धं निर्द्वन्द्वः द्वन्द्वं सत्यानृतयोरात्मानात्मनोर्मिथुनं परस्पराध्यासः तद्रहितः सांख्यः रागाद्युदयहेतोरज्ञानस्यात्यन्तोच्छेदात् सुखं कर्मकरणायासं विनापि बन्धात् केवलेन ज्ञानेनैव मुच्यते न कर्माण्यपेक्षते। यद्वाद्वन्द्वं वै मिथुनं तस्माद्वन्द्वामिन्थुनं प्रजायते इति श्रुतेर्द्वन्द्वं स्त्रीपुंसयोर्मिथुनं तद्रहितः स्त्र्यादित्यागी संन्यासी अनायासेन मुच्यते। रागादिभयस्योभयत्र तुल्यत्वात् अत्र च कुटुम्बभरणवैयग्र्याभावात् सुखं मुच्यत इत्यर्थ इति व्याचख्युः तत्प्रकरणविरोधादुपेक्ष्यम्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
ज्ञेयः इत्यस्यापव्याख्यानं दूषयन् तात्पर्यमाह सन्न्यासेति। अर्थान्तरस्याप्रतीतेरिति भावः। ननुयदृच्छालाभसन्तुष्टः 4।22 इत्यादिनोक्तं कामादिपरित्यागंसन्न्यासं कर्मणां 5।1 इत्यनूद्यार्जुनस्य प्रश्न इत्युक्तम्। ततश्च जानात्येवासौ सन्न्यासशब्दार्थमिति न तं प्रति स वक्तव्यः। तथा च पूर्वपक्ष्युत्प्रेक्षित एवास्यार्थ इत्यत आह सन्न्यासस्येति।सन्न्यासः कर्मयोगश्च निश्श्रेयसकरावुभौ 5।2 इति यत्सन्न्यासस्य निश्श्रेयसकरत्वमुक्तं तदुपपादयितुं ज्ञातमपि सन्न्यासशब्दार्थं स्मारयत्यनेन। द्वेषादिवर्जनं हि सन्न्यासः। तस्य च निश्श्रेयसकरत्वं श्रुत्यादिप्रसिद्धमेवेति। अतः सन्न्यासशब्दार्थकथन एव तात्पर्याभावान्नानुपपत्तिरित्यर्थः। ज्ञापकं चास्यार्थस्यास्तीत्याह ज्ञेय इतीति। ज्ञेयः स्मर्तव्य इत्यनेनोक्तमित्यर्थः। योगस्य तु निश्श्रेयसकरत्वमुत्तरवाक्य एव सेत्स्यति।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
सन्न्यासशब्दार्थमाह ज्ञेय इति। सन्न्यासस्य निश्श्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थ स्मारयति ज्ञेय इति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
तमेव कर्मयोगं स्तौति त्रिभिः स कर्मणि प्रवृत्तोऽपि नित्यं संन्यासीति ज्ञेयः। कोऽसौ। यो न द्वेष्टि भगवदर्पणबुद्ध्या क्रियमाणं कर्म निष्फलत्वशङ्क्या न काङ्क्षति स्वर्गादिकम्। निर्द्वन्द्वो रागद्वेषरहितः हि यस्मात्सुखमनायासेन हे महाबाहो बन्धादन्तःकरणाशुद्धिरूपाज्ज्ञानप्रतिबन्धात्प्रमुच्यते नित्यानित्यवस्तुविवेकादिप्रकर्षेण मुक्तोभवति।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
ननु प्रत्यक्षः कर्मयोगिनां विक्षेपः संन्यासिनां तु स नास्तीति कथमुच्यते कर्मयोगो विशिष्यत इत्याशङ्क्याह ज्ञेय इति। यो रागद्वेषरहितः स कर्मसु स्वरूपतस्त्यक्तेष्वत्यक्तेषु वा नित्यं संन्यास्येव। एतेन साधनभूतयोः सांख्ययोगयोः रागद्वेषराहित्यकृतं साम्यमुक्तम्। फलभूतयोस्तु सर्वविकल्पराहित्यरूपसाम्यमनन्तरश्लोकाभ्यामुच्यते। तथापि चित्तस्वाभाव्यात्कदा चित्संन्यासिनो रागोदये पाताशङ्कास्ति नेतरस्येति स एव श्रेयानिति भावः। यद्यप्येवं तथापि हि प्रसिद्धं निर्द्वन्द्वो द्वन्द्वं सत्यानृतयोरात्मानात्मनोर्मिथुनं परस्पराध्यासस्तद्रहितः सांख्यो रागाद्युदयहेतोरज्ञानस्यात्यन्तोच्छेदात्। सुखं कर्मकरणायासंविनापि बन्धात्संसारात्केवलज्ञानेनैव मुच्यते न कर्माण्यपेक्षते। यद्वा निर्द्वन्द्वोद्वन्द्वं वै मिथुनं तस्माद्वन्द्वान्मिथुनं प्रजायते इति श्रुतेर्द्वन्द्वं स्त्रीपुंसयोर्मिथुनं तद्रहितः स्त्र्यादित्यागी संन्यासी अनायासेन मुच्यते। रागादिजयस्योभयत्र तुल्यत्वात्। अत्रच कुटुम्बभरणवैयग्र्याभावात्सुखं मुच्यत इत्यर्थः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
अथ श्रेयोरूपप्रश्नोत्तरमाह सर्वत्यागरूपम् ज्ञेय इति। यः सन्न्यासी सर्वत्यागवान् सर्वं त्यक्त्वैतयोर्मध्ये नैकं कमपि द्वेष्टि न चैकं कमप्याकाङ्क्षति स नित्यं ज्ञेयो ज्ञातुं योग्यः। मदीयत्वेनेति शेषः। हे महाबाहो सर्वकरणसमर्थ हि निश्चयेन निर्द्वन्द्वः कर्म सन्न्यासयोगयोर्मदाज्ञातिरेकेण भिन्नज्ञानरहितो बन्धात् तत्फलजात्सुखं प्रमुच्यते। मोक्षे प्रकर्षः मदाज्ञाकरणेऽहं प्रसन्नो भवामीति भावः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
यः कर्मयोगी तदन्तर्गतात्मानुभवतृप्तः तद्व्यतिरिक्तं किमपि न काङ्क्षति तत एव किमपि न द्वेष्टि तत एव द्वन्द्वसहः च स नित्यसंन्यासी नित्यज्ञाननिष्ठ इति ज्ञेयः। स हि सुकरकर्मयोगनिष्ठतया सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।ज्ञानयोगकर्मयोगयोः आत्मप्राप्तिसाधनभावे अन्योन्यनैरपेक्ष्यम् आह
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
ज्ञेयः ज्ञातव्यः स कर्मयोगी नित्यसंन्यासी इति यो न द्वेष्टि किञ्चित् न काङ्क्षति दुःखसुखे तत्साधने च। एवंविधो यः कर्मणि वर्तमानोऽपि स नित्यसंन्यासी इति ज्ञातव्यः इत्यर्थः। निर्द्वन्द्वः द्वन्द्ववर्जितः हि यस्मात् महाबाहो सुखं बन्धात् अनायासेन प्रमुच्यते।।संन्यासकर्मयोगयोः भिन्नपुरुषानुष्ठेययोः विरुद्धयोः फलेऽपि विरोधो युक्तः न तु उभयोः निःश्रेयसकरत्वमेव इति प्राप्ते इदम् उच्यते
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
कुत इत्यपेक्षायां संन्यासित्वेन कर्मयोगं स्तुवन् तस्य श्रेष्ठत्वं दर्शयति ज्ञेय इति। रागद्वेषादिराहित्येन परमेश्वरार्थं कर्माणि योऽनुतिष्ठति स नित्यं कर्मानुष्ठानकालेऽपि संन्यासीत्येव ज्ञेयः। तत्र हेतुः निर्द्वन्द्वो रागद्वेषादिशून्यो हि शुद्धचित्तो ज्ञानद्वारा सुखमनायासेन संसारात्प्रमुच्यते।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
योगमार्गरीत्या कर्मकार्यपि विवक्ष्यमाणलक्षणश्चेन्नित्यसन्न्यास्येवेत्याह ज्ञेय इति। यो योगमार्गीयबुद्ध्या कर्मकर्त्ता निर्द्वन्द्वः लाभालाभादिजयाजयादिशून्यः। तदाह न द्वेष्टि काम्यं कर्म न च कर्ममात्रे फलं काङ्क्षति किन्तु करोत्येव तथा स द्वन्द्वसन्न्यसनान्नित्यसन्न्यासी भगवन्निष्ठतया करणाद्योग्यपि नित्यस्न्न्यास्येवेति तत्कर्मबन्धात्प्रमुक्त एव सुखं यथा भवति तथा इति। अतो महाबाहुभ्यां तथैव तवोचितमिति भावः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
द्वयोः श्रेयस्साधनत्वाविशेषे कर्मयोग एव विशिष्यत इति प्रतिज्ञामात्रम् तत्र हेत्वाकाङ्क्षायां सौकर्याख्यं हेतुमाहेत्याहकुत इत्यत्राहेतिज्ञेयः इति श्लोकोनित्यसन्न्यासी इत्येतावता ज्ञानयोगनिष्ठविषय इति न मन्तव्यम्कर्मयोगो विशिष्यते 5।2 इति प्रतिज्ञाय ज्ञानयोगनिष्ठस्य सुखेन मोक्षोक्तेरसङ्गतत्वात्सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः 5।6 इति वक्ष्यमाणविरोधाच्च। अतः कर्मयोगनिष्ठस्यैवप्रशंसेयमित्यभिप्रायेणाह यः कर्मयोगीति। काङ्क्षाया बाह्यमात्रविषयत्वव्यञ्जनार्थं तद्धेयत्वार्थं चतदन्तर्गतात्मानुभवतृप्त इत्युक्तम्। काङ्क्षा हि प्रतिहन्यमाना द्वेषहेतुरित्यभिप्रायेणतत एव किमपि न द्वेष्टीति व्युत्क्रमेण व्याख्यातम्। द्वन्द्वस्वरूपनिवृत्तिव्युदासाय द्वन्द्वसहशब्दः।तत एव द्वन्द्वसहश्चेति रागद्वेषवतो द्वन्द्वतितिक्षा नशक्येति भावः। नित्यसन्न्यासित्वे हिशब्दस्य हेतुपरत्वव्यञ्जनायस हीत्युक्तम्। सुखशब्दोऽत्र सौकर्यपर इत्याह सुकरकर्मयोगनिष्ठतयेति।